History of Minakshi Devi Temple मिनाक्षी देवी मंदिर का इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Wednesday, 22 April 2020

History of Minakshi Devi Temple मिनाक्षी देवी मंदिर का इतिहास



Introduction:

मीनाक्षी सुन्दरेश्वरर मन्दिर या मीनाक्षी अम्मां मन्दिर या केवल मीनाक्षी मन्दिर (तमिल: மீனாக்ஷி அம்மன் கோவில்) भारत के तमिल नाडु राज्य के मदुरई नगर, में स्थित एक ऐतिहासिक मन्दिर है। यह हिन्दू देवता शिव (“‘सुन्दरेश्वरर”’ या सुन्दर ईश्वर के रूप में) एवं उनकी भार्या देवी पार्वती (मीनाक्षी या मछली के आकार की आंख वाली देवी के रूप में) दोनो को समर्पित है। यह ध्यान योग्य है कि मछली पांड्य राजाओं को राजचिह्न है। यह मन्दिर तमिल भाषा के गृहस्थान 2500 वर्ष पुराने मदुरई नगर, की जीवनरेखा है।
हिन्दु पौराणिक कथानुसार भगवान शिव सुन्दरेश्वरर रूप में अपने गणों के साथ पांड्य राजा मलयध्वज की पुत्री राजकुमारी मीनाक्षी से विवाह रचाने मदुरई नगर में आये थे। मीनाक्षी को देवी पार्वती का अवतार माना जाता है। इस मन्दिर को देवी पार्वती के सर्वाधिक पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। अन्य स्थानों में कांचीपुरम का कामाक्षी मन्दिर, तिरुवनैकवल का अकिलन्देश्वरी मन्दिर एवं वाराणसी का विशालाक्षी मन्दिर प्रमुख हैं ।
इस मन्दिर का स्थापत्य एवं वास्तु आश्चर्यचकित कर देने वाला है, जिस कारण यह आधुनिक विश्व के सात आश्चर्यों की सूची में प्रथम स्थान पर स्थित है, एवं इसका कारण इसका विस्मयकारक स्थापत्य ही है। इस इमारत समूह में 12 भव्य गोपुरम हैं, जो अतीव विस्तृत रूप से शिल्पित हैं। इन पर बडी़ महीनता एवं कुशलतापूर्वक रंग एवं चित्रकारी की गई है, जो देखते ही बनती है। यह मन्दिर तमिल लोगों का एक अति महत्वपूर्ण द्योतक है, एवं इसका वर्णन तमिल साहित्य में पुरातन काल से ही होता रहा है। हालांकि वर्तमान निर्माण आरम्भिक सत्रहवीं शताब्दी का बताया जाता है। 
पौराणिक कथा
हिन्दू आलेखों के अनुसार, भगवान शिव पृथ्वी पर सुन्दरेश्वरर रूप में मीनाक्षी से, जो स्वयं देवी पार्वती का अवतार थीं; उनसे विवाह रचाने आये (अवतरित हुए)। देवी पार्वती ने पूर्व में पाँड्य राजा मलयध्वज, मदुरई के राजा की घोर तपस्या के फलस्वरूप उनके घर में एक पुत्री के रूप में अवतार लिया था। वयस्क होने पर उसने नगर का शासन संभाला। तब भगवान आये और उनसे विवाह प्रस्ताव रखा, जो उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस विवाह को विश्व की सबसे बडी़ घटना माना गया, जिसमें लगभग पूरी पृथ्वी के लोग मदुरई में एकत्रित हुए थे। भगवान विष्णु स्वयं, अपने निवास बैकुण्ठ से इस विवाह का संचालन करने आये। ईश्वरीय लीला अनुसार इन्द्र के कारण उनको रास्ते में विलम्ब हो गया। इस बीच विवाह कार्य स्थानीय देवता कूडल अझघ्अर द्वारा संचालित किया गया। बाद में क्रोधित भगवान विष्णु आये, और उन्होंने मदुरई शहर में कदापि ना आने की प्रतिज्ञा की। और वे नगर की सीम से लगे एक सुन्दर पर्वत अलगार कोइल में बस गये। बाद में उन्हें अन्य देवताओं द्वारा मनाया गया, एवं उन्होंने मीनाक्षी-सुन्दरेश्वरर का पाणिग्रहण कराया।


यह विवाह एवं भगवान विष्णु को शांत कर मनाना, दोनों को ही मदुरई के सबसे बडे़ त्यौहार के रूप में मनाया जाता है, जिसे चितिरई तिरुविझा या अझकर तिरुविझा, यानि सुन्दर ईश्वर का त्यौहार । इस दिव्य विवाह पर एक बडा़ लेख यहां मिल सकता है।

इस दिव्य युगल द्वारा नगर पर बहुत समय तक शासन किया गया। यह वर्णित नहीं है, कि उस स्थान का उनके जाने के बाद्, क्या हुआ? यह भी मना जाता है, कि इन्द्र को भगवान शिव की मूर्ति शिवलिंग रूप में मिली, और उन्होंने मूल मन्दिर बनवाया। इस प्रथा को आज भी मन्दिर में पालन किया जाता है ― त्यौहार की शोभायात्रा में इन्द्र के वाहन को भी स्थान मिलता है।
आधुनिक इतिहास

आधुनिक ढांचे का इतिहास सही सही अभी ज्ञात नहीं है, किन्तु तमिल साहित्य के अनुसार, कुछ शताब्दियों पहले का बताया जाता है। तिरुज्ञानसंबन्दर, प्रसिद्ध हिन्दु शैव मतावलम्बी संत ने इस मन्दिर को आरम्भिक सातवीं शती का बताया है, औरिन भगवान को आलवइ इरैवान कह है।[8] इस मन्दिर में मुस्लिम शासक मलिक कफूर ने 1310 में खूब लूटपाट की थी।, और इसके प्राचीन घटकों को नष्ट कर दिया। फिर इसके पुनर्निर्माण का उत्तरदायित्व आर्य नाथ मुदलियार (1559-1600 A.D.), मदुरई के प्रथम नायक के प्रधानमन्त्री, ने उठाया। वे ही 'पोलिगर प्रणाली' के संस्थापक थे। फिर तिरुमलय नायक, लगभग 1623 से 1659 का
सर्वाधिक मूल्यवान योगदान हुआ। उन्होंने मन्दिर के वसंत मण्डप के निर्माण में उल्लेखनीय उत्साह दिखाया।
मन्दिर
शिव मन्दिर समूह के मध्य में स्थित है, जो देवी के कर्मकाण्ड बाद में अधिक बढने की ओर संकेत करता है। इस मन्दिर में शिव की नटराज मुद्रा भी स्थापित है। शिव की यह मुद्रा सामान्यतः नृत्य करते हुए अपना बांया पैर उठाए हुए होती है, परन्तु यहां उनका बांया पैर उठा है। एक कथा अनुसार राजा राजशेखर पांड्य की प्रार्थना पर भगवान ने अपनी मुद्रा यहां बदल ली थी। यह इसलिये था, कि सदा एक ही पैर को उठाए रखने से, उस पर अत्यधिक भार पडे़गा। यह निवेदन उनके व्यक्तिगत नृत्य अनुभव पर आधारित था।   यह भारी नटराज की मूर्ति, एक बडी़ चांदी की वेदी में बंद है, इसलिये इसे वेल्ली अम्बलम् (रजत आवासी) कहते हैं। इस गृह के बाहर बडे़ शिल्प आकृतियां हैं, जो कि एक ही पत्थर से बनी हैं। इसके साथ ही यहां एक वृहत गणेश मन्दिर भी है, जिसे मुकुरुनय विनायगर् कहते हैं। इस मूर्ति को मन्दिर के सरोवर की खुदाई के समय निकाला गया था।  मीनाक्षी देवी का गर्भ गृह शिव के बांये में स्थित है। और इसका शिल्प स्तर शिव मन्दिर से निम्न है।

मन्दिर का ढाँचा
इस मन्दिर का गर्भगृह 3500 वर्ष पुराना[9] है, इसकी बाहरी दीवारें और अन्य बाहरी निर्माण लगभग 1500-2000 वर्ष पुराने[10]
हैं। इस पूरे मन्दिर का भवन समूह लगभग 45 एकड़ भूमि में बना है, जिसमें मुख्य मन्दिर भारी भरकम निर्माण है, और उसकी लम्बाई 254मी एवं चौडा़ई 237 मी है। मन्दिर बारह विशाल गोपुरमों से घिरा है, जो कि उसकी दो परिसीमा भीत (चार दीवारी) में बने हैं। इनमें दक्षिण द्वार का गोपुरम सर्वोच्च है।
द्वार दिशातल संख्याऊँचाईशिल्प संख्या
पूर्वीनौ161'3"1011
दक्षिणीनौ170'6"1511
पश्चिमीनौ163'3"1124
उत्तरीनौ160'6"सबसे कम

Introduction:

Meenakshi Sundareswarar Temple or Meenakshi Ammaan Temple or simply Meenakshi Temple (Tamil: மீனாக்ஷி அம்மன் கோவில்) is a historical temple located in Madurai city, Tamil Nadu state of India. It is dedicated to both the Hindu deity Shiva (as "Sundareswarar" or beautiful god) and his Indian goddess Parvati (in the form of Meenakshi or fish-shaped goddess). It is worth noting that fish is a regalia to the Pandya kings. The temple is the lifeline of the 2500-year-old Madurai city, a Tamil-language homestead.
According to Hindu mythology, Lord Shiva came to Madurai city to marry his princess, Meenakshi, daughter of Pandya king Malayadhwaja, in the form of Sundareswarar. Meenakshi is considered an incarnation of Goddess Parvati. This temple is considered to be one of the most sacred places of Goddess Parvati. Other places are Kamakshi Temple in Kanchipuram, Akilandeshwari Temple in Thiruvanackaval and Vishalakshi Temple in Varanasi.
The architecture and architecture of this temple is astonishing, due to which it is ranked first in the list of seven wonders of the modern world, and the reason for this is its awe-inspiring architecture. The building group consists of 12 grand gopurams, which are elaborately crafted. They have been painted and painted with great precision and skill, which is made on sight. This temple is a very important emblem of the Tamil people, and it has been described since ancient times in Tamil literature. Although the current construction is said to be of the early seventeenth century. In the same way, there are many more.
mythology
According to Hindu scriptures, Lord Shiva appeared in the form of Sundareswarar on earth from Meenakshi, herself an incarnation of Goddess Parvati; He came to marry her (she came). Goddess Parvati had incarnated as a daughter in the past due to the severe penance of Pandya king Malayadhwaj, the king of Madurai. As an adult, he took over the reins of the city. Then God came and proposed marriage to her, which she accepted. This marriage was considered to be the biggest event in the world, in which almost all the people of the earth gathered in Madurai. Lord Vishnu himself came to conduct this marriage from his residence Baikuntha. According to Divine Leela, Indra got delayed on his way. Meanwhile the marriage work was conducted by the local deity Koodal Azhaghar. Later the enraged Lord Vishnu came, and vowed never to come to the city of Madurai. And they settled in Alagara Koil, a beautiful mountain bordering the city. Later he was celebrated by other deities, and he took Meenakshi-Sundareswarar.
Both this marriage and the pacification of Lord Vishnu are celebrated as the biggest festival in Madurai, Chitirai Tiruvizha or Azhakara Tiruvizha, ie the festival of the beautiful God. A large article on this divine marriage can be found here.
The city was ruled for a long time by this divine couple. It is not described what happened after they left that place. It is also celebrated that Indra got the idol of Lord Shiva in the form of Shivalinga, and he built the original temple. This practice is followed even today in the temple - Indra's vehicle also finds a place in the procession of the festival.
modern history
The history of the modern structure is not known right now, but according to Tamil literature, it is told a few centuries ago. Tirugnasambandar, the famous Hindu Shaiva Matavalambi saint, has described this temple as the early seventh century, and the god is called Alavai Iraivan. [8] The temple was looted by the Muslim ruler Malik Kafur in 1310, and its ancient components. Destroyed. Arya Nath Mudaliar (1559–1600 A.D.), the Prime Minister of the first Nayak of Madurai, then took responsibility for its reconstruction. He was the founder of the 'Poligar system'. Then Tirumalaya Nayaka, circa 1623 to 1659
The most valuable contribution was made. He showed remarkable enthusiasm in the construction of the temple's Vasant Mandap.
The temple
The Shiva Temple is located in the middle of the group, which indicates the Goddess's rituals to increase later. The Nataraja mudra of Shiva is also installed in this temple. This posture of Shiva is usually with his left leg raised while dancing, but here his left leg is raised. According to a legend, the Lord changed his posture here on the prayer of King Rajasekhar Pandya. This was because by always lifting one leg, it would put a lot of weight on it. This request was based on his personal dance experience. This massive Nataraja idol is enclosed in a large silver altar, hence it is called Velli Ambalam (Silver Resident). Outside this house there are large craft figures, which are made of the same stone. Along with this there is also a large Ganesh temple, which is called Mukurunay Vinayagar. This idol was taken out during the excavation of the lake of the temple. Meenakshi Devi's womb is located to the left of Shiva. And its craft level is lower than the Shiva temple.

Temple structure

The sanctum sanctorum of this temple is 3500 years old [9], its exterior walls and other exterior construction are around 1500-2000 years old [10]

Huh. The entire group of buildings is built in about 45 acres of land, with the main temple being heavily built, and its length is 254 m and width 237 m. The temple is surrounded by twelve huge gopurams, which are built in its two boundary walls (four walls). The gopuram of the south gate is the highest among them.

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