History of Guru Amardas Ji-गुरु श्री अमरदास जी का इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

Latest:

Translate

Search This Blog

“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

History of Guru Amardas Ji-गुरु श्री अमरदास जी का इतिहास

सिखों के तीसरे गुरु श्री अमरदास जी ने गोइंदवाल साहिब की स्थापना कर सिख धर्म के जरिये भेदभाव को मिटाने के प्रयास किए। उन्होंने सांझी बावली का निर्माण कराया और एक साथ बैठकर लंगर चखने की शुरुआत की..

गुरु श्री अमरदास जी ने सिख धर्म के प्रसार में समाज सेवा को आधार बनाया। उन्होंने चली आ रही सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने की पहल की। उन्होंने न सिर्फ स्त्री-शक्ति को यथोचित सम्मान दिया, बल्कि भेदभाव और छुआछूत को मिटाने के लिए उल्लेखनीय कार्य किए।

वैशाख शुक्ल एकादशी, संवत 1536 वि. (23 मई, 1479 ई.) को अमृतसर जिले के 'बासरके' गांव में पिता श्री तेजभान एवं माता लखमी जी के घर जन्म लिया। चार भाइयों में से सबसे बड़े गुरुजी खानदानी व्यापार एवं खेती में व्यस्त रहते। कामकाज के साथ-साथ उनका चित्त सदैव हरि सिमरन में रमा रहता। आध्यात्मिक प्रवृत्ति के कारण ही लोग उन्हें 'भक्त अमरदास' कहते थे। वे वैष्णव मत के अनुयायी थे। उनका विवाह 23 वर्ष की आयु में बीबी रामो के साथ हुआ। मोहन जी, मोहरी जी उनके पुत्र एवं बीबी दानी जी और बीबी भानी जी दो पुत्रियां थीं।


दूसरे गुरु श्री अंगद देव जी की सुपुत्री बीबी अमरो उनके भतीजे के साथ ब्याही हुई थी। एक बार अमृत बेला में उन्होंने बीबी अमरो से श्री गुरु नानक देव जी द्वारा रचित एक 'सबद' सुना। वे सबद से इतने प्रभावित हुए कि बीबी अमरो से पता पूछकर तुरंत दूसरे गुरु के चरणों में आ विराजे। उन्होंने 61 वर्ष की आयु में अपने से 25 वर्ष छोटे और रिश्ते में समधी लगने वाले गुरु अंगद देव जी को गुरु माना और 11 वषरें तक एकनिष्ठ भाव से गुरु की सेवा की। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर और सभी प्रकार से योग्य समझ कर दूसरे गुरु जी ने उन्हें गुरुगद्दी सौंप दी और वे 72 वर्ष की आयु में तीसरे गुरु श्री अमरदास बन गए।

द्वितीय गुरु जी ने उन्हें व्यास नदी के तट पर एक नया नगर बसाने और सिख धर्म का प्रचार करने की आज्ञा दी। इस प्रकार गुरुगद्दी पर विराजमान होने के बाद 1552 ई. में 'गोइंदवाल साहिब' की स्थापना हुई। तीसरे गुरु ने सारे सिख समाज को 22 भागों में बांटकर 22 पीठ स्थापित किए, जिन्हें 'मंजियां' कहा गया। महिला धर्म प्रचारकों के लिए पृथक से 'पीढि़यों' की स्थापना हुई। गुरु जी ने समाज सुधार की ओर भी विशेष ध्यान दिया। भेदभाव, छुआछूत, जाति-पाति को समाप्त करने के उद्देश्य से गोइंदवाल साहिब में सांझी बावली का निर्माण कराया गया। उन्होंने एक पंगत में बैठकर 'लंगर छकने' की प्रथा भी चलाई। मुगल बादशाह अकबर जब गुरु दर्शन हेतु गोइंदवाल साहिब आया, तो उसने भी पंगत में बैठ कर लंगर छका (चखा)। गुरु जी ने सती प्रथा को समाप्त करने में भी विशेष भूमिका निभाई। गुरु जी के दामाद चौथे गुरु श्री रामदास जी ने उनकी आज्ञा से ही 'अमृतसर' सरोवर एवं नगर की स्थापना की। गुरु साहिबान की बानी (वाणी) को संकलित करने का स्वप्न भी उन्होंने ही देखा था, जिसे बाद में उनके नाती पांचवें गुरु अर्जन देव जी ने 'गुरु ग्रंथ साहिब' का संपादन करके पूरा किया। 'गुरु ग्रंथ साहिब' में तीसरे गुरु के 869 सबद, श्लोक व छंद 18 रागों में दर्ज हैं। 'आनंदु साहिब' उनकी उत्कृष्ट वाणी है। समाज सुधारक, महान प्रबंधक एवं तेजस्वी व्यक्तित्व श्री गुरु अमरदास जी 95 वर्ष की आयु में 1574 ई. में गोइंदवाल साहिब में ज्योति जोत समा गए।


Shri Amardas Ji, the third Guru of Sikhs, tried to eradicate discrimination through Sikhism by establishing Goindwal Sahib. He built Sanjhi Baoli and started sitting together and tasting the langar.

Guru Sri Amardas ji made social service the basis for the spread of religion. He took the initiative to end the prevailing social evils. Not only did she give due respect to the power of women, but she did remarkable work to eradicate discrimination and untouchability.

Vaishakh Shukla Ekadashi, Samvat 1536 v. (May 23, 1479 AD) was born in the village of 'Basarke' in Amritsar district to the father Shri Tejbhan and mother Lakhmi ji. Guruji, the eldest of four Muslims, is busy in family business and farming. Along with the work, his mind always remains in Hari Simran. Due to spiritual instincts, people called him 'Bhakta Amardas'. He was a follower of Vaishnavism. He was married at the age of 23 with Bibi Ramo. Mohan ji, Mohri ji were his sons and B Dani ji and B Bhani ji had two daughters.


Bibi Amro, the daughter of the second Guru Shri Angad Dev Ji, was married to his nephew. Once at Amrit Bella he heard a 'Sabad' composed by Sri Guru Nanak Dev Ji from Bibi Amro. He was so impressed with Sabad that immediately after asking the address of Bibi Amro, he came to the feet of another Guru. At the age of 61, he considered Guru Angad Dev Ji, who is 25 years younger than him, and seemed to be in a relationship, and served the Guru with unanimous feeling for 11 years. Pleased with his service and deemed worthy in all respects, the second Guru handed over the Gurugaddi to him and at the age of 72 he became the third Guru Shri Amardas.

Second Guru Ji ordered him to settle a new city on the banks of river Vyas and preach religion. Thus, 1552 AD after being seated on the Gurugaddi. 'Goindwal Sahib' was established in The third Guru set up 22 benches divided into 22 parts of the entire educational society, which were called 'mains'. Separate 'generations' were established for women evangelists. Guru ji also paid special attention to social reform. Sanjhi Baoli was constructed at Goindwal Sahib with the aim of eliminating discrimination, untouchability, caste and caste. He also carried on the practice of 'langar sekhan' sitting in a pant. When the Mughal Emperor Akbar came to Goindwal Sahib for Guru Darshan, he also sat in Prachanda and tasted it. Guruji also played a special role in ending the Sati system. Guru Ji's son-in-law, the fourth Guru Shri Ramdas Ji established the 'Amritsar' lake and city by his orders. He also had a dream to compile Bani (Vani) of Guru Sahiban, which was later fulfilled by his grandson, Five Guru Arjan Dev Ji, quoting 'Guru Granth Sahib'. In the 'Guru Granth Sahib', 869 Sabads, verses and verses of the third Guru are recorded in 18 ragas. 'Anandu Sahib' is his outstanding voice. Social reformer, great manager and brilliant personality Shri Guru Amardas ji at the age of 95 in 1574 AD. In Jyoti holdings in Goindwal Sahib.

No comments:

Post a comment