Christmas festival-क्रिसमस का त्योहार - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Christmas festival-क्रिसमस का त्योहार

क्रिसमस एक ऐसा त्यौहार है जिसे शायद दुनिया के सर्वाधिक लोग पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। आज यह त्यौहार विदेशों में नहीं बल्कि भारत में भी समान जोश के साथ मनाया जाता है। भारत की विविधतापूर्ण संस्कृति के साथ क्रिसमस का त्यौहार भी पूरी तरह घुल-मिल गया है। सदियों से यह त्यौहार लोगों को खुशियां बांटता और प्रेम और सौहार्द की मिसाल कायम करता रहा है। यह त्यौहार हमारे सामाजिक परिवेश का प्रतिबिंब भी है, जो विभिन्न वर्गों के बीच भाईचारे को मजबूती देता आया है। क्रिसमस का अर्थ मानव मुक्ति और समानता है। बाइबिल के अनुसार, ईश्वर ने अपने भक्त याशायाह के माध्यम से 800 ईसा पूर्व ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि इस दुनिया में एक राजकुमार जन्म लेगा और उसका नाम इमेनुएल रखा जाएगा। इमेनुएल का अर्थ है ‘ईश्वर हमारे साथ‘। याशायाह की भविष्यवाणी सच साबित हुई और यीशु मसीह का जन्म इसी प्रकार हुआ।



बालक यीशु के जन्म की सबसे पहली खबर इस दुनिया के सबसे निर्धन वर्ग के लोगों को मिली थी। वे कड़ी मेहनत करने वाले गड़रिये थे। सर्दी की रात जब उन्हें यह खबर मिली तो वे खुले आसमान के निचे खतरों से बेखबर सोती हुई अपनी भेड़ों की रखवाली कर रहे थे। एक तारा चमका और स्वर्ग-दूतों के दल ने गड़रियों को खबर दी कि तुम्हारे बीच एक ऐसे बालक ने जन्म लिया है, जो तुम्हारा राजा होगा। पूरी दुनिया के गरीब यह खबर सुनकर जहां खुश हुए, वहीं गरीबों पर जुल्म करने वाला राजा हेरोदेस नाराज हो गया। उसने अपने राज्य में 2 वर्ष की उम्र तक के सभी बच्चों को कत्ल करने का आदेश जारी कर दिया, ताकि उसकी सत्ता को भविष्य में किसी ऐसे राजा से खतरा न रहे। अच्छाई को देखकर बुराई करने वाले इसी तरह दुखी और नाराज होते हैं। यही शैतानियत का प्रतीक है। ईसा मसीह इसी शैतानियत को खत्म करने के लिए आए थे।
ईसा मसीह ने मानव के रूप में जन्म लेने के लिए किसी संपन्न व्यक्ति का घर नहीं चुना। उन्होंने एक गरीब व्यक्ति के घर की गोशाला में घास पर जन्म लिया। दरअसल, वे गरीब, भोले-भाले और शोषित व पीड़ित लोगों का उद्धार करने आये थे। इसीलिए उन्होंने जन्म से ही ऐसे लोगों के बीच अपना स्थान चुना। यह बहुत बड़ा संदेश था।
30 वर्ष की आयु में ईसा मसीह ने सामाजिक अव्यवस्था के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की। उन्होंने जनता को दीन-दुखियों और लाचारों की सहायता करने, प्रेमभाव से रहने, लालच न करने, ईश्वर और राज्य के प्रति कर्तव्यनिष्ठ रहने, जरूरतमंद की जरूरत पूरी करने, आवश्यकता से ज्यादा धन संग्रह न करने का उपदेश दिया। आज ईसा मसीह के दिए हुए संदेशों की प्रासंगिकता बहुत ज्यादा है, क्योंकि भले ही सामाजिक बुराइयों ने अपना रूप बदल लिया हो, लेकिन वे आज भी समाज में विद्यमान हैं और गरीबों, लाचारों, शोषितों, पीड़ितों और दलितों को उनका शिकार होना पड़ता है।
ईसा मसीह ने समाज को समानता का पाठ पढ़ाया था। उन्होंने बार-बार कहा कि वे ईश्वर के पुत्र हैं और भले ही इस दुनिया में क्रूरता, अन्याय और गैर-बराबरी जैसी अनेक बुराइयां हैं, पर ईश्वर के घर में सभी बराबर हैं। उन्होंने ऐसा ही समाज बनाने पर जोर दिया, जिसमें क्रूरता व अन्याय की जगह न हो और सभी प्रेम और समानता के साथ रहें। ऐसी ही एक कहानी बाइबिल में आती है, जो एक सामरी संप्रदाय की स्त्री की है। जब ईसा मसीह ने उससे पीने के लिए पानी मांगा तो स्त्री ने कहा कि तू यहूदी होकर मुझ सामरी स्त्री से पानी क्यों मांगता है? दरअसल, यहूदी लोग सामरियों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखते थे और उन्हें कमतर मानते थे। लेकिन ईसा ने उसके हाथ का पानी पिया। ईसा मसीह ने दलित, दमित और असहाय लोगों को आशा और जीवन का संदेश दिया। उन्होंने अपना पूरा जीवन मानव कल्याण में लगाया। यही वजह थी कि उन्हें क्रॉस पर मृत्युदंड भी दिया गया। लेकिन दूसरों के हित में काम करने वाले मृत्युदंड से कब भयभीत हुए हैं।
क्रिसमस का त्यौहार कई चीजों के लिए खास होता है जैसे क्रिसमस ट्री, स्टार, गिफ्टस आदि। और हां, कई लोग मानते हैं क्रिसमस के दिन सांता क्लॉज बच्चों को उपहार देता है। सांता क्लॉज को याद करने का चलन 4वीं शताब्दी से आरंभ हुआ था और वे संत निकोलस थे जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे। सांता क्लाज़ लाल व सफेद ड्रेस पहने हुए, एक व्रद्ध मोटा पौराणिक चरित्र है, जो रेन्डियर पर स्वार होता है तथा समाराहों में, विशेष कर बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

क्रिसमस  उम्मीदों और खुशियों का त्यौहार है। ईसा मसीह का जीवन और उनके उपदेश आज भी इसलिए प्रासंगिक हैं, क्योंकि आज भी अमीरी-गरीबी, जातिवाद और सामाजिक विसंगतियां समाज में मौजूद हैं। जब हम अपने आसपास नजर डालेंगे और गरीब व लाचार लोगों के दुख-दर्द को समझेंगे और ईसा मसीह की तरह अपनी कोशिशों से उनके चेहरे पर थोड़ी-सी मुस्कान लाएंगे, तभी हमें क्रिसमस की वास्तविक खुशियां मिलेंगी।

Christmas is a festival that is celebrated by most people in the world with full fervor. Today this festival is celebrated with equal fervor not only in abroad but also in India. The Christmas festival has also completely merged with India's diverse culture. For centuries, this festival has brought happiness to the people and has been an example of love and harmony. This festival is also a reflection of our social environment, which has been strengthening the brotherhood between different classes. Christmas means human liberation and equality. According to the Bible, God, through his devotee Isaiah, foretold 800 BC that a prince would be born in this world and would be named Emmanuel. Emanuel means 'God with us'. Isaiah's prophecy came true and this is how Jesus Christ was born.
The first news of the birth of the child Jesus was received by the poorest people of this world. They were hard-working shepherds. When they got this news on a cold winter night, they were guarding their sheep sleeping unaware of the dangers of the open sky. A star shone and a group of angels informed the shepherds that a child was born among you, who would be your king. While the poor of the whole world were happy to hear this news, King Herod, who oppressed the poor, got angry. He issued orders to kill all the children up to the age of 2 in his kingdom, so that his power would not be threatened by such a king in future. The evil-doers are similarly sad and angry at seeing goodness. This is the symbol of evil. Jesus Christ came to end this evil.
Jesus did not choose the home of a rich person to be born as a human. He was born on grass in a poor man's house. Actually, he came to save the poor, the innocent and the exploited and the oppressed. That is why from birth he chose his place among such people. It was a big message.
At the age of 30, Jesus raised his voice against social disorder. He preached to the people to help the oppressed and helpless, to live lovingly, not to covet, to be dutiful to God and the state, to meet the need of the needy, not to collect more money than necessary. Today the messages given by Jesus Christ are very relevant, because even though the social evils have changed their form, they are still present in the society and the poor, helpless, exploited, victims and dalits have to fall prey to them.
Jesus taught equality to society. He repeatedly said that he is the son of God and even though there are many evils in this world like cruelty, injustice and equality, all are equal in the house of God. He stressed on creating a society in which cruelty and injustice are not in place and all should live with love and equality. One such story appears in the Bible, which is about a woman from a Samaritan sect. When Jesus asked her for water to drink, the woman said, "Why do you become a Jew and ask for water from a Samaritan woman?" In fact, the Jewish people did not treat the Samaritans in any way and considered them inferior. But Jesus drank the water in his hand. Jesus gave the message of hope and life to the downtrodden, oppressed and helpless people. He devoted his entire life to human welfare. This was the reason that he was also given the death penalty on the cross. But when have those who work in the interest of others become afraid of capital punishment.
Christmas festival is special for many things like Christmas tree, star, gifts etc. And of course, many believe that Santa Claus gives gifts to children on Christmas. The practice of remembering Santa Claus began in the 4th century and was Saint Nicholas, the bishop of the city of Meera, Turkistan. Santa Claus, wearing a red and white dress, is an old fat mythological character who swarms on the reindeer and plays an important role in the Samaras, especially for children.
Christmas is a festival of hopes and joys. The life of Jesus Christ and his teachings are relevant even today, because rich-poverty, casteism and social anomalies still exist in society. When we look around us and understand the pain and suffering of poor and helpless people and bring a little smile on their face like Jesus Christ, only then we will get the real joy of Christmas.

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