शीतला अष्टमी, बसौड़ा व्रत विधि और व्रत कथा (sheetala ashtami Basoda Vrat Katha & Vrat vidhi) - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

शीतला अष्टमी, बसौड़ा व्रत विधि और व्रत कथा (sheetala ashtami Basoda Vrat Katha & Vrat vidhi)








शीतला अष्टमी हिन्दुओं का एक त्योहार है जिसमें शीतला माता के व्रत और पूजन किये जाते हैं। ये होली सम्पन्न होने के अगले सप्ताह में बाद करते हैं। प्रायः शीतला देवी की पूजा चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि से प्रारंभ होती है, लेकिन कुछ स्थानों पर इनकी पूजा होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार अथवा गुरुवार के दिन ही की जाती है। भगवती शीतला की पूजा का विधान भी विशिष्ट होता है। शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व उन्हें भोग लगाने के लिए बासी खाने का भोग यानि बसौड़ा तैयार कर लिया जाता है। अष्टमी के दिन बासी पदार्थ ही देवी को नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता है और भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इस कारण से ही संपूर्ण उत्तर भारत में शीतलाष्टमी त्यौहार, बसौड़ा के नाम से विख्यात है।ऐसी मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी खाना खाना बंद कर दिया जाता है।[2] ये ऋतु का अंतिम दिन होता है जब बासी खाना खा सकते हैं।


प्राचीनकाल से ही शीतला माता का बहुत अधिक माहात्म्य रहा है। स्कंद पुराण में शीतला देवी शीतला का वाहन गर्दभ बताया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन बातों का प्रतीकात्मक महत्व होता है। चेचक का रोगी व्यग्रतामें वस्त्र उतार देता है। सूप से रोगी को हवा की जाती है, झाडू से चेचक के फोड़े फट जाते हैं। नीम के पत्ते फोडों को सड़ने नहीं देते। रोगी को ठंडा जल प्रिय होता है अत:कलश का महत्व है। गर्दभ की लीद के लेपन से चेचक के दाग मिट जाते हैं। शीतला-मंदिरों में प्राय: माता शीतला को गर्दभ पर ही आसीन दिखाया गया है। स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में प्राप्त होता है। ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने लोकहित में की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है। शास्त्रों में भगवती शीतला की वंदना के लिए यह मंत्र बताया गया है:

वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।।
मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।
अर्थात

गर्दभ पर विराजमान, दिगम्बरा, हाथ में झाडू तथा कलश धारण करने वाली, सूप से अलंकृत मस्तकवालीभगवती शीतला की मैं वंदना करता हूं। शीतला माता के इस वंदना मंत्र से यह पूर्णत:स्पष्ट हो जाता है कि ये स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं। हाथ में मार्जनी [झाडू] होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए। कलश से हमारा तात्पर्य है कि स्वच्छता रहने पर ही स्वास्थ्य रूपी समृद्धि आती है।
मान्यता अनुसार इस व्रत को करनेसे शीतला देवी प्रसन्‍न होती हैं और व्रती के कुल में दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोडे, नेत्रों के समस्त रोग, शीतलाकी फुंसियोंके चिन्ह तथा शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं।
क्यों मनाते हैं बसौड़ा पर्व?
बसौड़ा, शीतलता का पर्व भारतीय सनातन परंपरा के अनुसार महिलाएं अपने बच्चों की सलामती, आरोग्यता व घर में सुख-शांति के लिए रंगपंचमी से अष्टमी तक मां शीतला को बसौड़ा बनाकर पूजती हैं। बसौड़ा में मीठे चावल, कढ़ी, चने की दाल, हलवा, रबड़ी, बिना नमक की पूड़ी, पूए आदि एक दिन पहले ही रात में बनाकर रख लिए जाते हैं।
सुबह घर व मंदिर में माता की पूजा-अर्चना कर महिलाएं शीतला माता को बसौड़ा का प्रसाद चढ़ाती हैं। पूजा करने के बाद घर की महिलाएं बसौड़ा का प्रसाद अपने परिवार में बांट कर सभी के साथ मिलजुल कर बासी भोजन ग्रहण करके माता का आशीर्वाद लेती हैं।
बसौड़ा पर्व की पौराणिक कथा
किंवदंतियों के अनुसार बसौड़ा की पूजा माता शीतला को प्रसन्न करने के लिए की जाती है।कहते हैं कि एक बार किसी गांव में गांववासी शीतला माता की पूजा-अर्चना कर रहे थे और गांववासियों ने गरिष्ठ भोजन माता को प्रसादस्वरूप चढ़ा दिया। शीतलता की प्रतिमूर्ति मां भवानी का मुंह गर्म भोजन से जल गया और वे नाराज हो गईं।
उन्होंने कोपदृष्टि से संपूर्ण गांव में आग लगा दी। बस केवल एक बुढ़िया का घर सुरक्षित बचा हुआ था। गांव वालों ने जाकर उस बुढ़िया से घर न जलने के बारे में पूछा तो बुढ़िया ने मां शीतला को गरिष्ठ भोजन खिलाने वाली बात कही और कहा कि उन्होंने रात को ही भोजन बनाकर मां को भोग में ठंडा-बासी भोजन खिलाया। जिससे मां ने प्रसन्न होकर बुढ़िया का घर जलने से बचा लिया। बुढ़िया की बात सुनकर गांव वालों ने मां से क्षमा मांगी और रंगपंचमी के बाद आने वाली सप्तमी के दिन उन्हें बासी भोजन खिलाकर मां का बसौड़ा पूजन किया।
शीतला माता का व्रत कैसे करें?
- व्रती को इस दिन प्रातःकालीन नित्‍य कर्मों से निवृत्त होकर स्वच्छ व शीतल जल से स्नान करना चाहिए।
- स्नान के बाद 'मम गेहे शीतलारोगजनितोपद्रव प्रशमन पूर्वकायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धिये शीतलाष्टमी व्रतं करिष्ये' मंत्र से संकल्प लेना चाहिए।
- संकल्प के बाद विधि-विधान तथा सुगंधयुक्त गंध व पुष्प आदि से माता शीतला का पूजन करें।
- इसके बाद एक दिन पहले बनाए हुए (बासी) खाना, मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी आदि का भोग लगाएं।
- यदि आप चतुर्मासी व्रत कर रहे हो तो भोग में माह के अनुसार भोग लगाएं, जैसे- चैत्र में शीतल पदार्थ, वैशाख में घी और मीठा सत्तू, ज्येष्ठ में एक दिन पूर्व बनाए गए पूए तथा आषाढ़ में घी और शक्कर मिली हुई खीर।
- भोग लगाने के बाद शीतला स्तोत्र का पाठ करें और यदि यह उपलब्ध न हो तो शीतला अष्टमी की कथा सुनें।
- रात्रि में जगराता करें और दीपमालाएं प्रज्ज्वलित करें।
विशेष:-
इस दिन व्रती को चाहिए कि वह स्वयं तथा परिवार का कोई भी सदस्य किसी भी प्रकार के गरम पदार्थ का सेवन न करें। इस व्रत के लिए एक दिन पूर्व ही भोजन बनाकर रख लें तथा उसे ही ग्रहण करें।

बसोरा और शीतला माता की पूजा कैसे करें? (बसोड़ा / शीतला माता की कहानी) - बसोड़ा (बसोड़ा) होली के सात या आठ दिन बाद होता है। बसोरा के पहले दिन पका हुआ भोजन और मीठे चावल बनाए जाते हैं। राबड़ी बनाने के बाद, किसी को हाथ में नोट नहीं लेना चाहिए और साथ ही बासोरा वालों को भी अपने हाथ में सुई नंबर चाहिए और एक फर्म रसोई रानी चाहिए।

अगर आपको रबड़ी, बाजरे की रोटी, गुड़ और मीठे भात पसंद हैं, तो हलवा, साबुत साग इत्यादि को मथें। शीतला माता (शीतला माता) के गीत गाएं, फिर बसोड़ा के पहले दिन, रात को पहले दिन रसोई घर में दीवार पर पांच फीट की दूरी से कवर करके एक छापे बनाएं और रोली, चावल, गाने गाएं। बसोड़ा (बसोड़ की पूजा) की पूजा करें।



शीतला माता की कहानी बसौड़ा
बसोडा के दिन, सुबह एक थाली में घी चीनी के साथ राबड़ी, रोटी, चावल, रोली, कलावा, मूंग का छिलका, हल्दी, धूप, बाजरे का आटा चढ़ाएं।

चूड़ियों के पास आँखें बनाएँ। होली के दिन से रखी हुई माला की माला रखें और दक्षिणा में पतंगे रायगावा में रखें।

सभी चीजों को एक साथ रखें और शीतला माता (शीतला माता) पर जल चढ़ाएं। बन्ना मिंसकर अपनी सास के पैर छुएं।

कई लोग सुबह के समय बसोड़ा चूरमा बनाते हैं। इस दिन हनुमान जी यानि बालाजी महाराज की पूजा करें, जलेबी का भोग लगाएं और पितरों का श्राद्ध करें। पानी, रोली, जेल, बैंकुल्लाह, फूल, चढ़ावा, झावरा उगाना और सभी को ठंडी रोटी का स्वाद चखना चाहिए। बसोड़ा (बसोडा) एक बुद्धा मिसरानी और एक कुंवारी लड़की को पैदा होने से पहले पेश करते हैं।

अगर कोई कुंदारा भरता है, तो एक बड़ा टैंक और दस छोटे वाले मांगते हैं। एक कुंदारे में रबड़ी को पीसें, एक में भट, एक में रसगुल्ला, एक में मोठ, एक कुंदर में हल्दी।

कुंदारे में अर्थव्यवस्था के रूप में पैसा लें। उन टेंडनों को रखकर उनकी पूजा करें। हल्दी केक और हल्दी खुद ही निकाल लें। बाद में, भूमि और समान कुंड को शीतला माता (शीतला माता) में ले जाकर चढ़ाएं।

कुंडारे की पूजा करने के बाद, बसोड की कहानी (बसोड़ की कहानी) को सुनें। बसोड़ा के पहले दिन शीतला माता (शीतला माता के भजन) के गीत गाएं।

रास्ते में कोच और हरे साग लाएँ और उन्हें पंडों पर रखें। अगर किसी का लड़का या लड़की शादीशुदा है, तो उधियाना (उदयन)। उदयन में जितना भरते हैं, उतने अधिक कुंदरू लें।

बसोड की कहानी (शीतला माता की कहानी)
एक बूढ़ी औरत माई थी। वह बसोड़ा (बसोड़) पर ठंडी रोटी बनाती थी और शीतला माता (शीतला माता की पूजा) करती थी। उसके सिवा गाँव में किसी और ने पूजा नहीं की।

एक दिन, बसोड़ा के दिन, पूरे गाँव में आग लग गई और पूरा गाँव जल गया, लेकिन बूढ़ी माँ माई का झूठा चला गया।

सबने बुढ़िया माई के पास आकर पूछा कि सबके घर जल गए लेकिन तुम्हारा घर नहीं जला, क्या बात है?

इस पर बुढ़िया ने कहा कि मैंने बसोड़ा की ठंडी रोटी खाई थी और शीतला माता की पूजा (शीतला माता की पूजा) की थी और किसी ने भी ऐसा नहीं किया था, इसलिए मेरा बैग बच गया और आपकी कुटिया जल गई।

सभी गाँवों में ढिंढोरा पीटा गया कि सभी को बसोड़ा के दिन ठंडी रोटी खानी चाहिए और शीतला माई (शीतला माता की पूजा) की पूजा करनी चाहिए। शीतला माता की आरती के एक दिन पहले पक्के भोजन का सेवन अवश्य करें।

हे शीतला माई! सभी को बचाने के लिए बूढ़ी औरत माई की रक्षा की गई। सभी बच्चों की सुरक्षा करना। शीतला माता (शीतला माता की कहानी) की कहानी हर किसी को जरूर सुननी चाहिए।

पूजा हमेशा लाल आसन बिछाकर करनी चाहिए।

माँ शीतला कि पावन सत्य कथा

2017-03-26 12:33:09, comments: 0
 यह कथा बहुत पुरानी है एक वार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखु कि धरती पर मेरी पूजा कोन करता है कोन मुझे मानता हे यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर भी नही है। ना मेरी पुजा है माता शीतला गाँव कि गलियो में घूम रही थी तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उवला पानी (मांड) निचे फेका वह उवलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पडगये शीतला माता के पुरे शरीर में जलन होने लगी शीतला माता गाँव में इधर उधर भाग भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई मेरा शरीर तप रहा है जल रहा हे कोई मेरी मददकरो लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही कि तभी अपने घर बहार एक कुम्हारन (महिला) बेठी थी उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बुडी माई तो बहुत जलगई इसके पुरे शरीर में तपन है इसके पुरे शरीर में (छाले) फफोले पड़गये है यह तपन सहन नही कर पा रही है तब उस कुम्हारन ने कहा है माँ तू यहाँ आकार बेठ जा में तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हु कुम्हारन ने उस बुडी माई पर खुब ठंडा पानी डाला और बोली हे माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई रावडी रखी है थोड़ा दही भी है तु ठंडी (जुवार) के आटे कि रावडी और दही खाया इससे शरीर में ठंडाई मिली तब उस कुम्हारन ने कहा आ माँ बेठ जा तेरे सिर के बाल बिखरे हे ला में तेरी चोटी गुथ देती हु और कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु (कंगी) कागसी बालो में करती रही अचानक कुम्हारन कि नजर उस बुडी माई के सिर के पिछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख वालो के अंदर छुपी हे यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उस बुडी माई ने कहा रुक जा बेटी तु डरमत में कोई भुत प्रेत नही हु में शीतला देवी हु में तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कोन मानता है। कोन मेरी पुजा करता है इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जबाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब में गरीब इस माता को कहा विठाऊ तब माता बोली हे बेटी तु किस सोच मे पडगई तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहते हुए कहा है माँ मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता है बिखरी हुई हे में आपको कहा बेठाऊ मेरे घर में ना तो चोकी है ना बैठने का आसन तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बेठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारन से कहा है बेटी में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हु अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले तब कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा है माता मेरी इक्छा है अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहो और जिस प्रकार आपने आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद कि सप्तमी को भक्ति भाव से पुजा कर आपकी ठंडा जल दही व वासी ठंडा भोजन चडाये उसके घर कि  दरिद्रता को साफ़ करना और आपकी पुजा करने वाली नारि जाति (महिला) का अखंड सुहाग रखना उसकी गोद हमेसा भरी रखना साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहा बाल ना कटवाये धोबी को कपड़े धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चडाकर नरियल फूल चडाकर परिवार सहित ठंडा वासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये तव माता बोली तथाअस्तु है बेटी जो जओ तुने वरदान मांगे में सब तुझे देती हु । है बेटी तुझे आर्शिबाद देती हु कि मेरी पुजा का मुख्ख अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया (शील कि डुंगरी) शील कि डुंगरी भारत का एक मात्र मुख्ख मंदिर है। शीतला सप्तमी वहाँ बहुत विशाल मेला भरता है। इस कथा को पड़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है। जय माँ शितला सबका कल्याण करे..
How to worship Basora and Sheetla Mata? (Basoda / Story of Sheetla Mata) - Basoda (Basoda) takes place seven or eight days after Holi. On the first day of Basora, cooked food and sweet rice are made. After making Rabri, one should not take notes in the hand and also the Basora ones also need a needle number in their hand and a firm kitchen queen should.

If you like rabri, millet bread, jaggery and sweet bhat, make halwa, whole greens etc. Soak mothlets. Sing songs of Sheetla Mata (Sheetla Mata), then on the first day of Basoda, make a raid on the first day of the night by covering the wall in the kitchen with five feet on the wall and offer Roli, rice, sing songs and worship Basoda (worship of Basod).



Sheetla mata ki kahani basoda
On the day of Basoda, offer Rabri, Roti, Rice, Roli, Kalawa, Moong peel with lentils, turmeric, incense, millet flour with ghee sugar in a plate on morning.

Make eyes near the bangles. Keep a garland of garlands kept from the day of Holi and Moths in Dakshina are kept in Rayagawa.

Put all things together and offer a water pot on Sheetla Mata (Sheetla Mata). Bayna Minsaker Touch your mother-in-law's feet.

Many people make Basoda Churma in the morning. On this day worship Hanuman ji i.e. Balaji Maharaj, invoke Jalebi and cover the ancestors. Water, roli, jails, bankullahs, flowers, money offered, grow jhwara and everyone should taste the cold bread. Basoda (Basoda) Offer a Buddha Misrani and a virgin girl before being born.

If someone fills a kundara, ask for one big tank and ten small ones. Grind rabri in a kundare, bhat in one, rasgulla in one, moth in one, turmeric in a kundare.

Take money as an economy in Kundare. Worship them by keeping those tendons. Take out turmeric cake and turmeric itself. Later, take the land and similar kundara to Sheetla Mata (Sheetla Mata) and offer it.

After worshiping the kundare, listen to the story of Basode (story of Basod). Sing songs of Sheetla Mata (hymns of Sheetla Mata) on the first day of Basoda.

Bring coach and green greens on the way and keep them on the pandas. If someone's boy or boy is married, then udhiyana (udayan). Take as many more kundaras as you fill in the Udyan.

Basode story (Story of Sheetla Mata)
An old lady was Mai. She used to cook cold bread on Basoda (Basod) and worshiped Sheetla Mata (worship of Sheetla Mata). No one else worshiped in the village except him.

One day, on the day of Basoda, a fire broke out in the entire village and the whole village was burnt but the old lady Mai's liar went away.

Everyone came to old lady Mai and asked that everyone's house be burnt but your house did not burn, what is the matter?

On this the old lady said that I had eaten the cold bread of Basoda and had done the puja of Sheetla Mata (worship of Sheetla Mata) and no one had done so, so my bag was saved and your hut was burnt.

In all the villages, Dhindora was beaten that everyone should eat cold bread on Basoda day and worship Sheetla Mai (worship of Sheetla Mata). Make sure to eat pucca food the day before the mother of Shitala gets hit.

Hey Shitla Mai! To protect everyone as old lady Mai was protected. Protecting all children. Everyone must listen to the story of Sheetla Mata (Story of Sheetla Mata).

Pooja should always be done by laying a red posture.

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