History of Trimbakeshwar jyotirlinga त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Thursday, 23 April 2020

History of Trimbakeshwar jyotirlinga त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास

इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना के विषय में शिवपुराण में यह कथा वर्णित है-
एक बार महर्षि गौतम के तपोवन में रहने वाले ब्राह्मणों की पत्नियाँ किसी बात पर उनकी पत्नी अहिल्या से नाराज हो गईं। उन्होंने अपने पतियों को ऋषि गौतम का अपकार करने के लिए प्रेरित किया। उन ब्राह्मणों ने इसके निमित्त भगवान्‌ श्रीगणेशजी की आराधना की।
उनकी आाधना से प्रसन्न हो गणेशजी ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा उन ब्राह्मणों ने कहा- 'प्रभो! यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो किसी प्रकार ऋषि गौतम को इस आश्रम से बाहर निकाल दें।' उनकी यह बात सुनकर गणेशजी ने उन्हें ऐसा वर माँगने के लिए समझाया। किंतु वे अपने आग्रह पर अटल रहे।
अंततः गणेशजी को विवश होकर उकी बात माननी पड़ी। अपने भक्तों का मन रखने के लिए वे एक दुर्बल गाय का रूप धारण करके ऋषि गौतम के खेत में जाकर रहने लगे। गाय को फसल चरते देखकर ऋषि बड़ी नरमी के साथ हाथ में तृण लेकर उसे हाँकने के लिए लपके। उन तृणों का स्पर्श होते ही वह गाय वहीं मरकर गिर पड़ी। अब तो बड़ा हाहाकार मचा।
सारे ब्राह्मण एकत्र हो गो-हत्यारा कहकर ऋषि गौतम की भर्त्सना करने लगे। ऋषि गौतम इस घटना से बहुत आश्चर्यचकित और दुःखी थे। अब उन सारे ब्राह्मणों ने कहा कि तुम्हें यह आश्रम छोड़कर अन्यत्र कहीं दूर चले जाना चाहिए। गो-हत्यारे के निकट रहने से हमें भी पाप लगेगा। विवश होकर ऋषि गौतम अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहाँ से एक कोस दूर जाकर रहने लगे। किंतु उन ब्राह्मणों ने वहाँ भी उनका रहना दूभर कर दिया। वे कहने लगे- 'गो-हत्या के कारण तुम्हें अब वेद-पाठ और यज्ञादि के कार्य करने का कोई अधिकार नहीं रह गया।' अत्यंत अनुनय भाव से ऋषि गौतम ने उन ब्राह्मणों से प्रार्थना की कि आप लोग मेरे प्रायश्चित और उद्धार का कोई उपाय बताएँ।
तब उन्होंने कहा- 'गौतम! तुम अपने पाप को सर्वत्र सबको बताते हुए तीन बार पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करो। फिर लौटकर यहाँ एक महीने तक व्रत करो। इसके बाद 'ब्रह्मगिरी' की 101 परिक्रमा करने के बाद तुम्हारी शुद्धि होगी अथवा यहाँ गंगाजी को लाकर उनके जल से स्नान करके एक करोड़ पार्थिव शिवलिंगों से शिवजी की आराधना करो। इसके बाद पुनः गंगाजी में स्नान करके इस ब्रह्मगरी की 11 बार परिक्रमा करो। फिर सौ घड़ों के पवित्र जल से पार्थिव शिवलिंगों को स्नान कराने से तुम्हारा उद्धार होगा।

ब्राह्मणों के कथनानुसार महर्षि गौतम वे सारे कार्य पूरे करके पत्नी के साथ पूर्णतः तल्लीन होकर भगवान्‌ शिव की आराधना करने लगे। इससे प्रसन्न हो भगवान्‌ शिव ने प्रकट होकर उनसे वर माँगने को कहा। महर्षि गौतम ने उनसे कहा- 'भगवान्‌ मैं यही चाहता हूँ कि आप मुझे गो-हत्या के पाप से मुक्त कर दें।' भगवान्‌ शिव ने कहा- 'गौतम ! तुम सर्वथा निष्पाप हो। गो-हत्या का अपराध तुम पर छलपूर्वक लगाया गया था। छलपूर्वक ऐसा करवाने वाले तुम्हारे आश्रम के ब्राह्मणों को मैं दण्ड देना चाहता हूँ।'
इस पर महर्षि गौतम ने कहा कि प्रभु! उन्हीं के निमित्त से तो मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। अब उन्हें मेरा परमहित समझकर उन पर आप क्रोध न करें।' बहुत से ऋषियों, मुनियों और देवगणों ने वहाँ एकत्र हो गौतम की बात का अनुमोदन करते हुए भगवान्‌ शिव से सदा वहाँ निवास करने की प्रार्थना की। वे उनकी बात मानकर वहाँ त्र्यम्ब ज्योतिर्लिंग के नाम से स्थित हो गए। गौतमजी द्वारा लाई गई गंगाजी भी वहाँ पास में गोदावरी नाम से प्रवाहित होने लगीं। यह ज्योतिर्लिंग समस्त पुण्यों को प्रदान करने वाला है।





This story is described in Shivpuran about the establishment of this Jyotirlinga-
Once the wives of Brahmins living in Maharishi Gautama's Tapovan got angry with his wife Ahilya on something. He inspired his husbands to do sage Gautama. Those Brahmins worshiped Lord Shree Ganeshji for this.

Pleased with his obedience, Ganesha appeared and asked him to ask for the bride, those Brahmins said - 'Prabhu! If you are happy with us, then somehow get Rishi Gautama out of this ashram. ' On hearing this, Ganeshji persuaded him to ask for such a bridesmaid. But he remained firm on his request.

Eventually, Ganeshji was forced to accept his word. In order to keep the mind of his devotees, he took the form of a weak cow and started living in the field of sage Gautama. Seeing the cow grazing the crop, the sage took a straw in his hand with great softness and grabbed it to grab it. As soon as those trunks were touched, the cow fell there itself. Now there was a big cry.

All Brahmins gathered and called Sage Gautam, and started to condemn Rishi Gautama. Rishi Gautam was very surprised and saddened by this incident. Now all those Brahmins said that you should leave this ashram and go somewhere else. Staying close to the cow-killer will also cause us sin. Being compelled, the sage Gautama started living with his wife Ahilya a curse away from there. But those Brahmins made their stay there too difficult. They started saying - 'Now you have no right to do the work of Vedas and Yajnadi due to cow-killing.' Sage Gautama prayed to those Brahmins with utmost persuasion that you should give me any remedy for my atonement and salvation.

Then he said- 'Gautam! You can revolve the whole earth thrice by telling your sins everywhere. Then return and fast here for a month. After this, after doing 101 circumambulation of 'Brahmagiri' you will be purified or bring Gangaji here and bathe with water and worship Shiva with one crore earthly Shivalingas. After this, bathe in Gangaji again and revolve this Brahmagari 11 times. Then bathing the earthly Shivalingas with the holy water of hundred pots will save you.

According to the Brahmins' statement, Maharishi Gautama completed all those tasks and became fully engrossed with his wife and started worshiping Lord Shiva. Pleased with this, Lord Shiva appeared and asked him to ask for the bride. Maharishi Gautam said to him- 'Lord, I want you to free me from the sin of cow slaughter.' Lord Shiva said- 'Gautam! You are completely sinless. The crime of cow slaughtering was fraudulently imposed on you. I want to punish the Brahmins of your ashram who have done this fraudulently. '

On this Maharishi Gautam said that Lord! I have received your darshan for his sake only. Now consider them as my supreme interest and do not be angry with them. Many sages, sages and deities gathered there, approving Gautama's talk and prayed to Lord Shiva to stay there forever. They obeyed him and located there in the name of Trimb Jyotirlinga. Gangaji brought by Gautam ji also started to flow near there under the name Godavari. This Jyotirlinga is supposed to provide all the merits.

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