A true स्टोरी-एक सच्ची कहानी - ॐ जय माता दी ॐ

Latest:

Translate

Search This Blog

“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Tuesday, 28 April 2020

A true स्टोरी-एक सच्ची कहानी

एक सच्ची कहानी

बनारस की वो गलियाँ जहाँ हर मोड़ पे आपको एक छोटा-मोटा मंदिर मिल जाएगा। शायद यही बनारस की खूबसूरती का एक राज है। हर पल उस छोटे बड़े मंदिर से आती घंटियों की आवाज़ें मन को कितना सुकून देती हैं।

बनारस के इन्हीं गलियों में एक राम जानकी मंदिर है, जिसकी देख रेख मंदिर के पुजारी पंडित रामनारायण मिश्र के हाथों थी। मिश्रा जी भी अपनी पूरी जिंदगी इस रामजानकी मंदिर को समर्पित कर चुके थे।

संपत्ति के नाम पर उनके पास एक छोटा सा 2 कमरे का मकान और परिवार में उनकी पत्नी और विवाह योग्य बेटी कमला।

मंदिर में जो भी दान आता वही पंडित जी और उनके परिवार के गुजारे का साधन था। बेटी विवाह योग्य हो गयी थी और पंडित जी ने हर मुकम्मल कोशिश की जो शायद हर बेटी का पिता करता।

पर वही दान दहेज़ पे आकर बात रुक जाती। पंडित जी अब निराश हो चुके थे। सारे प्रयास कर के हार चुके थे।

एक दिन मंदिर में दोपहर के समय जब भीड़ न के बराबर होती है उसी समय चुपचाप राम सीता की प्रतिमा के सामने आंखें बंद किये अपनी बेटी के भविष्य के बारे में सोचते हुए उनकी आंखों से आँसू बहे जा रहे थे।

तभी उनकी कानों में एक आवाज आई,

"नमस्कार, पंडित जी!"

झटके में आँखें खोलीं तो देखा सामने एक बुजुर्ग दंपत्ति हाथ जोड़े खड़े थे।

पंडित जी ने बैठने का आग्रह किया।

पंडित जी ने गौर किया कि वो वृद्ध दंपत्ति देखने में किसी अच्छे घर के लगते थे। दोनों के चेहरे पे एक गजब का रूवाब था।

"पंडित जी आपसे एक जरूरी बात करनी है।" वृद्ध पुरूष की आवाज़ सुनकर पंडित जी की तंत्रा टूटी।

"हां हां कहिये श्रीमान।" पंडित जी ने कहा।

उस वृद्ध आदमी ने कहा, "पंडित जी, मेरा नाम विशम्भर नाथ है, हम गुजरात से काशी दर्शन को आये हैं, हम निःसंतान हैं, बहोत जगह मन्नतें माँगी पर हमारे भाग्य में पुत्र/पुत्री सुख तो जैसे लिखा ही नहीं था।"

"बहोत सालों से हमनें एक मन्नत माँगी हुई है, एक गरीब कन्या का विवाह कराना है, कन्यादान करना है हम दोनों को, तभी इस जीवन को कोई सार्थक पड़ाव मिलेगा।"

वृद्ध दंपत्ति की बातों को सुनकर पंडित जी मन ही मन इतना खुश हुए जा रहे थे जैसे स्वयं भगवान ने उनकी इच्छा पूरी करने किसी को भेज दिया हो।

"आप किसी कन्या को जानते हैं पंडित जी जो विवाह योग्य हो पर उसका विवाह न हो पा रहा हो। हम हर तरह से दान दहेज देंगे उसके लिए और एक सुयोग्य वर भी है।" वृद्ध महिला ने कहा।

पंडित जी ने बिना एक पल गंवाए अपनी बेटी के बारे में सब विस्तार से बता दिया।

वृद्ध दम्पत्ति बहोत खुश हुए, बोले, "आज से आपकी बेटी हमारी हुई, बस अब आपको उसकी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं, उसका विवाह हम करेंगे।"

पंडित जी की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। उनकी मुहमांगी मुराद जैसे पूरी हो गयी हो।

विशम्भर नाथ ने उन्हें एक विजिटिंग कार्ड दिया और बोला, "बनारस में ही ये लड़का है, ये उसके पिता के आफिस का पता है, आप जाइये। ये मेरे रिश्ते में मेरे साढ़ू लगते हैं। बस आप जाइये और मेरे बारे में कुछ न बताइयेगा। मैं बीच में नहीं आना चाहता। आप जाइये, खुद से बात करिये।"

पंडित जी घबराए और बोले, "मैं कैसे बात करूँ, न जान न पहचान, कहीं उन्होंने मना कर दिया इस रिश्ते के लिए तो..??"

वृद्ध दंपत्ति ने मुस्कुराते हुए आश्वासन दिया कि, "आप जाइये तो सही। लड़के के पिता का स्वभाव बहोत अच्छा है, वो आपको मना नहीं करेंगे।"

इतना कह कर वृद्ध दंपत्ति ने उनको अपना मोबाइल नंबर दिया और चले गए।

पंडित जी ने बिना समय गंवाए लड़के के पिता के आफिस का रुख किया।

जैसे चमत्कार हो रहा था....

'ऑफिस में लड़के के पिता से मिलने के बाद लड़के के पिता की हाँ', 'तुरंत शादी की डेट फाइनल होना', पंडित जी जब जब उस दंपत्ति को फोन करते तब तब शादी विवाह की जरूरत का दान दहेज उनके घर पहुंच जाना। सारी बुकिंग, हर तरह का सहयोग बस पंडित जी के फोन कॉल करते ही उन तक पहुंचने लगा।

अंततः धूमधाम से विवाह संपन्न हुआ। पंडित जी की लड़की कमला विदा होकर अपने ससुराल चली गयी।

पंडित जी ने राहत की साँस ली। पंडित जी अगले दिन मंदिर में बैठे उस वृद्ध दम्पत्ति के बारे में सोच रहे थे कि कौन थे वो दम्पत्ति जिन्होंने मेरी बेटी को अपना समझा, बस एक ही बार मुझसे मिले और मेरी सारी परेशानी हर लिए।

यही सोचते सोचते पंडित जी ने उनको फोन मिलाया।

उनका फोन स्विच ऑफ बता रहा था। पंडित जी का दिल जोर जोर से धड़कने लगा। उन्होंने मन ही मन तय किया कि एक दो दिन और फोन करूँगा नहीं बात होने पर अपने समधी जी से पूछुंगा जरूर विशम्भर नाथ जी के बारे में।

अंततः लगातार 3 दिन फ़ोन करने के बाद भी विशम्भर नाथ जी का फ़ोन नहीं लगा तो उन्होंने तुरंत अपने समधी जी को फ़ोन मिलाया।

ये क्या….

फ़ोन पे बात करने के बाद पंडित जी की आंखों से झर झर आँसू बहने लगे। पंडित जी के समधी जी का दूर दूर तक विशम्भर नाथ नाम का न कोई सगा संबंधी, न ही कोई मित्र था।

पंडित जी आँखों में आँसू लिए मंदिर में प्रभु श्रीराम के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

रोते हुए बोले, "मुझे अब पता चला प्रभु, वो विशम्भर नाथ और कोई नहीं आप ही थे, वो वृद्धा जानकी माता थीं, आपसे मेरा और मेरी बेटी का कष्ट देखा नहीं गया न? दुनिया इस बात को माने या न माने पर आप ही आकर मुझसे बातें कर के मेरे दुःख को हरे प्रभु।"

रामजानकी की प्रतिमा जैसे मुस्कुराते हुए अपने भक्त पंडित जी को देखे जा रही थी।
जय श्री हरि...

A true story

The streets of Banaras where you will find a small temple at every turn. Perhaps this is a secret of the beauty of Banaras. Every moment, the sounds of bells coming from that small big temple make the mind so relaxed.

There is a Ram Janaki temple in these streets of Banaras, which was looked after by the priest of the temple, Pandit Ramnarayan Mishra. Mishra ji had also dedicated his entire life to this Ramjanaki temple.

He has a small 2-room house in the name of the property and his wife and marriageable daughter Kamala in the family.

Whatever donation came to the temple was the means of maintenance of Panditji and his family. The daughter was married and Panditji made every effort that perhaps every daughter would have.

But the same donation would stop at the dowry. Pandit ji was now disappointed. All efforts were defeated.

One day at the temple in the afternoon when the crowd is small, at the same time silently in front of the idol of Ram Sita, tears were pouring out of his eyes thinking about the future of his daughter.

Then a voice came in his ears,

"Hello, Panditji!"

Opened his eyes in shock, he saw an elderly couple standing in front of him with folded hands.

Panditji urged to sit.

Panditji noticed that they looked like a good house to see the old couple. Both had an amazing face.

"Panditji you have to do an important thing." Hearing the voice of the old man, Panditji's mechanism broke.

"Yes, yes, sir." Panditji said.

The old man said, "Pandit ji, my name is Vishambhar Nath, we have come from Gujarat to Kashi Darshan, we are childless, many places ask for vows, but son / daughter Sukh was not written in our destiny."

"For many years we have asked for a vow, we have to marry a poor girl, we both have to donate, then only this life will get a meaningful break."

After listening to the words of the old couple, Panditji's mind was becoming so happy that God himself had sent someone to fulfill his wish.

"You know a girl Pandit ji who is eligible for marriage but she is not getting married. We will give dowry in every way and there is also a worthy groom for her." The old lady said.

Without losing a moment, Panditji told all the details about his daughter.

The old couple was very happy, said, "From today your daughter is ours, just now you have no need to worry about her, we will marry her."

There was no place for Panditji's happiness. His wishes are fulfilled like wishes.

Vishmbhar Nath gave him a visiting card and said, "This boy is in Benares, this is the address of his father's office, you go. He seems to be my brother-in-law in my relationship. Just go and tell me nothing about me." . I don't want to come in the middle. You go, talk to yourself. "

Pandit ji panicked and said, "How do I talk, I don't know or do I have refused for this relationship .. ??"

The aged couple smilingly assured that "You go right. The boy's father is very good in nature, he will not refuse you."

After saying this, the old couple gave him their mobile number and went away.

Without losing time, Pandit ji moved to the office of the boy's father.

As if miracle was happening ....

'Boy's father's yes after meeting boy's father in office', 'Instant wedding date to be final', Pandit ji, when calling that couple, then the wedding dowry's donation dowry reached his house. All the bookings, every kind of cooperation started reaching them just after Panditji's phone call.

The marriage was eventually marred. Panditji's girl Kamala left and went to her in-laws.

Pandit ji breathed a sigh of relief. Panditji was thinking about that old couple sitting in the temple the next day, who were those couples who considered my daughter as their own, just met me once and took all my troubles.

While thinking this, Panditji called him.

His phone was telling the switch off. Pandit ji's heart started beating hard. He decided in his own mind that he will call for a day or two and will not ask his brother-in-law about the matter, about Vishbambhar Nath Ji.

Finally, even after calling for 3 consecutive days, Vishmabhar Nath ji did not get a phone, so he immediately called his brother-in-law.

what is this….

After talking on the phone, tears started flowing from Panditji's eyes. Panditji's brother-in-law had no distant relatives, nor any friend named Vishambhar Nath.

Pandit ji stood in tears in the temple with folded hands in front of Lord Shri Ram.

Cried crying, "I know now Lord, that Vishwambhar Nath was nobody else but you, she was the mother of old age, you have not seen the suffering of me and my daughter? Have the world believed it or not, but only you Come and talk to me Hare Lord. "

His devotee Panditji was seen smiling like a statue of Ramjanaki.
Jai Shree Hari ...

No comments:

Post a comment