History of Shri Kashi Vishweshwar Jyotirlinga श्री काशी विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Thursday, 23 April 2020

History of Shri Kashi Vishweshwar Jyotirlinga श्री काशी विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास

स्कन्द पुराण के अनुसार

स्कन्द पुराण के इस आख्यान से स्पष्ट होता है कि श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या आदि से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहाँ निराकार परब्रह्म परमेश्वर महेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए। उन्होंने दूसरी बार महाविष्णु की तपस्या के फलस्वरूप प्रकृति और पुरुष (शक्ति और शिव) के रूप में उपस्थित होकर आदेश दिया। महाविष्णु के आग्रह पर ही भगवान शिव ने काशी क्षेत्र को अविमुक्त कर दिया। उनकी लीलाओं पर ध्यान देने से काशी के साथ उनकी अतिशय प्रियशीलता स्पष्ट मालूम होती है। इस प्रकार द्वादश ज्योतिर्लिंग में श्री विश्वेश्वर भगवान विश्वनाथ का शिवलिंग सर्वाधिक प्रभावशाली तथा अद्भुत शक्तिसम्पन्न लगता है। माँ अन्नापूर्णा (पार्वती) के साथ भगवान शिव अपने त्रिशूल पर काशी को धारण करते हैं और कल्प के प्रारम्भ में अर्थात सृष्टि रचना के प्रारम्भ में उसे त्रिशूल से पुन: भूतल पर उतार देते हैं।

शिव महापुराण में श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा कुछ इस प्रकार बतायी गई है– 'परमेश्वर शिव ने माँ पार्वती के पूछने पर स्वयं अपने मुँह से श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग की महिमा कही थी। उन्होंने कहा कि वाराणसी पुरी हमेशा के लिए गुह्यतम अर्थात अत्यन्त रहस्यात्मक है तथा सभी प्रकार के जीवों की मुक्ति का कारण है। इस पवित्र क्षेत्र में सिद्धगण शिव-आराधना का व्रत लेकर अनेक स्वरूप बनाकर संयमपूर्वक मेरे लोक की प्राप्ति हेतु महायोग का नाम 'पाशुपत योग' है। पाशुपतयोग भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रकार का फल प्रदान करता है।
भगवान शिव ने कहा कि मुझे काशी पुरी में रहना सबसे अच्छा लगता है, इसलिए मैं सब कुछ छोड़कर इसी पुरी में निवास करता हूँ। जो कोई भी मेरा भक्त है और जो कोई मेरे शिवतत्त्व का ज्ञानी है, ऐसे दोनों प्रकार के लोग मोक्षपद के भागी बनते हैं, अर्थात उन्हें मुक्ति अवश्य प्राप्त होती है। इस प्रकार के लोगों को न तो तीर्थ की अपेक्षा रहती है और न विहित अविहित कर्मों का प्रतिबन्ध। इसका तात्पर्य यह है कि उक्त दोनों प्रकार के लोगों को जीवन्मुक्त मानना चाहिए। वे जहाँ भी मरते हैं, उन्हें तत्काल मुक्ति प्राप्त होती है। भगवान शिव ने माँ पार्वती को बताया कि बालक, वृद्ध या जवान हो, वह किसी भी वर्ण, जाति या आश्रम का हो, यदि अविमुक्त क्षेत्र में मृत्यु होती है, तो उसे अवश्य ही मुक्ति मिल जाती है। स्त्री यदि अपवित्र हो या पवित्र हो, वह कुमारी हो, विवाहिता हो, विधवा हो, बन्ध्या, रजस्वला, प्रसूता हो अथवा उसमें संस्कारहीनता हो, चाहे वह किसी भी स्थिति में हो, यदि उसकी मृत्यु काशी क्षेत्र में होती है, तो वह अवश्य ही मोक्ष की भागीदार बनती है।
According to Skanda Purana





It is clear from this narrative of Skanda Purana that Shri Vishweshwar Jyotirlinga did not appear through the worship of any human being, penance etc. But here, only the formless Parbrahmadeva Maheshwar became a Shiva and appeared as Vishwanath. He gave the order for the second time by appearing in the form of Prakriti and Purush (Shakti and Shiva) as a result of Mahavishnu's penance. On the request of Mahavishnu, Lord Shiva freed the Kashi region. Paying attention to his pastimes shows his extreme fondness with Kashi. Thus, in Dwadash Jyotirlinga, Shiva lingam of Lord Vishweshwara Lord Vishwanath seems to be the most powerful and amazing power. Lord Shiva, along with Mother Annapurna (Parvati), places Kashi on his trident and at the beginning of Kalpa i.e. at the beginning of the creation of the universe, brings him back from the trident to the ground floor.




The glory of Shri Vishweshwar Jyotirlinga has been described in Shiva Mahapurana as follows- 'Lord Shiva himself glorified Shri Vishweshwar Jyotirlinga with his own mouth at the behest of Mother Parvati. He said that Varanasi Puri is forever Guhyam i.e. very mysterious mystic and the cause of liberation of all kinds of beings.) Siddhagana in this holy region, by making many forms about the fast of Shiva-Aradhana, in order to attain my lord's gradation The name is 'Pashupat Yoga'. Pashupatayoga provides both fruits of patience and liberation.

Lord Shiva said that I like to live in Kashi Puri, so I leave everything and live in this Puri. Whoever is my devotee and whoever is knowledgeable of my Shivatattva, both such types of people become the children of Mokshapad, that is, they definitely get liberation. Such people have neither expectation of pilgrimage nor ban of canonical prescribed deeds. This means that both the above types of people should be considered life-free. Wherever they die, they get immediate salvation. Lord Shiva told Maa Parvati that the boy, old or young, be of any varna, caste or ashram, if death occurs in the liberated region, he will definitely get liberation. If a woman is impure or pious, she is a virgin, married, widowed, confined, menstruating, maternity or has ritelessness, no matter what the situation, if she is in the area of ​​fear of death, then she is certain It is a part of salvation.

शिव पुराण के अनुसार


शिव महापुराण के अनुसार इस पृथ्वी पर जो कुछ भी दिखाई देता है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्गुण, निर्विकार तथा सनातन ब्रह्मस्वरूप ही है। अपने कैवल्य (अकेला) भाव में रमण करने वाले अद्वितीय परमात्मा में जब एक से दो बनने की इच्छा हुई, तो वही सगुणरूप में ‘शिव’ कहलाने लगा। शिव ही पुरुष और स्त्री, इन दो हिस्सों में प्रकट हुए और उस पुरुष भाग को शिव तथा स्त्रीभाग को ‘शक्ति’ कहा गया। उन्हीं सच्चिदानन्दस्वरूप शिव और शक्ति ने अदृश्य रहते हुए स्वभाववश प्रकृति और पुरुषरूपी चेतन की सृष्टि की। प्रकृति और पुरुष सृष्टिकर्त्ता अपने माता-पिता को न देखते हुए संशय में पड़ गये। उस समय उन्हें निर्गुण ब्रह्म की आकाशवाणी सुनाई पड़ी– ‘तुम दोनों को तपस्या करनी चाहिए, जिससे कि बाद में उत्तम सृष्टि का विस्तार होगा।’ उसके बाद भगवान शिव ने तप:स्थली के रूप में तेजोमय पाँच कोस के शुभ और सुन्दर एक नगर का निर्माण किया, जो उनका ही साक्षात रूप था। उसके बाद उन्होंने उस नगर को प्रकृति और पुरुष के पास भेजा, जो उनके समीप पहुँच कर आकाश में ही स्थित हो गया। तब उस पुरुष (श्री हरि) ने उस नगर में भगवान शिव का ध्यान करते हुए सृष्टि की कामना से वर्षों तपस्या की। तपस्या में श्रम होने के कारण श्री हरि (पुरुष) के शरीर से श्वेतजल की अनेक धाराएँ फूट पड़ीं, जिनसे सम्पूर्ण आकाश भर गया। वहाँ उसके अतिरकित कुछ भी दिखाई नहीं देता था। उसके बाद भगवान विष्णु (श्री हरि) मन ही मन विचार करने लगे कि यह कैसी विचित्र वस्तु दिखाई देती है। उस आश्चर्यमय दृश्य को देखते हुए जब उन्होंने अपना सिर हिलाया, तो उनके एक कान से मणि खिसककर गिर पड़ी। मणि के गिरने से वह स्थान ‘मणिकर्णिका-तीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
उस महान जलराशि में जब पंचक्रोशी डूबने लगी, तब निर्गुण निर्विकार भगवान शिव ने उसे शीघ्र ही अपने त्रिशूल पर धारण कर लिया। तदनन्तर विष्णु (श्रीहरि) अपनी पत्नी (प्रकृति) के साथ वहीं सो गये। उनकी नाभि से एक कमल प्रकट हुआ, जिससे ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति में भी निराकार शिव का निर्देश ही कारण था। उसके बाद ब्रह्मा जी ने शिव के आदेश से विलक्षण सृष्टि की रचना प्रारम्भ कर दी। ब्रह्मा जी ने ब्रह्माण्ड का विस्तार (विभाजन) चौदह भुवनों में किया, जबकि ब्रह्माण्ड का क्षेत्रफल पचास करोड़ योजन बताया गया है। भगवान शिव ने विचार किया कि ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत कर्मपाश (कर्बन्धन) में फँसे प्राणी मुझे कैसे प्राप्त हो सकेंगे? उस प्रकार विचार करते हुए उन्होंने पंचक्रोशी को अपने त्रिशूल से उतार कर इस जगत में छोड़ दिया।

काशी में स्वयं परमेश्वर ने ही अविमुक्त लिंग की स्थापना की थी, इसलिए उन्होंने अपने अंशभूत हर (शिव) को यह निर्देश दिया कि तुम्हें उस क्षेत्र का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए। यह पंचक्रोशी लोक का कल्याण करने वाली, कर्मबन्धनों को नष्ट करने वाली, ज्ञान प्रकाश करने वाली तथा प्राणियों के लिए मोक्षदायिनी है। यद्यपि ऐसा बताया गया है कि ब्रह्मा जी का एक दिन पूरा हो जाने पर इस जगत् का प्रलय हो जाता है, फिर भी अविमुक्त काशी क्षेत्र का नाश नहीं होता है, क्योंकि उसे भगवान परमेश्वर शिव अपने त्रिशूल पर उठा लेते हैं। ब्रह्मा जी जब नई सृष्टि प्रारम्भ करते हैं, उस समय भगवान शिव काशी को पुन: भूतल पर स्थापित कर देते हैं। कर्मों का कर्षण (नष्ट) करने के कारण ही उस क्षेत्र का नाम ‘काशी’ है, जहाँ अविमुक्तेश्वरलिंग हमेशा विराजमान रहता है। संसार में जिसको कहीं गति नहीं मिलती है, उसे वाराणसी में गति मिलती है। महापुण्यमयी पंचक्रोशी करोड़ों हत्याओं के दुष्फल का विनाश करने वाली है। भगवान शंकर की यह प्रिय नगरी समानरूप से भोग ओर मोक्ष को प्रदान करती है। कालाग्नि रुद्र के नाम से विख्यात कैलासपति शिव अन्दर से सतोगुणी तथा बाहर से तमोगुणी कहलाते हैं। यद्यपि वे निर्गुण हैं, किन्तु जब सगुण रूप में प्रकट होते हैं, तो ‘शिव’ कहलाते हैं। रुद्र ने पुन: पुन: प्रणाम करके निर्गुण शिव से कहा– ‘विश्वनाथ’ महेश्वर! निस्सन्देह मैं आपका ही हूँ। मुझ आत्मज (पुत्र) पर आप कृपा कीजिए। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ, आप लोककल्याण की कामना से जीवों का उद्धार करने के लिए यहीं विराजमान हों।’ इसी प्रकार स्वयं अविमुक्त क्षेत्र ने भी शंकर जी से प्रार्थना की है। उसने कहा– ‘देवाधिदेव’ महादेव वास्तव में आप ही तीनों लोकों के स्वामी हैं और ब्रह्मा तथा विष्णु आदि के द्वारा पूजनीय हैं। आप काशीपुरी को अपनी राजधानी के रूप में स्वीकार करें। मैं यहाँ स्थिर भाव से बैठा हुआ सदा आपका ध्यान करता रहूँगा। सदाशिव! आप उमा सहित यहाँ सदा विराजमान रहें और अपने भक्तों का कार्य सिद्ध करते हुए समस्त जीवों के संसार सागर से पार करें। इस प्रकार भगवान शिव अपने गणों सहित काशी में विराजमान हो गये। तभी से काशी पुरी सर्वश्रेष्ठ हो गई। उक्त आशय को ही शिव पुराण में इस प्रकार कहा गया है–
देवदेव महादेव कालामयसुभेषज।
त्वं त्रिलोकपति: सत्यं सेव्यो ब्रह्माच्युतादिभि:।।
काश्यां पुर्यां त्वया देव राजधानी प्रगृह्यताम्।
मया ध्यानतया स्थेयमचिन्त्यसुखहेतवे।।
मुक्तिदाता भवानेव कामदश्च न चापर:।
तस्मात्त्वमुपकाराय तिष्ठोमासहित: सदा।।
जीवान्भवाष्धेरखिलास्तारय त्वं सदाशिव।
भक्तकार्य्यं कुरू हर प्रार्थयामि पुन: पुन:।।
इत्येवं प्रार्थितस्तेन विश्वनाथेन शंकर:।
लोकानामुपकारार्थं तस्थौ तत्रापि सर्वराट्।।

According to Shiva Purana


According to Shiva Mahapuran, whatever appears on this earth, it is only Sachchidananda Swarup, Nirguna, Nirvikar and Sanatan Brahma Swarup. When there was a desire to become one to two in the unique divine being who is beautiful in his Kaivalya (lonely) sense, then he started to be called 'Shiva' in a virtuous form. Shiva appeared in these two parts, man and woman, and that male part was called Shiva and the female part was 'Shakti'. Shiva and Shakti created the nature and male nature conscious by remaining invisible in the same truthful form. Nature and the male creator were skeptical of not seeing their parents. At that time he heard the voice of Nirguna Brahma - 'Both of you should do penance, so that the best creation will expand later.' Then Lord Shiva meditated in the form of austerity: a city of auspicious and beautiful five curiosities Produced, which was his only form. He then sent the city to nature and man, who reached near him and became situated in the sky. Then that man (Sri Hari) meditated on Lord Shiva in that city did penance for years with the desire of creation. Due to the labor in penance, several streams of white water burst from the body of Shri Hari (man), which filled the entire sky. Nothing of his excesses was seen there. After that Lord Vishnu (Shri Hari) started thinking in his mind that what a strange thing it looks like. Seeing that astonishing scene, when he shook his head, a gem fell from one of his ears. With the fall of Mani, the place became famous as 'Manikarnika-tirtha'.

When Panchakroshi started sinking in that great water body, then Lord Shiva, Nirguna Nirvikar, soon put it on his trident. Later Vishnu (Srihari) slept there with his wife (Prakriti). A lotus appeared from his navel, from which Brahma ji was born. The origin of Brahma Ji from Lotus was also the reason for the direction of the formless Shiva. After that Brahma Ji started the creation of a unique world by the order of Shiva. Brahma ji expanded the universe (division) into fourteen bhuvanas, while the area of ​​the universe is said to be 500 million. Lord Shiva thought that how would I be able to get the animals trapped in the Karmasha (Karbandhan) under the universe? Thinking like that, he removed Panchkroshi from his trident and left it in this world.

In Kashi, God Himself had established the liberated sex, so he instructed his parturient Har (Shiva) that you should never abandon that area. This Panchkroshi is the welfare of the people, destroying the karmabandhans, lightening knowledge and salvation for the creatures. Although it has been reported that this world is annihilated after the completion of one day of Brahma ji, yet the liberated Kashi region is not destroyed, because Lord God Shiva lifts it on his trident. When Lord Brahma starts a new creation, at that time Lord Shiva again establishes Kashi on the ground floor. Due to the traction (destroying) of deeds, the name of that region is 'Kashi', where the Avimukteshwarling always resides. Whoever does not get speed in the world, he gets speed in Varanasi. Mahapunyamayi Panchkroshi is about to destroy crores of murders. This beloved city of Lord Shankar equally provides enjoyment and salvation. The famous Kailasapati Shiva known as Kalagni Rudra is called Satoguni from inside and Tamoguni from outside. Although he is nirguna, but when manifested in luminous form, he is called 'Shiva'. Rudra bowed again and said to Nirgun Shiva - 'Vishwanath' Maheshwar! Of course I am yours. Please bless me Atmaj (son). I pray to you, that you may be seated here to save the lives of the people by wishing for their welfare. ”Similarly, the self-liberated region has also prayed to Shankar. He said- 'Devadhidev' Mahadev is really the lord of all the three worlds and is worshiped by Brahma and Vishnu etc. Accept Kashipuri as your capital. I will always sit here and sit at your attention. Sadashiv! You, along with Uma, will always sit here and prove the work of your devotees and cross the ocean of all living beings. In this way Lord Shiva along with his ganas seated in Kashi. Since then Kashi Puri became the best. The said intention is stated in the Shiva Purana as follows:

देवदेव महादेव कालामयसुभेषज।
त्वं त्रिलोकपति: सत्यं सेव्यो ब्रह्माच्युतादिभि:।।
काश्यां पुर्यां त्वया देव राजधानी प्रगृह्यताम्।
मया ध्यानतया स्थेयमचिन्त्यसुखहेतवे।।
मुक्तिदाता भवानेव कामदश्च न चापर:।
तस्मात्त्वमुपकाराय तिष्ठोमासहित: सदा।।
जीवान्भवाष्धेरखिलास्तारय त्वं सदाशिव।
भक्तकार्य्यं कुरू हर प्रार्थयामि पुन: पुन:।।
इत्येवं प्रार्थितस्तेन विश्वनाथेन शंकर:।
लोकानामुपकारार्थं तस्थौ तत्रापि सर्वराट्।।

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