Cave Mandeep Baba, Rajnandgaon, Chhattisgarh-गुफा मंढीप बाबा, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़ - ॐ जय माता दी ॐ

Latest:

Translate

Search This Blog

“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Wednesday, 29 April 2020

Cave Mandeep Baba, Rajnandgaon, Chhattisgarh-गुफा मंढीप बाबा, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़

​भगवान शिव के इस रुप के दर्शन हेतु 16 बार लांघनी पड़ती है एक ही नदी​



भगवान शिव के विश्वभर में बहुत से मंदिर है। इन में से बहुत से मंदिरों में भगवान शंकर शिवलिंग के रूप में विराजित है। एेसा ही एक मंदिर छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में है। यह मंदिर राजनांदगांव जिले में घनघोर जंगलों के बीचो बीच स्थित है, जहां एक गुफा में शिवलिंग स्थापित है। यह गुफा मंढीप बाबा के नाम जानी जाती है। इस स्थान पर इस शिवलिंग को किसने कब स्थापित किया इसका रहस्य किसी को नहीं पता। यानी शिवलिंग का निर्माण प्राकृतिक रूप से हुआ है। स्थानीय लोंगो के अनुसार यहां बाबा स्वयं प्रकट।
राजनांदगांव-कवर्धा मुख्य मार्ग पर स्थित गंडई से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर मंढीप बाबा की गुफा स्थित है। लेकिन भोलेनाथ के भक्तों को यहां बाबा के दर्शन करने का मौका साल में एक ही दिन अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार को मिलता है। यहां कि सबसे अनोखी और दिलचस्प बात ये है कि यहां जाने के लिए एक ही नदी को 16 बार पार करना पड़ता है। यह कोई अंधविश्वास नहीं है, बल्कि यहां जाने का रास्ता ही इतना घुमावदार है कि वह नदी रास्ते में 16 बार आती है।
साल में एक ही बार जाने के पीछे पुरानी परंपरा के अलावा कुछ व्यवहारिक कठिनाइयां भी हैं। बरसात में गुफा में पानी भर जाता है, जबकि ठंड के मौसम में खेती-किसानी में लोग वहां नहीं जाते। रास्ता भी इतना दुर्गम है कि सात-आठ किलोमीटर का सफर तय करने में घंटो लग जाते हैं। उसके बाद पैदल चलते समय पहले पहाड़ी पर चढ़ना पड़ता है और फिर उतरना, तब जाकर गुफा का दरवाजा मिलता है। यह घोर नक्सल इलाके में पड़ता है, इसलिए भी आम दिनों में लोग इधर नहीं आते।
हर साल अक्षय तृतीया के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार के दिन गुफा के पास इलाके के हजारों लोग इकठ्ठा होते हैं। परंपरानुसार सबसे पहले ठाकुर टोला राजवंश के लोग पूजा करने के बाद गुफा में प्रवेश करते हैं। उसके बाद आम दर्शनार्थियों को प्रवेश करने का मौका मिलता है। गुफा के डेढ़-दो फीट के रास्ते में घुप अंधेरा रहता है। लोग काफी कठिनाई से रौशनी की व्यवस्था साथ लेकर बाबा के दर्शन के लिए अंदर पहुंचते हैं। गुफा में एक साथ 500-600 लोग प्रवेश कर जाते हैं।
गुफा के अंदर जाने के बाद उसकी कई शाखाएं मिलती हैं, इसलिए अनजान आदमी को भटक जाने का डर बना रहता है। ऐसा होने के बाद शिवलिंग तक पहुंचने में चार-पांच घंटे का समय लग जाता है। स्थानीय महंत राधा मोहन वैष्णव का कहना है मैकल पर्वत पर स्थित इस गुफा का एक छोर अमरकंटक में है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि आज तक कोई वहां तक नहीं पहुंच पाया है, लेकिन बहुत पहले पानी के रास्ते एक कुत्ता छोड़ा गया था, जो अमरकंटक में निकला। अमरकंट यहां से करीब पांच सौ किलोमीटर दूर है।

To see this form of Lord Shiva, one river has to be crossed 16 times.


Lord Shiva has many temples around the world. In many of these temples, Lord Shankar is enthroned as Shivling. One such temple is in Rajnandgaon district of Chhattisgarh. This temple is located in the middle of dense forests in Rajnandgaon district, where Shivalinga is installed in a cave. This cave is known as Mandeep Baba. No one knows the secret of who established this Shivling at this place. That is, the Shivling is formed naturally. According to local people, Baba manifested himself here.
About 35 km from Gandai, located on the Rajnandgaon-Kawardha main road, Mandeep Baba's cave is located. But the devotees of Bholenath get the opportunity to see Baba here on the first Monday after Akshaya Tritiya on the same day of the year. The most unique and interesting thing here is that one has to cross the same river 16 times to get here. This is not a superstition, but the way to get here is so winding that the river comes 16 times on the way.
There are some practical difficulties besides going back to the old tradition once a year. The rain fills the cave, while people do not go there for farming in the winter. The road is also so inaccessible that it takes hours to cover a journey of seven to eight kilometers. After that while walking, one has to first climb the hill and then descend, then go and find the door of the cave. It falls in the extreme Naxal area, so even on ordinary days people do not come here.
Every year on the first Monday after Akshaya Tritiya, thousands of people from the area gather near the cave. According to tradition, the people of Thakur Tola dynasty first enter the cave after worshiping. After that, ordinary visitors get a chance to enter. The cave is dark in the path of one and a half to two feet. People, with a lot of difficulty, reach inside to see Baba with the arrangement of light. 500–600 people enter the cave simultaneously.
Many branches of the cave are found after entering the cave, so the unknown man remains afraid of going astray. After this it takes four-five hours to reach the Shivling. Local Mahant Radha Mohan Vaishnav says that one end of this cave located on Maikal mountain is in Amarkantak. Though he also said that till date no one has reached there, but a dog was left on the water long ago, which came out in Amarkantak. Amarkant is about five hundred kilometers away from here.

No comments:

Post a comment