श्रीराम द्वारा बालि वध - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Tuesday, 28 April 2020

श्रीराम द्वारा बालि वध



हरे राम हो हरे राम हो,
-:-श्रीराम द्वारा बालि वध-:-
काकभुशुण्डि जी कहते हैं कि- हे पक्षियों के राजा गरुड़! नट यानि मदारी जैसे बंदर को नचाता है उसी तरह प्रभु श्रीराम जी सबको नचाते हैं, वेद ऐसा कहते हैं।
तदनन्तर सुग्रीव को साथ लेकर और हाथों में धनुष-बाण धारण करके श्रीराम जी किष्किन्धा की ओर चले। तब श्रीराम जी ने सुग्रीव को बालि के पास भेजा और स्वयं हनुमान और लक्ष्मण के साथ घने वृक्षों की ओट मे खड़े हो गये। और श्रीराम जी का बल पाकर सुग्रीव महल के निकट जाकर बालि को ललकारा, कहाँ छुपा है दुष्ट.... और सुग्रीव की ललकार सुनते ही बालि क्रोध से भरकर महल के बाहर की ओर दौड़ा। तभी उसकी स्त्री तारा ने चरण पकड़कर उसे समझाया है-
हे नाथ! सुनिए,गुप्तचरों से पता चला है- कि सुग्रीव जिनसे मिले हैं वे दोनों भाई तेजवान और बलवान हैं, और कोसलाधीश दशरथ जी के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, वै संग्राम में काल को भी जीत सकते हैं।
बालि ने कहा- हे भीरु! यानि डरपोक प्रिये! सुनो, श्रीराम जी समदर्शी यानि सबको समान देखने वाले हैं। जो कदाचित् वे मुझे मारेंगे ही तो मैं सनाथ हो जाऊँगा यानि परमपद पा जाऊँगा,
ऐसा कहकर वह अभिमानी बालि सुग्रीव को तिनके के समान जानकर चला। दोनों भिड़ गए। भीषण युद्ध होने लगा दोनों की गदायें टकराईं गदा टूट गईं, और मल्लयुद्ध शुरु हो गया, बाली ने सुग्रीव को घूँसो और लातों से मार-मारकर बेसुध कर दिया और इधर श्रीराम जी ने बालि को मारने कि लिये अपने धनुष पर बाण चढ़ाया परन्तु दोनों की शक्ल और शरीर एक समान होने के कारण वे सुग्रीव और बालि में भेद न कर सके। इसलिये उन्होंने बाण नही छोड़ा।
और बालि से मार खाकर सुग्रीव व्याकुल होकर ऋष्यमूक पर्वत की ओर भागा। और श्रीराम जब सुग्रीव के पास पहुँचे तो चोट से घायल सुग्रीव ने कहा- हे कृपालु रघुवीर! मैंने आपसे पहले ही कहा था कि बालि मेरा भाई नहीं है, काल है काल।
श्रीराम जी ने कहा- तुम दोनों भाइयों का भ्रमित करने वाला एक सा रूप है। इसी भ्रम से मैंने उसको नहीं मारा। फिर श्रीराम जी ने सुग्रीव के शरीर को हाथ से स्पर्श किया, जिससे सुग्रीव की सारी पीड़ा जाती रही तब श्रीराम जी ने सुग्रीव के गले में फूलों की माला डाल दी और फिर उसे बड़ा भारी बल देकर भेजा।
सुग्रीव ने किष्किन्धा मे बालि के महल पहुँच बालि को पुनः ललकारा और बालि की स्त्री बहुत चिंतित हो गयी और उसने बालि को बहुत समझाया परन्त बालि ने कहा मै उस द्रोही की ललकार सुनकर छुप नही सकता आज उसे सबक जरुर सिखाऊंगा परन्तु उसके प्राण नही लूँगा,
और आंधी के वेग के समान महल से बाहर आकर सुग्रीव पर टूट पड़ा और दोनों में पुनः अनेक प्रकार से युद्ध हुआ। श्रीराम जी वृक्ष की आड़ से देख रहे थे, और श्रीराम जी ने धनुष तानकर बाण चढ़ाकर चला दिया और बालि के हृदय में बाण लगते ही बालि व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा, और यह सूचना तारा को मिली तो वह अंगद के साथ विलाप करती हुई बालि की ओर दौड़ पड़े ।
और इधर प्रभु श्रीराम जी बालि के पास आये और बालि ने देखा, प्रभु का श्याम शरीर है, सिर पर जटा-जुट बनाए हैं, लाल नेत्र हैं, हाथों मे धनुष और बाण लिए हैं और बालि ने बार-बार प्रभु की ओर देखकर चित्त यानि मन् को उनके चरणों में लगा दिया। प्रभु को पहचानकर उसने अपना जन्म सफल माना। उसके हृदय में प्रीति थी, पर मुख में कठोर वचन थे। फिर प्रभु जी की ओर देखकर बोला- हे गोसाईं। आपने धर्म की रक्षा के लिए अवतार लिया है, और मुझे व्याध यानि शिकारी की तरह छिपकर मारा, मैं बैरी और सुग्रीव प्यारा,
हे नाथ! किस दोष से आपने मुझे मारा है?
तब श्रीराम जी ने कहा- हे मूर्ख! सुन, छोटे भाई की स्त्री, बहन, पुत्र की स्त्री और कन्या- ये चारों समान हैं। इनको जो कोई बुरी दृष्टि से देखता है, उसे मारने में कुछ भी पाप नहीं होता,
हे मूढ़! तुझे अत्यंत अभिमान है। तूने अपनी स्त्री की सीख पर भी ध्यान नहीं दिया। बालि ने कहा- हे श्रीराम जी! सुनिए, स्वामी आपसे मेरी चतुराई नहीं चल सकती। हे प्रभो! अंतकाल में आपकी गति यानि शरण पाकर मैं अब भी पापी ही रहा।
बालि की अत्यंत कोमल वाणी सुनकर श्रीराम जी ने उसके सिर को अपने हाथ से स्पर्श किया और कहा- मैं तुम्हारे शरीर को अचल यानि स्थिर कर दूँ, तुम प्राणों को रोके रखो।
बालि ने कहा- हे कृपानिधान! सुनिए- जिनके नाम के बल से और जिनका नाम लेकर देवाधिदेव महादेव शिवशंकर जी काशी में सबको समान रूप से अविनाशिनी गति यानि मुक्ति दे देते हैं, वह श्रीराम जी स्वयं मेरे नेत्रों के सामने ही खड़े हैं। हे प्रभो! ऐसा संयोग क्या फिर कभी बन पड़ेगा।
और श्रुतियाँ नेति-नेति कहकर निरंतर जिनका गुणगान करती रहती हैं वे ही प्रभु साक्षात् मेरे सामने प्रकट हैं। हे नाथ! अब मुझ पर दयादृष्टि कीजिए, और मैं जो वर माँगता हूँ उसे दीजिए। मैं कर्मवश जिस योनि में जन्म लूँ, वहीं श्रीराम जी के चरणों में प्रेम करूँ! हे कल्याणप्रद प्रभो! यह मेरा पुत्र अंगद है इसे स्वीकार कीजिए और हे देवता और मनुष्यों के नाथ! बाँह पकड़कर इसे अपना दास बना लीजिऐ।
श्रीराम जी के चरणों में दृढ़ प्रीति करके बालि ने शरीर को त्याग दिया, और प्रभु श्रीराम जी ने बालि को अपने परम धाम भेज दिया। बालि की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी। उसके बाल बिखरे हुए हैं और देह की सँभाल नहीं है तारा को व्याकुल देखकर श्रीराम जी ने उसे ज्ञान दिया उन्होंने कहा- पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु- इन पाँच तत्वों से यह अत्यंत अधम शरीर रचा गया है, वह शरीर तो प्रत्यक्ष तुम्हारे सामने सोया हुआ है, और जीव नित्य है। फिर तुम किसके लिए रो रही हो?
और तारा को जब ज्ञान उत्पन्न हो गया, तब वह प्रभु के चरणों मे प्रीति लगी ली और उसने परम भक्ति का वर माँग लिया है।
तदनन्तर श्रीराम जी ने सुग्रीव को आज्ञा दी और सुग्रीव ने विधिपूर्वक बालि का सब मृतक कर्म किया, और शुद्धि हो जाने पर श्रीराम जी ने भाई लक्ष्मण को कहा कि तुम जाकर सुग्रीव को राज्य दे दो। और श्रीराम जी की आज्ञा पाकर भइया लक्ष्मण जी ने तुरंत ही सब नगरवासियों को और ब्राह्मणों को बुलाकर सुग्रीव का राज्याभिषेक कर वानरों का राजा बना दिया और अंगद को युवराज पद दे दिया।
प्रभु श्रीराम जी का स्वभाव अत्यंत ही कृपालु है, उन्होनें सुग्रीव को बुलाकर बहुत प्रकार से उन्हें राजनीति की शिक्षा दी, तभी सुग्रीव ने हाथ जोड़कर निवेदन किया है, प्रभु जी महल में विश्राम कीजिये, और प्रभु ने कहा- हे वानरपति सुग्रीव! सुनो, मैं चौदह वर्ष तक गाँव या बस्ती में नहीं जाऊँगा। ग्रीष्मऋतु बीतकर वर्षाऋतु आ गई। अतः मैं यहीं पास मे ही पर्वत पर टिका रहूँगा, तुम अंगद सहित राज्य करो। मेरे काम का हृदय में सदा ध्यान रखना। तदनन्तर जब सुग्रीव जी किष्किन्धा लौट आए, और प्रभु श्रीराम जी प्रवर्षण पर्वत पर जा टिके।
इधर देवाधिदेव शिव जी कहते हैं- हे उमा! स्वामी श्रीराम जी सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं। हे पार्वती! जगत में श्रीराम जी के समान हित करने वाला गुरु, पिता, माता, बंधु और स्वामी कोई नहीं है। देवता, मनुष्य और मुनि सबकी यह रीति है कि स्वार्थ के लिए ही सब प्रीति करते हैं।
बोलिऐ- सियावर रामचन्द्र की जै ....

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