History of Shri Kalahasti Temple-श्री कालहस्ती मंदिर का इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Tuesday, 28 April 2020

History of Shri Kalahasti Temple-श्री कालहस्ती मंदिर का इतिहास





आंध्र प्रदेश में एक ऐसा मंदिर है जहां राहुकाल की बड़ी पूजा होती है। यही नहीं इस मंदिर की कमाई भी कम नहीं हैं। राज्य के चित्तूर जिले में स्थित श्री कालाहस्ती मंदिर की सालाना कमाई सौ करोड़ रुपए से भी अधिक है। यह मंदिर वास्तव में भगवान शिव का मंदिर है, लेकिन यहां राहुकाल की पूजा के साथ- साथ कालसर्प की भी पूजा होती है।  जानें भगवान शिव के इस मंदिर से जुड़ा रहस्य

There is a temple in Andhra Pradesh where Rahukaal is widely worshiped. Not only this, the earnings of this temple are also not less. The Sri Kalahasti Temple, located in the Chittoor district of the state, has an annual earning of more than one hundred crore rupees. This temple is actually the temple of Lord Shiva, but along with Rahukaal worship, Kalasarp is also worshiped here. Learn the secret related to this temple of Lord Shiva

तिरूपति शहर से करीब 35 किमी श्रीकालहस्ती गांव में स्थित यह मंदिर दक्षिण भारत में भगवान शिव के तीर्थस्‍थानों में अहम स्‍थान रखता है। लगभगर 2 हजार वर्षो से इसे दक्षिण का कैलाश या दक्षिण काशी नाम से भी जाना जाता हैं। यहां भगवान कालहस्तीश्वर के साथ देवी ज्ञानप्रसूनअंबा भी स्‍थापित है।

Located in the village of Srikalahasti, about 35 km from the city of Tirupati, this temple holds an important place in Lord Shiva's shrines in South India. It is also known as Dakshin Kailash or Dakshin Kashi for 2 thousand years. Goddess Jnanprasunam is also established here along with Lord Kalahastishwara.

माना जाता है कि इस स्‍‌थान का नाम तीन पशुओं श्री यानी मकड़ी, काल यानी सर्प और हस्ती यानी हाथी के नाम पर किया गया है। कहा जाता है कि तीनों ने ही यहां पर भगवान ‌शिव की आराधना करके मुक्ति पाई थी। मकड़ी ने शिवलिंग पर तपस्या करके जाल बनाया, सांप ने शिवलिंग पर लिपटकर आरधना की और हाथी ने शिवलिंग को जल से स्नान करवाया था।
 
It is believed that this place has been named after three animals Shri, ie Spider, Kaal i.e. Snake and Hasti i.e. Elephant. It is said that all three had attained salvation by worshiping Lord Shiva here. The spider made a net by doing penance on the Shivling, the snake wrapped it on the Shivling and the elephant had the Shivling bathed with water.

इस मंदिर में तीन विशाल गोपुरम दक्षिण भारत के मंदिर के मुख्य द्वार पर स्थित होता है है, जो स्‍थापत्य की दृष्टि से अनुपम हैं। यही नहीं मंदिर में सौ स्तंभों वाला मंडप भी है, जो अपने आप में अनोखा है।
यहां पर विशेष रूप से राहुकाल और कालसर्प की भी पूजा होती है। यहां पर विशेष रूप से नाग प्रतिष्‍ठा पूजा ‌होती है। इस कालाहस्ती मंदिर की सालाना आय 100 करोड़  रुपए से भी अधिक है। 


This temple has three huge gopurams located at the main entrance of the temple in South India, which are unique in terms of architecture. Not only this, the temple also has a hundred pillared pavilion, which is unique in itself.
Rahukal and Kalsarp are also worshiped here. There is a special worship of Nag Pratishtha here. The annual income of this Kalahasti temple is more than Rs 100 crore.


श्री कालहस्ती मंदिर का इतिहास – Srikalahasteeswara Temple History


5 वी शताब्दी में चोला वंश ने इस मंदिर का निर्माण करवाने का काम किया था। बाकी मंदिरों की तरह ही इस मंदिर के निर्माण में भी कई शतक लग गए।
 
10 वी शताब्दी के दौरान चोला वंश के राजा महाराजा ने इस मंदिर के पुनर्निर्माण का काम फिर से हाथ में लिया था। चोला वंश और विजयनगर के राजा महाराजा ने भी इस मंदिर के निर्माण के लिए अपनी और से भी कुछ मदत की।
नक्काशी में बनवाया गया सौ स्तंभ वाला भवन भी सन 1516 में राजा कृष्णदेवराय के शासनकाल में ही बनवाया गया था।

The Chola dynasty had constructed this temple in the 5th century. Like the other temples, the construction of this temple also took many centuries.
During the 10th century, the King Maharaja of the Chola dynasty again took up the task of rebuilding this temple. The Chola dynasty and King Maharaja of Vijayanagar also made some efforts to build this temple.
A hundred pillar building built in carving was also built in 1516 during the reign of King Krishnadevaraya.

श्री कालहस्ती मंदिर की कहानी – Story of Srikalahasteeswara Temple



इस मंदिर को जागृत मंदिर भी कहा जाता है क्यों की खुद भगवान शिव एक यहाँ पर प्रकट हुए थे। वो किस लिए प्रकट हुए इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है।
बात उस समय की है सभी भगवान शिव के लिंग की पूजा करने में व्यस्त थे और अचानक ही भगवान के शिव लिंग से खून बहना शुरू हो गया था। खून इतना बह रहा था की रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था।
इस दृश्य को देखकर वहा खड़े सब लोग डर गए मगर वहापर इस दृश्य को देखकर कन्नापा ने अपनी एक आँख निकालकर भगवान के शिवलिंग के सामने रख दे और वो अपनी दूसरी आख निकलने ही वालाथा की उतने में खुद भगवान शिव वहा प्रकट हुए और उन्होंने कन्नापा को ऐसा करने से रोका। तभी से इस मंदिर में भगवान शिव निवास करते है।
श्री कालहस्ती मंदिर यहापर आने वाले शिवभक्त के लिए काफी जाना जाता है और भगवान भी भक्तों को जीतना चाहिए उससे भी अधिक आशीर्वाद देकर खुश करते है।
इस मंदिर में शैव पंथ के नियमो का पालन किया जाता है। मंदिर के पुजारी हर रोज भगवान की पुरे रस्म और रिवाज के साथ पूजा करते है। मंदिर में पुरे दिन में चार बार पूजा की जाती है सुबह 6 बजे कलासंथी, 11 बजे उचिकलम, शाम 5 बजे सयाराक्शाई और रात में 7:45 से 8:00 बजे के दौरान एक बार फिर सयाराक्शाई की जाती है।

This temple is also called Jagrit Mandir because Lord Shiva himself appeared here. There is also an interesting story behind what he appeared for.
It is a matter of time that everyone was busy in worshiping Lord Shiva's penis and suddenly the blood of Lord Shiva started bleeding. The blood was flowing so much that it was not taking the name of stopping.
Seeing this scene, everyone standing there got scared but when seeing this scene, Kannapa took one of his eyes and put it in front of Lord Shiva lingam and he appeared in his second eye as Valatha himself and Lord Shiva appeared there. Stopped doing this. Since then Lord Shiva resides in this temple.
Sri Kalahasti Temple is known for the devotees who come here and the Lord also blesses the devotees with more blessings than they should win.
In this temple, the rules of Shaivism are followed. The priests of the temple worship God every day with full rituals and rituals. The temple is worshiped four times a day throughout the day, Kalasanthi at 6 am, Uchikalam at 11 am, Sayarakshai at 5 pm and Sayarakshai once again at 7:45 am to 8:00 pm at night.

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