Kangra's Bjreshwari Shaktipeeth कांगड़ा का बज्रेश्वरी शक्तिपीठ - ॐ जय माता दी ॐ

Latest:

Translate

Search This Blog

“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Wednesday, 22 April 2020

Kangra's Bjreshwari Shaktipeeth कांगड़ा का बज्रेश्वरी शक्तिपीठ



मां कांगड़ा ने किया था जालंधर दैत्य का संहार, तीन गुंबद की यह है मान्यता कांगड़ा का बज्रेश्वरी शक्तिपीठ मां का एक ऐसा धाम है, जहां पहुंच कर भक्तों का हर दुख उनकी तकलीफ मां की एक झलक भर देखने से दूर हो जाती है। यह 52 शक्तिपीठों में से मां का वो शक्तिपीठ जहां सती का दाहिना वक्ष गिरा था और जहां तीन धर्मों के प्रतीक के रूप में मां की तीन पिण्डियों की पूजा होती है। मां सती का बायां वक्षस्थल यहां गिरने से इसे स्तनपीठ भी कहा गया है। पहाड़ों को नहलाती सूर्य देव की पवित्र किरणें और भोर के आगमन पर सोने सी दमकती कांगड़ा की विशाल पर्वत श्रृंखला को देख ऐसा लगता है कि मानो किसी निपुण जौहरी ने घाटी पर सोने की चादर ही मढ़ दी हो। ऐसा मनोरम दृश्य कि एक पल को प्रकृति भी अपने इस रूप पर इतरा उठे।

मान्यता
मां बज्रेश्वरी देवी के धाम के बारे मे कहते हैं कि जब मां सती ने पिता के द्वारा किए गए शिव के अपमान से कुपित होकर अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए थे, तब क्रोधित शिव उनकी देह को लेकर पूरी सृष्टि में घूमे। शिव का क्रोध शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। शरीर के यह टुकड़े धरती पर जहां-जहां गिरे वह स्थान शक्तिपीठ कहलाया। मान्यता है कि यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था इसलिए ब्रजरेश्वरी शक्तिपीठ में मां के वक्ष की पूजा होती है। माता बज्रेश्वरी का यह शक्तिपीठ अपने आप में अनूठा और विशेष है क्योंकि यहां मात्र हिन्दू भक्त ही शीश नहीं झुकाते बल्कि मुस्लिम और सिख धर्म के श्रद्धालु भी इस धाम में आकर अपनी आस्था के फूल चढ़ाते हैं। कहते हैं ब्रजेश्वरी देवी मंदिर के तीन गुंबद इन तीन धर्मों के प्रतीक हैं। पहला हिन्दू धर्म का प्रतीक है, जिसकी आकृति मंदिर जैसी है तो दूसरा मुस्लिम समाज का और तीसरा गुंबद सिख संप्रदाय का प्रतीक है।

तीन पिण्डियों का महत्व
तीन गुंबद वाले और तीन संप्रदायों की आस्था का केंद्र कहे जाने वाले माता के इस धाम में मां की पिण्डियां भी तीन ही हैं। मंदिर के गर्भगृह में प्रतिष्ठित यह पहली और मुख्य पिण्डी मां बज्रेश्वरी की है। दूसरी मां भद्रकाली और तीसरी और सबसे छोटी पिण्डी मां एकादशी की है। मां के इस शक्तिपीठ में ही उनके परम भक्त ध्यानु ने अपना शीश अर्पित किया था इसलिए मां के वो भक्त जो ध्यानु के अनुयायी भी हैं वो पीले रंग के वस्त्र धारण कर मंदिर में आते हैं और मां का दर्शन पूजन कर स्वयं को धन्य करते हैं। कहते हैं, जो भी भक्त मन में सच्ची श्रद्धा लेकर मां के इस दरबार में पहुंचता है उसकी कोई भी मनोकामना अधूरी नहीं रहती।

5 बार होती है मां की आरती
मां ब्रजेश्वरी देवी की इस शक्तिपीठ में प्रतिदिन मां की पांच बार आरती होती है। सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही सबसे पहले मां की शैय्या को उठाया जाता है। उसके बाद रात्रि के श्रृंगार में ही मां की मंगला आरती की जाती है। मंगला आरती के बाद मां का रात्रि श्रृंगार उतार कर उनकी तीनों पिण्डियों का जल, दूध, दही, घी, और शहद के पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। उसके बाद पीले चंदन से मां का श्रृंगार कर उन्हें नए वस्त्र और सोने के आभूषण पहनाएं जाते हैं। फिर चना पूरी, फल और मेवे का भोग लगाकर संपन्न होती है मां की प्रात: आरती।

दोपहर की आरती और भोग चढ़ाने की रस्म को गुप्त रखा जाता है। दोपहर की आरती के लिए मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, तब श्रद्धालु मंदिर परिसर में ही बने एक विशेष स्थान पर अपने बच्चों का मुंडन करवाते हैं। मंदिर परिसर में ही भगवान भैरव का भी मंदिर है, लेकिन इस मंदिर में महिलाओं का जाना पूर्ण रूप से वर्जित है। यहां विराजे भगवान भैरव की मूर्ति बड़ी ही खास है। कहते हैं जब भी कांगड़ा पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो इस मूर्ति की आंखों से आंसू और शरीर से पसीना निकलने लगता है। तब मंदिर के पुजारी विशाल हवन का आयोजन कर मां से आने वाली आपदा को टालने का निवेदन करते हैं और यह ब्रजेश्वरी शक्तिपीठ का चमत्कार और महिमा ही है कि आने वाली हर आपदा मां के आशीष से टल जाती है।

कहते हैं एकादशी के दिन चावल का प्रयोग नहीं किया जाता है, लेकिन इस शक्तिपीठ में मां एकादशी स्वयं मौजूद है इसलिए यहां भोग में चावल ही चढ़ाया जाता है। सूर्यास्त के बाद इन पिण्डियों को स्नान कराकर पंचामृत से इनका दोबारा अभिषेक किया जाता है। लाल चंदन, फूल व नए वस्त्र पहनाकर मां का श्रृंगार किया जाता है और इसके साथ ही सांय काल आरती संपन्न होती है। शाम की आरती का भोग भक्तों में प्रसाद रूप में बांटा जाता है। रात को मां की शयन आरती की जाती है, जब मंदिर के पुजारी मां की शैय्या तैयार कर मां की पूजा अर्चना करते हैं।

जालंधर राक्षस का मां ने किया था संहार
एक अन्य आख्यान के अनुसार जालंधर दैत्य की अधिवासित भूमि जालंधर पीठ पर ही देवी ने वज्रास्त्र के प्रहार से उसका वध किया था। इस दैव्य का वक्ष और कान का हिस्सा कांगड़ा की धरती पर गिरकर वज्र के समान कठोर हो गया था। उसी स्थान पर वज्रहस्ता देवी का प्राकट्य हुआ। वज्रवाहिनी देवी को शत्रुओं पर विजय पाने के लिए भी पूजा जाता रहा है। कहते हैं, जालंधर दैत्य का संहार करने पर माता की कोमल देह पर अनेक चोटें आ गई थीं। इसका उपचार देवताओं ने जख्मों पर घी लगाकर किया था। आज भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए संक्रांति को माता की पिण्डी पर पांच मन देसी घी, मक्खन चढ़ाया जाता है, उसी के ऊपर मेवे और फलों को रखा जाता है। यह भोग लगाने का सिलसिला सात दिन तक चलता है। फिर भोग को प्रतिदिन श्रद्धालुओं में प्रसाद स्वरूप बांट दिया जाता है।

Maa Kangra had killed the Jalandhar monster, this recognition of three domes

Shaktipeeth, Bajreshwari of Kangra, is one such abode of the mother, where all the grief of the devotees is overcome by having a glimpse of their suffering mother. This Shaktipeeth of the mother out of the 52 Shaktipeeths where the right breast of Sati fell and where the three pindis of the mother are worshiped as a symbol of three religions. The left chest of the mother Sati falls here, it is also called the breastbone. The holy rays of the sun god bathed the mountains, and looking at the huge mountain range of Kangra glittering like gold at the arrival of dawn, it seemed as if an accomplished jeweler had put a sheet of gold on the valley. Such a panoramic view that even nature for a moment rose to its form.

Recognition
Mata Bajreshwari says about the goddess's abode, that when Mother Sati had lost her life by jumping into the sacrificial fire of her father Raja Daksha after being enraged by the insult of Shiva by her father, the angry Shiva took the whole creation of his body. Roam around To calm Shiva's wrath, Lord Vishnu cut Mata Sati's body into pieces with her chakra. Wherever this piece of body fell on the earth, it was called Shaktipeeth. It is believed that the right breast of the mother Sati fell here, so the mother's chest is worshiped in Brajreshwari Shaktipeeth. This Shaktipeeth of Mata Bajreshwari is unique and special in itself because here not only Hindu devotees bow down the head but also devotees of Muslim and Sikh religion come to this temple and offer flowers of their faith. It is said that the three domes of the Brajeshwari Devi temple symbolize these three religions. The first is a symbol of Hindu religion, whose shape is like a temple, the second is the symbol of Muslim society and the third is the symbol of the dome Sikh sect.

Importance of three bodies
Mother damsels are also three in this abode of mother with three domes and called the center of faith of three sects. This first and main pindi, reputed in the sanctum sanctorum of the temple, is that of mother Bajreshwari. The second mother is of Bhadrakali and the third and the youngest Pindi mother is Ekadashi. It was in this Shaktipeeth of Mother that his supreme devotee Dhyanu offered his head, so the devotees of mother who are also followers of Dhyanu, come in the temple wearing yellow clothes and worship themselves, and worship themselves. It is said that any wish of the devotee who reaches this court of mother with true devotion in the mind, is not left unfulfilled.

Mother's Aarti is done 5 times
In this Shaktipeeth of Mother Brajeshwari Devi, Aarti of Mother is done five times daily. The bed of the mother is first raised as soon as the doors of the temple are opened in the morning. After that, Mangala Aarti of the mother is done in the night makeup. After Mangala Aarti, the mother's nightly makeup is taken off and her three pindi are anointed with water, milk, curd, ghee and honey. After that, the mother is adorned with yellow sandal and she is dressed in new clothes and gold jewelery. Then with the help of chana puri, fruits and dry fruits, the morning aarti of the mother is done.

The mid-day aarti and the ritual of offering food are kept secret. The temple doors are closed for the midday Arti, when the devotees get their children shaved at a special place built in the temple premises itself. There is also a temple of Lord Bhairav ​​in the temple premises, but the entry of women in this temple is completely forbidden. The idol of Viraje Lord Bhairav ​​is very special here. It is said that whenever there is any problem on Kangra, tears of this idol and sweat starts coming out of the body. Then the temple priests organize a huge havan and request the mother to avoid the disaster and it is the miracle and glory of the Brajeshwari Shaktipeeth that every disaster is averted with the blessing of the mother.

It is said that rice is not used on Ekadashi, but mother Ekadashi itself is present in this Shaktipeeth, therefore rice is offered here as a bhog. After sunset, these pindi are bathed and anointed with Panchamrit again. The mother is adorned by wearing red sandalwood, flowers and new clothes, and with it the evening is celebrated. The enjoyment of the evening aarti is distributed among the devotees in prasad form. The mother's sleeping aarti is performed at night, when the priest of the temple prepares the mother's bed and worships the mother.


Jalandhar demon was killed by his mother. According to another legend, on the Jalandhar Peetha, the land occupied by the Jalandhar monster, the goddess killed him with the attack of Vajrastra. The chest and ear part of this divine fell on Kangra soil and became as hard as a thunderbolt. Vajrahasta Devi appeared at the same place. Vajravahini Devi has also been worshiped to overcome her enemies. It is said that after killing the Jalandhar monster, there were many injuries on the soft body of the mother. The gods treated it with ghee on the wounds. Even today, following the tradition, Sankranti is offered five mana ghee, butter, and fruits and fruits are placed on the mother's body. The process of offering this bhog lasts for seven days. Bhog is then distributed among the devotees every day as a Prasad.

No comments:

Post a comment