Ithihaas of nageshwar jyotilinga नागेश्वर ज्योतिलिंग का इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Thursday, 23 April 2020

Ithihaas of nageshwar jyotilinga नागेश्वर ज्योतिलिंग का इतिहास

सुप्रिय नामक एक बड़ा धर्मात्मा और सदाचारी वैश्य था। वह भगवान्‌ शिव का अनन्य भक्त था। वह निरन्तर उनकी आराधना, पूजन और ध्यान में तल्लीन रहता था। अपने सारे कार्य वह भगवान्‌ शिव को अर्पित करके करता था। मन, वचन, कर्म से वह पूर्णतः शिवार्चन में ही तल्लीन रहता था। उसकी इस शिव भक्ति से दारुक नामक एक राक्षस बहुत क्रुद्व रहता था
उसे भगवान्‌ शिव की यह पूजा किसी प्रकार भी अच्छी नहीं लगती थी। वह निरन्तर इस बात का प्रयत्न किया करता था कि उस सुप्रिय की पूजा-अर्चना में विघ्न पहुँचे। एक बार सुप्रिय नौका पर सवार होकर कहीं जा रहा था। उस दुष्ट राक्षस दारुक ने यह उपयुक्त अवसर देखकर नौका पर आक्रमण कर दिया। उसने नौका में सवार सभी यात्रियों को पकड़कर अपनी राजधानी में ले जाकर कैद कर लिया। सुप्रिय कारागार में भी अपने नित्यनियम के अनुसार भगवान्‌ शिव की पूजा-आराधना करने लगा।
अन्य बंदी यात्रियों को भी वह शिव भक्ति की प्रेरणा देने लगा। दारुक ने जब अपने सेवकों से सुप्रिय के विषय में यह समाचार सुना तब वह अत्यन्त क्रुद्ध होकर उस कारागर में आ पहुँचा। सुप्रिय उस समय भगवान्‌ शिव के चरणों में ध्यान लगाए हुए दोनों आँखें बंद किए बैठा था। उस राक्षस ने उसकी यह मुद्रा देखकर अत्यन्त भीषण स्वर में उसे डाँटते हुए कहा- 'अरे दुष्ट वैश्य! तू आँखें बंद कर इस समय यहाँ कौन- से उपद्रव और षड्यन्त्र करने की बातें सोच रहा है?' उसके यह कहने पर भी धर्मात्मा शिवभक्त सुप्रिय की समाधि भंग नहीं हुई। अब तो वह दारुक राक्षस क्रोध से एकदम पागल हो उठा। उसने तत्काल अपने अनुचरों को सुप्रिय तथा अन्य सभी बंदियों को मार डालने का आदेश दे दिया। सुप्रिय उसके इस आदेश से जरा भी विचलित और भयभीत नहीं हुआ।
वह एकाग्र मन से अपनी और अन्य बंदियों की मुक्ति के लिए भगवान्‌ शिव से प्रार्थना करने लगा। उसे यह पूर्ण विश्वास था कि मेरे आराध्य भगवान्‌ शिवजी इस विपत्ति से मुझे अवश्य ही छुटकारा दिलाएँगे। उसकी प्रार्थना सुनकर भगवान्‌ शंकरजी तत्क्षण उस कारागार में एक ऊँचे स्थान में एक चमकते हुए सिंहासन पर स्थित होकर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हो गए।
उन्होंने इस प्रकार सुप्रिय को दर्शन देकर उसे अपना पाशुपत-अस्त्र भी प्रदान किया। इस अस्त्र से राक्षस दारुक तथा उसके सहायक का वध करके सुप्रिय शिवधाम को चला गया। भगवान्‌ शिव के आदेशानुसार ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर पड़ा।



There was a big religious and virtuous Vaishya named Supriya. He was an exclusive devotee of Lord Shiva. He was constantly engrossed in their worship, worship and meditation. He used to do all his work by offering it to Lord Shiva. With mind, speech and deeds, he was completely immersed in Shivarchan. Due to his devotion to Shiva, a demon named Daruk lived very crudely.
He did not like this worship of Lord Shiva in any way. He used to constantly try to ensure that there was an obstacle in the worship of that beloved person. Once, Supriya was going on a boat and going somewhere. The evil demon Daruk, seeing this opportune occasion, attacked the boat. He captured all the passengers in the boat and took him to his capital and imprisoned him. According to his routine in the Supriya prison, he started worshiping Lord Shiva.
He also began to inspire other devout travelers to Shiva devotion. When Daruk heard this news about his beloved from his servants, he became very angry and came to that prison. At that time, Supriya was sitting with his eyes closed, meditating at the feet of Lord Shiva. Seeing this pose of that monster, scolding him in a very fierce voice said- 'Hey wicked Vaishya! You are closing your eyes and thinking about what disturbance and conspiracy here? ' Even after he said this, the tomb of the devout Shiva devotee Supriya was not broken. Now he got completely mad with the rarest monster anger. He immediately ordered his followers to kill Supriya and all the other prisoners. Supriya was not at all distracted and frightened by his order.

He started praying to Lord Shiva for the liberation of himself and other prisoners from the concentrated mind. He had full faith that my adorable Lord Shiva would definitely rid me of this disaster. Hearing his prayers, Lord Shankarji immediately appeared as a Jyotirlinga, situated on a shining throne in a high place in that prison.

In this way, he appeared to Supriya and also gave him his Pashupat-astra. With this weapon, after killing the demon Daruk and his assistant, Supriya went to Shivdham. This Jyotirlinga was named Nageshwar according to the order of Lord Shiva.

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