Guga Jahar Peer Jayanti- गुगा जाहर पीर जयंती - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Guga Jahar Peer Jayanti- गुगा जाहर पीर जयंती

मध्यकालीन महापुरूष गोगाजी हिंदू, मुस्लिम, सिख संप्रदायों की सहानुभूति व श्रद्घा अर्जित कर एक धर्मनिरपेक्ष लोकदेवता के नाम से पीर के रूप में प्रसिद्व हुए। गोगाजी का जन्म राजस्थान के ददरेवा (चुरू) चौहान वशं के राजपूत शासक जैबर की पत्नी बाछल के गर्भ से गुरू गोरखनाथ के वरदान से भादो शुदी नवमी को हुआ था। इनके जन्म की भी विचित्र कहानी है। एक किवदंती के अनुसार गोगाजी का माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नही मिला। गुरू गोरखनाथ गोगामेडी के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हे पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और कहा कि वे अपनी तपस्या पूरी होने पर उन्हें ददरेवा आकर प्रसाद देंगे जिसे ग्रहण करने पर उन्हे संतान की प्राप्ति होगी। तपस्या पूरी होने पर गुरू गोरखनाथ बाछल देवी के महल पहुंचे। उन दिनों बाछल देवी की सगी बहन काछल देवी अपनी बहन के पास आई हुई थी। गुरू गोरखनाथ से काछल देवी ने प्रसाद ग्रहण कर लिया और दो दाने अनभिज्ञता से प्रसाद के रूप में खा गई। काछल देवी गर्भवती हो गई। बाछल देवी को जब यह पता चला तो वह पुनः गोरखनाथ की शरण मे गई। गुरू बोले, देवी ! मेरा आशीर्वाद खाली नहीं जायेगा तुम्हे पुत्ररत्न की प्राप्ति अवश्य होगी। गुरू गोरखनाथ ने चमत्कार से एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत भादो माह की नवमी को गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा। चौहान वंश में राजा पृथ्वीराज चौहान के बाद गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा थे। गोगाजी का राज्य सतलुज सें हांसी (हरियाणा) तक था। गोगामेडी में गोगाजी का मंदिर एक ऊंचे टीले पर मस्जिदनुमा बना हुआ है, इसकी मीनारें मुस्लिम स्थापत्य कला का बोध कराती हैं। मुख्य द्वार पर बिस्मिला अंकित है। मंदिर के मध्य में गोगाजी का मजार है (कब्र) है। साम्प्रदायिक सद़भावना के प्रतीक गोगाजी के मंदिर का निर्माण बादशाह फिरोजशाह तुगलक ने कराया था। संवत 362 में फिरोजशाह तुगलक हिसार होते हुए सिंध प्रदेश को विजयी करने जाते समय गोगामेडी में ठहरे थे। रात के समय बादशाह तुगलक व उसकी सेना ने एक चमत्कारी दृश्य देखा कि मशालें लिए घोड़ों पर सेना आ रही है। तुगलक की सेना में हा-हाकार मच गया। तुगलक कि सेना के साथ आए धार्मिक विद्वानों ने बताया कि यहां कोई महान हस्ती आई हुई है। वो प्रकट होना चाहती है। फिरोज तुगलक ने लड़ाई के बाद आते गोगामेडी में मस्जिदनुमा मंदिर का निर्माण करवाया और पक्की मजार बन गई। तत्पश्चात मंदिर का जीर्णोद्वार बीकानेर के महाराज काल में 1887 व 1943 में करवाया गया। गोगाजी का यह मंदिर आज हिंदू, मुस्लिम, सिख व ईसाईयों में समान रूप से श्रद्वा का केंद्र है। सभी धर्मो के भक्तगण यहां गोगा मजार के दर्शनों हेतु भादव मास में उमड़ पडते हैं। राजस्थान का यह गोगामेडी नाम का छोटा सा गांव भादव मास में एक नगर का रूप ले लेता है और लोगों का अथाह समुद्र बन जाता है। गोगा भक्त पीले वस्त्र धारण करके अनेक प्रदेशों से यहां आते हैं। सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश व बिहार के भक्तों की होती है। नर-नारियां व बच्चे पीले वस्त्र धारण करके विभिन्न साधनों से गोगामेडी पहुंचते हैं। स्थानीय भाषा में इन्हें पूरबिये कहते हैं। भक्तजन अपने-अपने निशान जिन्हे गोगाछड़ी भी कहते हैं लेकर मनौति मांगने नाचते-गाते ढप व डमरू बजाते व कुछ एक सांप लिए भी आते हैं। गोगा को सापों के देवता के रूप में भी माना जाता है। हर धर्म व वर्ग के लोग गोगाजी की छाया चढ़ाकर नृत्य की मुद्रा में सांकल खाते व पदयात्रा करते तथा गोरखनाथ टीले से लेटते हुए गोगाजी के समाधि स्थल तक पहुंचते हैं। नारियल, बताशे का प्रसाद चढ़ाकर मनौति मांगते र्हैं। श्रीगोगा नवमी : भाद्रपद श्रीकृष्णाष्टमी के दूसरे दिन की पुण्य तिथि नवमी ही "" गोगा नवमी "" नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन वीर गोगाजी का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इनकी जन्मस्थली "" ददरेबा "" नामक स्थान है जो राजस्थान के चूरू जिले में स्थित है। इस दिन गोगाजी के भक्तगण अपने घरों में अखण्डजोत जलाकर जागरण करते हैं और अपने परम्परागत वाद्य यंत्रों की घवनि के साथ गोगाजी की शौर्यगाथा और जन्मकथा का श्रवण करते हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार श्रीगोगाजी महाराज को जाहरवीर, गोगावीर, गुगालवीर, गोगागर्भी ओर जाहरजहरी नाम से भी जाना जाता है। बाबा की पूजा सामग्री में लौंग, जायफल, कर्पूर, गुग्गुल और गाय का घी प्रयोग में लिया जाता है। प्रसाद के रूप में हरी दूब और चने की दाल समर्पित की जाती है और उनकी समाघि पर चंदन चूरा मला जाता है। भक्तों की मान्यता है कि वे आज भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उनका मार्गदर्शन करते हैं। इसी कारण उन्हें प्रकटवीर कहा जाता है।

Medieval legends Gogaji gained fame and sympathy for Hindu, Muslim, Sikh sects and became famous as Pir by the name of a secular folk god. Gogaji was born to Bhado Shudi Navami from the boon of Guru Gorakhnath from the womb of Bachhal, the wife of Jabber, the Rajput ruler of Dadreva (Churu) Chauhan Vasanth of Rajasthan. There is also a strange story of his birth. According to a legend, Gogaji's mother Bachhal Devi was childless. Even after doing all the efforts to get children, the child did not get happiness. Guru Gorakhnath was doing penance on the mound of Gogamedi. Bachhal Devi went to his shelter and Guru Gorakhnath gave him the boon of getting a son and said that on completion of his penance, he would come to Dadreva and give him prasad, which he would get a child upon receiving. On completion of penance, Guru Gorakhnath reached the palace of Bachhal Devi. In those days, Kachhal Devi, the real sister of Bachhal Devi, came to her sister. Kaachala Devi received the Prasad from Guru Gorakhnath and two grains ignorantly devoured as Prasad. Kathal Devi became pregnant. When Bachal Devi came to know of this, she again went to the shelter of Gorakhnath. Guru said, Goddess! My blessings will not go empty, you will definitely get the son of sons. Guru Gorakhnath miraculously gave a fruit called a googal in the form of offerings. After eating Prasad, Bachhal Devi became pregnant and thereafter Gogaji was born on the Navami of Bhado month. His name was Gogaji after the name of Googal fruit. In the Chauhan dynasty, King Prithviraj Chauhan was followed by Gogaji Veer and a famous king. Gogaji's kingdom was as far as Satluj Hansi (Haryana). Gogaji's temple in Gogamedi is mosque-like on a high mound, its towers give a sense of Muslim architecture. Bismila is inscribed on the main gate. In the middle of the temple is Gogaji's tomb (tomb). The temple of Gogaji, a symbol of communal harmony, was built by Emperor Ferozeshah Tughlaq. In Samvat 362, Ferozeshah Tughlaq stayed in Gogamedi while on his way to conquer Sindh state via Hisar. At night, King Tughlaq and his army saw a miraculous scene that the army was coming on horses with torches. There was chaos in Tughlaq's army. The religious scholars who came with Tughlaq's army told that a great figure has come here. She wants to appear. Feroze Tughlaq built the mosque in Gogamedi after the fight and built a tomb. Thereafter, the temple was renovated in 1887 and 1943 during the Maharaja period of Bikaner. This temple of Gogaji is today the center of reverence among Hindus, Muslims, Sikhs and Christians alike. Devotees of all religions throng here in the month of Bhadava to see the Goga Mazar. This small village named Gogamedi in Rajasthan takes the form of a city in the month of Bhadava and becomes a sea of ​​people. Goga devotees wearing yellow clothes come here from many regions. Maximum number of devotees are from Uttar Pradesh and Bihar. Men and women, wearing yellow clothes, reach Gogamedi by various means. In the local language, they are called Purbia. Devotees bring their own marks, which are also called Gogachhadi, to dance, sing dhap and damru, and some even take a snake. Goga is also considered as the god of serpents. People of all religions and classes take a shadow of Gogaji, perform a Sankal and dance in the dance posture and lie down from the Gorakhnath mound and reach the memorial site of Gogaji. Coconut, with the offerings of Betashe, ask for manuti. Shrigoga Navami: The death anniversary of the second day of Bhadrapada Srikrishnaashtami is known as Navami only "" Goga Navami "". The birth anniversary of Veer Gogaji is celebrated on this day. His birthplace is a place called "Dadreba" which is located in Churu district of Rajasthan. On this day, the devotees of Gogaji wake up in their homes by lighting Akhandjot and listen to the valor and horoscope of Gogaji with the sound of their traditional musical instruments. According to ancient beliefs, Shrigogaji Maharaj is also known as Jaharveer, Gogavir, Gugalveer, Gogagarbhi and Jaharjhari. Cloves, nutmeg, camphor, guggul and cow's ghee are used in Baba's worship materials. As a prasad, green beans and gram lentils are dedicated and sandalwood powder is rubbed on their tomb. Devotees believe that even today they directly and indirectly guide them. This is the reason why he is called manifest. 

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