Holi and Holika Dahan-होली और होलिका दहन - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Holi and Holika Dahan-होली और होलिका दहन




होलिका दहन से संबन्धित कई कथाएं जुडी हुई है. जिसमें से कुछ प्रसिद्ध कथाएं इस प्रकार है. कथाएं पौराणिक हो, धार्मिक हो या फिर सामाजिक, सभी कथाओं से कुछ न कुछ संदेश अवश्य मिलता है. इसलिये कथाओं में प्रतिकात्मक रुप से दिये गये संदेशों को अपने जीवन में ढालने का प्रयास करना चाहिए. इससे व्यक्ति के जीवन को एक नई दिशा प्राप्त हो सकती है. होलिका दहन की एक कथा जो सबसे अधिक प्रचलन में है, वह हिर्ण्यकश्यप व उसके पुत्र प्रह्लाद की है.

हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद होलिका दहन कथा (Hiranyakashyap and Prahlad Holika Story)
राजा हिर्ण्यकश्यप अहंकार वश स्वयं को ईश्वर मानने लगा. उसकी इच्छा थी की केवल उसी का पूजन किया जाये, लेकिन उसका स्वयं का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था. पिता के बहुत समझाने के बाद भी जब पुत्र ने श्री विष्णु जी की पूजा करनी बन्द नहीं कि तो हिरण्य़कश्यप ने अपने पुत्र को दण्ड स्वरुप उसे आग में जलाने का आदे़श दिया. इसके लिये राजा नें अपनी बहन होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को जलती हुई आग में लेकार बैठ जाये. क्योकि होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी.

इस आदेश का पालन हुआ, होलिका प्रह्लाद को लेकर आग में बैठ गई. लेकिन आश्चर्य की बात थी की होलिका जल गई, और प्रह्लाद नारायण कृ्पा से बच गया. यह देख हिरण्यकश्यप अपने पुत्र से और अधिक नाराज हुआ. हिरण्यकश्यप को वरदान था कि वह वह न दिन में मर सकता है न रात में, न जमीन पर मर सकता है और न आकाश या पाताल में, न मनुष्य उसे मार सकता है और न जानवर या पशु- पक्षी, इसीलिए भगवान उसे मारने का समय संध्या चुना और आधा शरीर सिंह का और आधा मनुष्य का- नृसिंह अवतार. नृसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यप की हत्या न जमीन पर की न आसमान पर, बल्कि अपनी गोद में लेकर की. इस तरह बुराई की हार हुई और अच्छाई की विजय.

इस कथा से यही धार्मिक संदेश मिलता है कि प्रह्लाद धर्म के पक्ष में था और हिरण्यकश्यप व उसकी बहन होलिका अधर्म निति से कार्य कर रहे थे. अतंत: देव कृ्पा से अधर्म और उसका साथ देने वालों का अंत हुआ. इस कथा से प्रत्येक व्यक्ति को यह प्ररेणा लेनी चाहिए, कि प्रह्लाद प्रेम, स्नेह, अपने देव पर आस्था, द्र्ढ निश्चय और ईश्वर पर अगाध श्रद्धा का प्रतीक है. वहीं, हिरण्यकश्यप व होलिका ईर्ष्या, द्वेष, विकार और अधर्म के प्रतीक है.

यहां यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि आस्तिक होने का अर्थ यह नहीं है, जब भी ईश्वर पर पूर्ण आस्था और विश्वास रखा जाता है. ईश्वर हमारी सहायता करने के लिये किसी न किसी रुप में अवश्य आते है.

शिव पार्वती कथा-होलिका दहन (The Shiva-Parvati Story of Holika Dahan)
पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय की बात है कि हिमालय पुत्री पार्वती की यह मनोइच्छा थी, कि उनका विवाह केवल भगवान शिव से हो. सभी देवता भी यही चाहते थे की देवी पार्वती का विवाह ही भगवना शिव से होना चाहिए. परन्तु श्री भोले नाथ थे की सदैव गहरी समाधी में लीन रहते थे, ऎसे में माता पार्वती के लिये भगवान शिव के आमने अपने विवाह का प्रस्ताव रखना कठिन हो रहा था.

इस कार्य में पार्वती जी ने कामदेव का सहयोग मांगा, प्रथम बार में तो कामदेव यह सुनकर डर गये कि उन्हें भगवान भोले नाथ की तपस्या को भंग करना है. परन्तु पार्वती जी के आग्रह करने पर, वे इसके लिये तैयार हो गये. कामदेव ने भगवान शंकर की तपस्या भंग करने के लिये प्रेम बाण चलाया जिसके फलस्वरुप भगवान शिव की तपस्या भंग हो गई. अपनी तपस्या के भंग होने से शिवजी को बडा क्रोध आया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल कर कामदेव को भस्म कर दिया. इसके पश्चात भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह कर लिया. होलिका दहन का पर्व क्योकि कामदेव के भस्म होने से संबन्धित है. इसलिये इस पर्व की सार्थकता इसी में है, कि व्यक्ति होली के साथ अपनी काम वासनाओं को भस्म कर दें. और वासनाओं से ऊपर उठ कर जीवन व्यतीत करें.

नारद जी और युद्धिष्ठर की कथा (The Holika story of Narad and Yuddhisthira)
पुराण अनुसार श्री नारदजी ने एक दिन युद्धिष्ठर से यह निवेदन किया कि है राजन फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सभी लोगों को अभयदान मिलना चाहिए. ताकी सभी कम से कम एक साथ एक दिन तो प्रसन्न रहे, खुशियां मनायें. इस पर युधिष्ठर ने कहा कि जो इस दिन हर्ष और खुशियों के साथ यह पर्व मनायेगा, उसके पाप प्रभाव का नाश होगा. उस दिन से पूर्णिमा के दिन हंसना-होली खेलना आवश्यक समझा जाता है.

श्री विष्णु जी को झूले में झुलाने की प्रथा (The custom of lord Vishnu in a swing)
होली से जुडी एक अन्य कथा के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन जो लोग चित को एकाग्र कर भगवान विष्णु को झुले में बिठाकर, झूलते हुए विष्णु जी के दर्शन करते है, उन्हें पुन्य स्वरुप वैंकुण्ठ की प्राप्ति होती है.


There are many stories related to Holika Jhad. Some famous stories of which are as follows. Whether the stories are mythological, religious or social, all the stories definitely get some message. Therefore, one should try to mold the emotionally enamored spirit in our lives. This can give a new direction to a person's life. One of the most popular stories of Holika Jha is that of Hiranyakashyap and his son Prahlada.

Hiranyakashyap and Prahlad Holika Katha (Hiranyakashyap and Prahlad Holika Katha)
King Hiranyakashyap began to believe himself to be God. He wished that only he should be worshiped, but his own son Prahlada was a supreme devotee of Lord Vishnu. Even after the father explained a lot, when the son did not stop worshiping Lord Vishnu, Hiranya Kashyap ordered his son to burn him in the fire as a punishment. For this, the king asked his sister Holika to sit with Prahlada in a burning fire. Because Holika had the boon that she would not burn in the fire.

This order was followed, Holika sat in the fire with Prahlada. But surprisingly Holika got burnt, and Prahlad Narayan survived Krishna. Seeing this, Hiranyakashyap became more angry with his son. Hiranyakashyap had a boon that he could die neither in the day nor in the night, neither on the ground nor in the sky or the hell, neither man could kill him nor animal or animal-bird, that's why the time of the killing of God in the evening. Chose and half body of lion and half of man - Narsingh avatar. Narasimha Lord killed Hiranyakashyap neither on the ground nor on the sky, but in his lap. In this way, the apparent lost and Goody's victory.

This story gives the same religious message that Prahlada was in favor of religion and Hiranyakashyap and his sister Holika were working with unrighteous policy. Finally, the iniquity of Dev Krishna and those who supported him came to an end. Every person should be inspired by this legend, that Prahlada is a symbol of love, affection, faith in his god, strong determination and deep reverence on God. At the same time, Hiranyakashyap and Holika are symbols of jealousy, malice, disorder and unrighteousness.

It is worth noting here that it does not mean to be a believer, whenever there is complete faith and faith in God. God definitely comes in some form to help us.

Shiva Parvati Katha-Holika Dahan (Story of Shiva-Parvati of Holika Dahan)
According to the legend, it is a matter of ancient times that Parvati, the Himalayan daughter, had this death anniversary, that she should be married only to Lord Shiva. All the gods also wanted that Goddess Parvati should be married to Lord Shiva. But Shri Bhole Nath was always in deep tomb, in which it was becoming difficult for Mother Parvati to propose her marriage to Lord Shiva.

In this task, Parvati ji sought the cooperation of Kamdev, at first, Kamadeva was scared to hear that he had to clear the penance of Lord Bhole Nath. But at Parvati ji's request, they agreed to it. Kamadev loved Lord Shankar to break his austerity, which resulted in Lord Shiva's austerity being dissolved. At the risk of his penance, Shivji got very angry and opened his third eye and consumed Kamdev. After this, Lord Shiva married Mata Parvati. The festival of Holika Dahan as it is related to the consumption of Kamdev. Therefore, the fairness of this festival is in this, that person should consume his work desires with Holi. And live life by rising above lusts.

Story of Narada ji and Yudhishthira (Holika story of Narada and Yudhishthira)
According to the Puran, Shri Naradji requested Yudhishthar one day that on the day of Rajan Phalgun Purnima, all people should get a grant. So that everyone is happy at least once a day, celebrating happiness. On this, Yudhishthira said that whoever celebrates this festival with joy and happiness on this day, his sins will be destroyed. From that day on, it is considered necessary to play Holi Holi on the full moon day.

The practice of swinging Shri Vishnu in a swing (custom of Lord Vishnu in a swing)

According to another legend related to Holi, on the day of Phalgun Purnima, those who converge on Chit and sit on Lord Vishnu in a swing, see Lord Vishnu in a swing, they get a complete form of Vanukuntha.

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