1500 years old Dashavatar Temple-1500 साल पुराना दशावतार मंदिर - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Tuesday, 28 April 2020

1500 years old Dashavatar Temple-1500 साल पुराना दशावतार मंदिर


उत्तर प्रदेश के देवगढ़ में बेतवा नदी के दाहिने तट पर एक मंदिर है जो भारत के प्राचीनतम मंदिरोंमें से एक है। सुंदर नक़्क़ाशी से सजा दशावतार मंदिर 1500 साल पुराना है जो गुप्त शासनकाल में बनवाया गया था। ये मंदिर देश के गौरवशाली इतिहास को दर्शाता है।

तीसरी और छठी शताब्दी के बीच भारतीय उप-महाद्वीप के ज़्यादातर हिस्सों पर गुप्त शासक राजकरते थे। कुछ इतिहासकार इस अवधि को भारत का स्वर्णिम काल मानते हैं। इस अवधि में वैज्ञानिक, राजनीतिक प्रशासनिक और सांस्कृतिक के क्षेत्रों मे बहुत विकास हुआ था। उस काल में वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला के क्षेत्र में जो उपलब्धियां हासिल हुईं थीं उसने आने वाले समय में न सिर्फ़ भारत ही बल्कि बाक़ी देशों में भी उच्च मानदंड स्थापित कर दिये थे। दशावतार मंदिर हालंकि अब जर्जर अवस्था में है, लेकिन फिर भी इसमें इन सबकी झलक नज़र आती है।
गुप्ता मंदिर और आसपास की तस्वीर, 1950s|भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
पत्थर और चिनाई वाली ईंटों से निर्मित ये मंदिर सन 500 का है। ये मंदिर कितना महत्वपूर्ण था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगया जा सकता है कि ये गुप्त काल में देवगढ़ को एरण, सांची, उज्जैन, झांसी, इलाहबाद, पाटलीपुत्र (पटना) और बनारस को जोड़ने वाले राजमार्ग पर स्थित था।
गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद ये मंदिर उजाड़ हो गया लेकिन सन 1870-71 में स्थलाकृतिक सर्वेक्षण के दौरान कैप्टन चार्ल्स स्ट्रेहन की नज़र इस पर पड़ी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जनक सर एलेक्ज़ेंडर कनिंघम सन 1875 में यहां पहुंचे तब उन्हें यहा गुप्तकाल के अभिलेख मिले थे। चूंकि उस समय मंदिर का कोई नाम नहीं पता चल पाया था, इसलिये कनिंघम ने इसका नाम “गुप्त मंदिर” रख दिया था।
आसपास से बरामद अवशेष, 1875
सन 1899 में पुरातत्वविद पी.सी. मुखर्जी ने इस स्थान का गहराई से सर्वेक्षण किया। उन्हें मंदिर की नक़्क़शियों में विष्णु भगवान की छवि दिखाई दी । उन्होंने इस स्थानीय किवदंती के भी माना जिसमें दावा किया गया था कि मंदिर पर विष्णु के दस अवतार उंकेरे गए थे जो अब दिखाई नही देते हैं। अपनी रिपोर्ट में मुखर्जी ने इसे दशावतार मंदिर कहा| हालाँकि मंदिर को स्थानीय लोग “सागर मढ़” कहते थे।
मंदिर के पैनल के अवशेष एकत्र किए
बहरहाल, बाद की खुदाई में कृष्ण, राम, नरसिम्हा और वामन के रुप में विष्णु के अवतारों की मूर्तियां मिली। सन 1918 में पुरातत्वविद् दया राम साहनी को भी मंदिर की नींव के पास दफन कुछ पैनल मिले। मंदिर के कुछ पैनलों का उपयोग पास में एक दीवार बनाने के लिए भी किया गया था खुदाई के दौरान मंदिर के पलिन्थ के चारों कोनो पर छोटे और चौकोर देवालयों के अस्तित्व का पता लगा। मुख्य मंदिर के साथ साथ ये मंदिर भी उत्तर भारत में पंचायतन शैली का आरंभिक उदाहरण है। यह साबित करता है कि दशावतार मंदिर उत्तरी भारत में पंचायतन प्रकार का सबसे पहला उदाहरण था।
मंदिर की स्थापत्य योजना|भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण
दशावतार मंदिर में देवी-देवताओं, शाही पुरुषों-महिलाओं और आम लोगों की सौ से ज़्यादा मूर्तियां हैं। कुछ मूर्तियां तो अभी भी मंदिर की दीवारों पर देखी जा सकती हैं जबिक बाक़ी मूर्तियां दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय और अहमदाबाद के लालभाई दलपतराय संग्रहालय में रखी हुई हैं। दुर्भाग्य से कुछ मूर्तियां कुछ दशकों पहले चोरी हो गईं थीं।
दरवाजे पर आकृतियाँ
मंदिर का द्वार अन्य छवियों के अलावा गंगा और यमुना (नदियों) देवियों की छवियों से सजा हुआ है। इनके ऊपर छतरी है और गंगा देवी जहां अपने वाहन मगरमच्छ पर खड़ी हैं, वहीं यमुना देवी कछुए पर सवार हैं। निचले और ऊपरी गृहमुख पर दो पुरुषों की छवियां हैं, एक के हाथ में फूल है और दूसरे के हाथ में माला है। इसके अलावा नृत्य करते एक बौने व्यक्ति या संगीतकार की भी छवि है। ये शायद आगंतुकों का स्वागत कर रहे हैं।
पांचों पांडव योद्धाओं और द्रौपदी के साथ शेषनाग पर सो रहे विष्णु
मंदिर के अंदर और बाहर के आलों में मूर्तियां रखी हैं जो विष्णु से जुड़ी कहानियों को बयां करती हैं जैसे गजेंद्र (हाथी) का मोक्ष, नर और नारायण का प्रायश्चित और शेषनाग के सात फनों के साये में लेटे विष्णु।
गर्भगृह के स्तंभ के ऊपर और दीवारों पर विष्णु और लक्ष्मी की छवियां बनी हुई हैं। उनके पास ही शिव, पार्वती, इंद्र, कार्तिकेय, गणेश ब्रह्मा और अन्य देवी-देवताओं की छवियां हैं।
छवियों के अलावा महाभारत और रामायण की घटनाओं के पैनल भी हैं। इनमें राम, लक्ष्मण और सीता के वनवास, लक्ष्मण द्वारा सूर्पणखा की नाक काटना और अशोक वाटिका में सीता को धमकाते रावण जैसी घटनाओं को दर्शाया गया है। इसके अलावा पैनलों पर कृष्ण के जन्म, कृष्ण द्वारा कंस को बालों से पकड़ने और सुदामा का स्वागत करते कृष्ण जैसी घटनाओं का भी वर्णन है।


There is a temple on the right bank of the Betwa River in Deogarh, Uttar Pradesh, which is one of the oldest temples in India. Decorated with beautiful etching, the Dasavatara temple is 1500 years old, which was built during the Gupta reign. This temple reflects the glorious history of the country.

The Gupta rulers ruled most parts of the Indian sub-continent between the third and sixth centuries. Some historians consider this period to be the golden period of India. There was a lot of development in the scientific, political, administrative and cultural fields during this period. The achievements in the field of architecture, sculpture and painting in that period had set high standards not only in India but also in the remaining countries. Although the Dashavatara temple is now in a dilapidated state, it still has a glimpse of all these.

Gupta temple and surrounding photo, 1950s | Archaeological Survey of India
Built of stone and masonry bricks, this temple is of the year 500. How important this temple was can be gauged from the fact that it was located on the highway connecting Devgarh to Eran, Sanchi, Ujjain, Jhansi, Allahabad, Pataliputra (Patna) and Banaras during the Gupta period.

After the fall of the Gupta Empire, this temple was desolate but during the topographical survey in 1870–71, Captain Charles Strehan came to notice it. The father of the Archaeological Survey of India, Sir Alexander Cunningham, arrived here in 1875 when he found the records of the Gupta period here. Since no name of the temple was known at that time, Cunningham named it "Secret Temple".

Remains recovered from nearby, 1875
In 1899, archaeologist P.C. Mukherjee conducted an in-depth survey of the place. He saw the image of Lord Vishnu in the temple maps. He also believed in this local legend that claimed that ten incarnations of Vishnu were carved on the temple which are no longer visible. In his report, Mukherjee called it the Dasavatara temple. However, the local people called the temple as "Sagar Marh".


Collected remnants of temple panels
However, later excavations found statues of incarnations of Vishnu in the form of Krishna, Rama, Narasimha and Vamana. In 1918 archaeologist Daya Ram Sahni also found some panels buried near the foundation of the temple. Some panels of the temple were also used to create a wall nearby, during excavations, the existence of small and square shrines on the four corners of the temple's palindrom was discovered. This temple along with the main temple is an early example of Panchayatan style in North India. This proves that the Dasavatara temple was the earliest example of Panchayatan type in northern India.

Temple Architectural Plan | Archaeological Survey of India
The Dashavatar temple has more than a hundred statues of deities, royal men, women and common people. Some of the sculptures can still be seen on the walls of the temple while the rest are kept in the National Museum of Delhi and Lalbhai Dalpatrai Museum in Ahmedabad. Unfortunately some statues were stolen a few decades ago.

Shapes on the door
The temple gate is decorated with images of the Goddesses of the Ganges and Yamuna (rivers), among other images. Above them is an umbrella and Ganga Devi is standing on her vehicle on a crocodile, while Yamuna Devi is riding on a turtle. On the lower and upper tusks are images of two men, one with a flower in his hand and a garland in the other. Apart from this there is also the image of a dwarf person or musician dancing. These are probably welcoming visitors.

Vishnu sleeping on Sheshnag with five Pandava warriors and Draupadi
There are statues inside and outside the temple which tell stories related to Vishnu such as salvation of Gajendra (elephant), atonement of male and Narayana and Vishnu lying in the shadow of the seven grains of Sheshnag.

Above the pillar of the sanctum sanctorum and on the walls are images of Vishnu and Lakshmi. He has images of Shiva, Parvati, Indra, Kartikeya, Ganesh Brahma and other deities.

Apart from the images there are panels of events of Mahabharata and Ramayana. These depict events such as the exile of Rama, Lakshmana and Sita, cutting of the nose of Surpanakha by Lakshmana and Ravana threatening Sita in Ashoka Vatika. Apart from this, the panels also describe events like Krishna's birth, Krishna holding Kansa by the hair and Krishna welcoming Sudama.


नर और नारायण का प्रायश्चित
मंदिर में स्त्री और पुरुष के प्रेमालाप और प्रणय मुद्रा की भी छवियां हैं। कई पैनलों पर अलग अलग भावों में महिलाओं, बच्चों को खेलते, लड़कियों को फूल तोड़ते, एक लड़की को नृत्य करते और पांच लड़कियों को उसे देखते, पांच लड़कियों के बीच एक लड़की को नाचते और बाक़ी को वाद्य बजाते, एक महिला को अपना बच्चा एक व्यक्ति को गोद में देते हुए और उस व्यक्ति को उदासीन खड़ा दिखाया गया है।
सदियों पहले गुप्तकाल में संस्कृति क्या थी, लोगों क्या पहनते थे और किस तरह के आभूषणों हुआ करते थे, ये सब जानने और समझने में ये मूर्तियां बहुत सहायक हैं। उस समय धोती, लहंगा, अनारकली, दुपट्टा और कुर्तें आदि का चलन था। गहनों में पायल, कमरबंद, कंगन, बाज़ूबंध, माला और झुमके पहने जाते थे।
हैरानी की बात ये है कि महिलाओं और पुरुषों का अंगुली में अंगूठी पहनना बहुत आम बात है लेकिन सिर्फ़ विष्णु भगवान को छोटी अंगुली में अंगूठी पहने दिखाया गया है। मंदिर की किसी भी मूर्ति में किसी को हाथ की या पैर की अंगुली में अंगूठी पहने नहीं दर्शाया गया है। महिलाओं को नाक में नथ्नी पहने भी नहीं दिखाया गया है। लेकिन इन छवियों में गरिमा और नफ़ासत दिखाई देती है और साथ ही मूर्तिकारों की दक्षता भी नज़र आती है।
दशावतार मंदिर भारत में मंदिर वास्तुकला के आरंभिक दौर को दर्शाता है। ऐतिहासिक धरोहार वाला ये मंदिर हालंकि बेहद ख़ूबसूरत जगह स्थित है, इसके पास नदी भी बहती है लेकिन फिर भी यहां सैलानी कम ही आते हैं। अगली बार आप जब भी उत्तर प्रदेश की यात्रा पर जाएं तो देवगढ़ ज़रुर जाएं । देवगढ़ झांसी से सिर्फ़ 125 कि.मी. दूर है।

Atonement of Nar and Narayan
The temple also has images of courtship of women and men and pranay mudra. On many panels, women, children play, girls cut flowers, a girl dances and five girls watch her in different expressions, a girl dances between five girls and the rest plays, a woman gets her child Giving the person in the lap and that person is shown standing indifferent.

Centuries ago, these idols are very helpful in knowing and understanding what culture was in the Gupta period, what people wore and what kind of jewelery used to be. Dhoti, lehenga, anarkali, scarf and kurtas etc. were prevalent at that time. Anklets, waistband, bracelets, armlets, garlands and earrings were worn in jewelery.

Surprisingly, it is very common for women and men to wear a ring in the finger, but only Vishnu is shown wearing a ring in the little finger. None of the idols of the temple depict anyone wearing a ring in their hands or toes. Women are also not shown wearing nostrils in their nose. But these images show dignity and affection as well as the efficiency of the sculptors.

The Dashavatar Temple marks the earliest period of temple architecture in India. This temple with historical heritage, although located in a very beautiful place, also has a river flowing near it, but still there is less tourists. Next time you visit Uttar Pradesh, definitely go to Devgarh. Only 125 km from Devgarh Jhansi. is far.

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