Muharram-मुहर्रम - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Muharram-मुहर्रम

Muharram

इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है मुहर्रम
इमाम हुसैन की शहादत की याद में मुहर्रम मनाया जाता है। यह कोई त्योहार नहीं बल्कि मातम का दिन है। इमाम हुसैन अल्लाह के रसूल (मैसेंजर) पैगंबर मोहम्मद के नाती थे। यह हिजरी संवत का प्रथम महीना है। मुहर्रम एक महीना है, जिसमें शिया मुस्लिम दस दिन तक इमाम हुसैन की याद में शोक मनाते हैं। इस्लाम की तारीख में पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता यानी खलीफा चुनने का रिवाज रहा है। ऐसे में पैगंबर मोहम्मद के बाद चार खलीफा चुने गए। लोग आपस में तय करके किसी योग्य व्यक्ति को प्रशासन, सुरक्षा इत्यादि के लिए खलीफा चुनते थे। जिन लोगों ने हजरत अली को अपना इमाम (धर्मगुरु) और खलीफा चुना, वे शियाने अली यानी शिया कहलाते हैं।

क्यों मनाते हैं मुहर्रम :-

मोहम्मद साहब के मरने के लगभग 50 वर्ष बाद मक्का से दूर कर्बला के गवर्नर यजीद ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया। कर्बला जिसे अब सीरिया के नाम से जाना जाता है। वहां यजीद इस्लाम का शहंशाह बनाना चाहता था। इसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया। लोगों को गुलाम बनाने के लिए वह उन पर अत्याचार करने लगा। यजीद पूरे अरब पर कब्जा करना चाहता था। लेकिन उसके सामने हजरत मुहम्मद के वारिस और उनके कुछ साथियों ने यजीद के सामने अपने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया।
अपने बीवी बच्चों की सलामती के लिए इमाम हुसैन मदीना से इराक की तरफ जा रहे थे तभी रास्ते में यजीद ने उन पर हमला कर दिया। इमाम हुसैन और उनके साथियों ने मिलकर यजीद की फौज से डटकर सामना किया। हुसैन लगभग 72 लोग थे और यजीद के पास 8000 से अधिक सैनिक थे लेकिन फिर भी उन लोगों ने यजीद की फौज के दांत खट्टे कर दिये थे।
हालांकि वे इस युद्ध में जीत नहीं सके और सभी शहीद हो गए। किसी तरह हुसैन इस लड़ाई में बच गए। यह लड़ाई मुहर्रम 2 से 6 तक चली। आखिरी दिन हुसैन ने अपने साथियों को कब्र में दफन किया। मुहर्रम के दसवें दिन जब हुसैन नमाज अदा कर रहे थे, तब यजीद ने धोखे से उन्हें भी मरवा दिया। उस दिन से मुहर्रम को इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत के त्योहार के रूप में मनाया जाता है।

ताजिया :-

ये शिया मुस्लिमों का अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका है। मुहर्रम के दस दिनों तक बांस, लकड़ी का इस्तेमाल कर तरह-तरह से लोग इसे सजाते हैं और ग्यारहवें दिन इन्हें बाहर निकाला जाता है। लोग इन्हें सड़कों पर लेकर पूरे नगर में भ्रमण करते हैं सभी इस्लामिक लोग इसमें इकट्ठे होते हैं। इसके बाद इन्हें इमाम हुसैन की कब्र बनाकर दफनाया जाता है। एक तरीके से 60 हिजरी में शहीद हुए लोगों को एक तरह से यह श्रद्धांजलि दी जाती है।

Muharram
Muharram is celebrated in memory of the martyrdom of Imam Hussain
Muharram is celebrated in memory of the martyrdom of Imam Hussain. It is not a festival but a day of mourning. Imam Hussain was the grandson of Prophet Mohammad, the Messenger of Allah (Mysore). This is the first month of Hijri Samvat. Muharram is a month in which Shia Muslims mourn for ten days in memory of Imam Hussein. It has been the custom of choosing the Khalifa, the leading leader of Muslims all over the world in the date of Islam. In this way, four Caliphs were elected after Prophet Mohammad. People were Khalifa seconds for administration, security etc. to a qualified person by deciding amongst themselves. Those who chose Hazrat Ali as their Imam (Dharmaguru) and Khalifa are called Shiyane Ali i.e. Shia.

Why celebrate Muharram: -

Nearly 50 years after the death of Mohammad Saheb, the governor of Karbala, far away, caliphed himself. Karbala is now known as Syria. There Yajid wanted to be the emperor of Islam. For this, he started spreading fear in Awam. In order to enslave people, he persecuted them. Yazid wanted to capture the entire Arab. But in front of him, Hazrat Muhammad's heir and some of his associates did not kneel before Yajid and fought fiercely. "
For the safety of his wife's children, Imam Hussain was on his way from Madina to Gay, when Yajid attacked him on the way. Imam Hussain and his allies confronted Yazid's army. Hussain was about 72 people and Yajid had more than 8000 soldiers, but still those people had cut the teeth of Yajid's army.
However they could not win in this war and all were martyred. Somehow Hussain survived this battle. The battle lasted from Muharram 2 to 6. On the last day, Hussein buried his comrades in the tomb. On the tenth day of Muharram, while Hussain was offering namaz, Yajid fraudulently killed him. From that day Muharram is celebrated as a festival of martyrdom of Imam Hussein and his associates.

Tajia: -

It is a way for Shia Muslims to pay tribute to their ancestors. People decorate it in various ways using bamboo, wood for ten days of Muharram and they are pulled out on the change day. People take him on the streets and travel throughout the city, all of the Islamic people gather. He is then buried and buried by Imam Hussain. In a way, this tribute is paid to those who were martyred in 60 Hijri.

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