Nav Durga Avtaar नव-दुर्गा अवतार - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Wednesday, 22 April 2020

Nav Durga Avtaar नव-दुर्गा अवतार

प्रथम दुर्गा : श्री शैलपुत्री (Maa Shailputri)

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्द्वकृत शेखराम।
वृषारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम॥


श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। गिरिराज हिमालय की पुत्री होने के कारण भगवती का प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का है, जिनकी आराधना से प्राणी सभी मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है।
 शैलराज हिमालय की कन्या होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया है, माँ शैलपुत्री दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल का पुष्प लिए अपने वाहन वृषभ पर विराजमान होतीं हैं. नवरात्र के इस प्रथम दिन की उपासना में साधक अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं, शैलपुत्री का पूजन करने से ‘मूलाधार चक्र’ जागृत होता है और यहीं से योग साधना आरंभ होती है जिससे अनेक प्रकार की शक्तियां प्राप्त होती हैं.
The first form of Sri Durga is Sri Shailputri. Due to being the daughter of the mountain Himalayas, they are called Shailputri. They are worshiped and worshiped on the first day of Navratri. Being the daughter of Giriraj Himalayas, the first form of Bhagwati is that of Shailputri, whose worship of animals gives all the desired results.


As Shailraj is the daughter of Himalayas, she is received by Shailputri, mother Shailputri sits on her vehicle Taurus with trident in right hand and lotus flower in linga hand. In the worship of this first day of Navratri, the seekers place their minds in the Dhar Mooladhara Chakra, worshiping Shailputri gives the light of the La Mooladhar Chakra and from here the yoga practice begins which gives many kinds of powers. .



द्वितीय दुर्गा : श्री ब्रह्मचारिणी (Maa Bramhcharini)


“दधना कर पद्याभ्यांक्षमाला कमण्डलम।
देवी प्रसीदमयी ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥“


श्री दुर्गा का द्वितीय रूप श्री ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा औरअर्चना की जाती है।
जो दोनो कर-कमलो मे अक्षमाला एवं कमंडल धारण करती है। वे सर्वश्रेष्ठ माँ भगवती ब्रह्मचारिणी मुझसे पर अति प्रसन्न हों। माँ ब्रह्मचारिणी सदैव अपने भक्तो पर कृपादृष्टि रखती है एवं सम्पूर्ण कष्ट दूर करके अभीष्ट कामनाओ की पूर्ति करती है।

देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय है. मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से द्वितीय शक्ति देवी ब्रह्मचारिणी का है. ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली अर्थात तप का आचरण करने वाली
मां ब्रह्मचारिणी. यह देवी शांत और निमग्न होकर तप में लीन हैं. मुख पर कठोर तपस्या के कारण अद्भुत तेज और कांति का ऐसा अनूठा संगम है जो तीनों लोको को उजागर कर रहा है.
देवी ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में अक्ष माला है और बायें हाथ में कमण्डल होता है. देवी ब्रह्मचारिणी साक्षात ब्रह्म का स्वरूप हैं अर्थात तपस्या का मूर्तिमान रूप हैं. इस देवी के कई अन्य नाम हैं जैसे
तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा (Goddess Brahmcharini is Tapashcharini, Aparna and Uma.). इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में स्थित होता है. इस चक्र में अवस्थित साधक मां ब्रह्मचारिणी जी की कृपा और भक्ति को प्राप्त करता है.

The second form of Sri Durga is Sri Brahmacharini. Brahmacharini here means austerity. He did severe penance to obtain Lord Shankar as a husband. Hence, they are known as Tapashcharini and Brahmacharini. They are worshiped and worshiped on the second day of Navratri.
Who holds the axilla and the kamandala in both the taxis. May he be the best mother Bhagwati Brahmacharini very pleased with me. Mother Brahmacharini always puts her blessings on her devotees and fulfills the desired wishes by removing all the troubles.

The form of Goddess Brahmacharini is complete Jyotirmaya. The second power of the nine powers of Goddess Durga is that of Goddess Brahmacharini. Brahma means austerity and charini means one who practices austerity

Mother Brahmacharini. This goddess is calm and immersed in meditation. Due to harsh austerity on the face, there is such a unique confluence of amazing speed and radiance which is exposing the three locos.
Goddess Brahmacharini has an Aksha Mala in her right hand and a lotus in her left hand. Goddess Brahmacharini is the form of Sakshat Brahm, that is, a form of penance. This goddess has many other names like

Tapashcharini, Aparna and Uma (Goddess Brahmcharini is Tapashcharini, Aparna and Uma.). On this day, the mind of the seeker is situated in the 'Swadhisthana' cycle. The seeker located in this cycle receives the grace and devotion of mother Brahmacharini ji.



तृतीय दुर्गा : श्री चंद्रघंटा (Maa Chandraghanta)



“पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैयुता।
प्रसादं तनुते मद्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥“


श्री दुर्गा का तृतीय रूप श्री चंद्रघंटा है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन और अर्चना किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टोंसे मुक्ति मिलती है।इनकी आराधनासे मनुष्य के हृदय से अहंकार का नाश होता है तथा वह असीम शांति की प्राप्ति कर प्रसन्न होता है। माँ चन्द्रघण्टा मंगलदायनी है तथा भक्तों को निरोग रखकर उन्हें वैभव तथा ऐश्वर्य प्रदान करती है। उनके घंटो मे अपूर्व शीतलता का वास है।
चन्द्रघंटा देवी का स्वरूप तपे हुए स्वर्ण के समान कांतिमय है. चेहरा शांत एवं सौम्य है और मुख पर सूर्यमंडल की आभा छिटक रही होती है. माता के सिर पर अर्ध चंद्रमा मंदिर के घंटे के आकार में सुशोभित हो रहा जिसके कारण देवी का नाम चन्द्रघंटा हो गया है. अपने इस रूप से माता देवगण, संतों एवं भक्त जन के मन को संतोष एवं प्रसन्न प्रदान करती हैं. मां चन्द्रघंटा अपने प्रिय वाहन सिंह पर आरूढ़ होकर अपने दस हाथों में खड्ग,
तलवार, ढाल, गदा, पाश, त्रिशूल, चक्र,धनुष, भरे हुए तरकश लिए मंद मंद मुस्कुरा रही होती हैं. माता का ऐसा अदभुत रूप देखकर ऋषिगण मुग्ध होते हैं और वेद मंत्रों द्वारा देवी चन्द्रघंटा की स्तुति करते हैं.
माँ चन्द्रघंटा की कृपा से समस्त पाप और बाधाएँ विनष्ट हो जाती हैं. देवी चंद्रघंटा की मुद्रा सदैव युद्ध के लिए अभिमुख रहने की होती हैं,इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है इनकी अराधना सद्य:
फलदायी है, समस्त भक्त जनों को देवी चंद्रघंटा की वंदना करते हुए कहना चाहिए
 ” या देवी सर्वभूतेषु चन्द्रघंटा रूपेण संस्थिता. नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:”.. अर्थात देवी ने चन्द्रमा को अपने सिर पर घण्टे के सामान सजा रखा है उस महादेवी, महाशक्ति चन्द्रघंटा को मेरा प्रणाम है, बारम्बार प्रणाम है. इस प्रकार की
स्तुति एवं प्रार्थना करने से देवी चन्द्रघंटा की प्रसन्नता प्राप्त होती है.

The third form of Sri Durga is Sri Chandraghanta. She has an hour-sized crescent on her forehead, which is why she is called Chandraghanta Devi. They are worshiped and worshiped on the third day of Navratri. With his worship, the seeker automatically attains the awakening of the Manipur Chakra and gets rid of worldly sufferings. His worship destroys the ego from the heart of man and he is happy to receive unlimited peace. Mother Chandraghanta is Mangaladayani and keeps her devotees healthy and gives them glory and opulence. His hour is inhabited by uncommon coldness.

The form of Chandraghanta Devi is as radiant as a golden gold. The face is calm and gentle and the aura of the sun is shedding on the face. The half-moon on Mother's head is being decorated in the shape of the hour of the temple, due to which the name of Goddess has been changed to Chandraghanta. In this form, Mother Goddess gives satisfaction and happiness to the hearts of saints and devotees. Maa Chandraghanta mounted on her beloved vehicle, a sword in her ten hands,

Swords, shields, mace, loop, trident, chakra, bow, filled quiver are smiling dull. Seeing such an amazing form of Mother, the sages are enchanted and praise the Goddess Chandraghanta through Vedas mantras.
By the grace of Mother Chandraghanta, all sins and obstacles are destroyed. Goddess Chandraghanta's pose is always oriented towards war, her worshiper becomes mighty and fearless like a lion.
It is fruitful, all devotees should say while worshiping Goddess Chandraghanta ”or Goddess Sarvabhuteshu Chandraghanta Rupena Sanstha. Namastasai namastasai namastasai namo namo nam: ".. That means the goddess has decorated the moon on her head like an hour, I salute that Mahadevi, Mahashakti Chandraghanta. This kind of

By praising and praying, one gets the happiness of Goddess Chandraghanta.

चतुर्थ दुर्गा : श्री कूष्मांडा (Maa Kushmanda)



”सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधानाहस्तपद्याभ्यां कुष्माण्डा शुभदास्तु में॥“


श्री दुर्गाका चतुर्थ रूप श्री कूष्मांडा हैं। अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। श्री कूष्मांडा कीउपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं।
इनकी आराधनासे मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होता है। माँ कुष्माण्डा सदैव अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखती है। इनकी पूजा आराधना से हृदय को शांति एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती हैं।
देवी कुष्मांडा कथा :

दुर्गा सप्तशती के कवच में लिखा है
कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डेमांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा
.
इसका अर्थ है वह देवी जिनके उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है वह कूष्माण्डा हैं. देवी कूष्माण्डा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं. जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था देवी कुष्मांडा जिनका मुखमंड सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है उस समय प्रकट हुई उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलकें झपकनी शुरू हो गयी और जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी प्रकार कुसुम अर्थात फूल के समान मां की हंसी से सृष्टि में ब्रह्मण्ड का जन्म हुआ. इस देवी का निवास सूर्यमण्डल के मध्य में है और यह सूर्य मंडल कोअपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं.देवी कूष्मांडा अष्टभुजा से युक्त हैं अत: इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है. देवी अपने इन हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा है. देवी के आठवें हाथ
में बिजरंके (कमल फूल का बीज) का माला है है, यह माला भक्तों को सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धि देने वाला है. देवी अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार हैं. जो भक्त श्रद्धा पूर्वक इस देवी की उपासना दुर्गा पूजा के चौथे दिन करता है उसके सभी प्रकार के कष्ट रोग, शोक का अंत होता है और आयु एवं यश की प्राप्ति होती है.
चतुर्थ दुर्गा : श्री कूष्मांडा आदिशक्ति श्री दुर्गा का चतुर्थ रूप श्री कूष्मांडा हैं। अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है। नवरात्रि के चतुर्थ दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। श्री कूष्मांडा के पूजन से अनाहत चक्र जाग्रति की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। श्री कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक नष्ट हो जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। दुर्गा पूजा के चौथे दिन देवी कूष्माण्डा जी की पूजा का विधान है देवी कूष्माण्डा अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से जाना जाता है. इस दिन भक्त का मन 'अनाहत' चक्र में स्थित होता है, अतः इस दिन उसे अत्यंत पवित्र और शांत मन से कूष्माण्डा देवी के स्वरूप को ध्यान में रखकर पूजा करनी चाहिए. संस्कृत भाषा में कूष्माण्ड कूम्हडे को कहा जाता है, कूम्हडे की बलि इन्हें प्रिय है, इस कारण भी इन्हें कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है.

देवी कुष्मांडा कथा | Devi Kushmanda Story
दुर्गा सप्तशती के कवच में लिखा है कुत्सित: कूष्मा कूष्मा-त्रिविधतापयुत: संसार:, स अण्डे मांसपेश्यामुदररूपायां यस्या: सा कूष्मांडा. इसका अर्थ है वह देवी जिनके उदर में त्रिविध तापयुक्त संसार स्थित है वह कूष्माण्डा हैं. देवी कूष्माण्डा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री हैं. जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था देवी कुष्मांडा जिनका मुखमंड सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है उस समय प्रकट हुई उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलकें झपकनी शुरू हो गयी और जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी प्रकार कुसुम अर्थात फूल के समान मां की हंसी से सृष्टि में ब्रह्मण्ड का जन्म हुआ अत: यह देवी कूष्माण्डा के रूप में विख्यात हुई. इस देवी का निवास सूर्यमण्डल के मध्य में है और यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती हैं. देवी कूष्मांडा अष्टभुजा से युक्त हैं अत: इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है. देवी अपने इन हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण, कमल का फूल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा है. देवी के आठवें हाथ में बिजरंके (कमल फूल का बीज) का माला है है, यह माला भक्तों को सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धि देने वाला है. देवी अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार हैं. जो भक्त श्रद्धा पूर्वक इस देवी की उपासना दुर्गा पूजा के चौथे दिन करता है उसके सभी प्रकार के कष्ट रोग, शोक का अंत होता है और आयु एवं यश की प्राप्ति होती है.

Sri Durgaka IV form is Sri Kushmanda. She is called by the name of Kushmanda Devi due to the creation of eggs from her belly. They are worshiped and worshiped on the fourth day of Navratri. All diseases and mourning of the devotees are destroyed by the introduction of Shri Kushmanda.
His worship of man makes him free from triple heat. Maa Kushmanda always looks gracefully on her devotees. Worshiping them gives peace and Lakshmi to the heart.

Goddess Kushmanda Story:

It is written in the armor of Durga Saptashati
Kutsit: Kushma Kushma-Tridvidhapayut: Sansara:, S Andameansapeshyamudarupayan Yasya: Sa Kushmanda.
This means that the goddess, in whose stomach the three-layered world is located, is Kushmanda. Devi Kushmanda is the presiding officer of this grazing world. When the creation was not created at that time there was an empire of darkness. Goddess Kushmanda, whose face is illuminated by the brightness of hundreds of suns, appeared at that time with a smile on her face, the eyelids of the world began to blink and the way the egg would be born in the flower. In the same way, Brahmand was born in the world due to mother's laughter like Kusum. The abode of this goddess is in the middle of the sunlord and it controls the solar system with its own sign. The deity Kushmanda is with Ashtabhuja and hence is also known as Goddess Ashtabhuja. The goddess has Kamandalu, bow, arrow, lotus flower, urn filled with nectar, Chakra and mace respectively. Eighth hand of goddess
I have a garland of Bijranke (lotus flower seed), this garland is going to give all types of Riddhi Siddhi to the devotees. Devi is riding on her beloved vehicle, Singh. The devotee who worships this goddess with reverence on the fourth day of Durga Puja has all kinds of diseases, mourning and the end of age and fame.

Chaturthi Durga: Shri Kushmanda is the fourth form of Adishakti Shri Durga is Shri Kushmanda. She is called by the name of Kushmanda Devi due to the creation of eggs from her belly. They are worshiped and worshiped on the fourth day of Navratri. The worship of Shri Kushmanda achieves the attainments of Anahata Chakra Jagriti. All the diseases and mourning of the devotees are destroyed by worshiping Shri Kushmanda. Their devotion leads to increase in age, fame, strength and health. On the fourth day of Durga Puja, there is a law to worship Goddess Kushmanda, Goddess Kushmanda is known as Kushmanda Devi, due to the creation of egg that is the universe with her soft smile. On this day, the devotee's mind is situated in the 'Anahata' cycle, so on this day he should worship with a very pure and calm mind keeping in mind the nature of Kushmanda Devi. In the Sanskrit language, Kushmand Kumhade is called, the sacrifice of Kumhade is dear to them, that is why they are also known as Kushmanda.



Goddess Kushmanda Katha | Devi Kushmanda Story
It is written in the armor of Durga Saptashati: Kutshit: Kushma Kushma-Trimvidhatapayut: Sansar:, S Ande Musyamudar Rupayan Yasya: Sa Kushmanda. This means that the goddess, in whose stomach the three-layered world is located, is Kushmanda. Devi Kushmanda is the presiding officer of this grazing world. When the creation was not created at that time there was an empire of darkness. Goddess Kushmanda, whose face is illuminated by the brightness of hundreds of suns, appeared at that time with a smile on her face, the eyelids of the world began to blink and the way the egg would be born in the flower. In the same way, Brahmand was born in the world due to the laughter of the mother like Kusum i.e. flower, hence this goddess became famous as Kushmanda. The abode of this goddess is in the middle of the solar system and it controls the solar system with its own sign. Goddess Kushmanda is associated with Ashtabhuja, hence she is also known as Goddess Ashtabhuja. The goddess has Kamandalu, bow, arrow, lotus flower, urn filled with nectar, Chakra and mace respectively. There is a garland of Bijranke (lotus flower seed) in the eighth hand of the Goddess, this garland is going to give all kinds of Riddhi siddhi to the devotees. Devi is riding on her beloved vehicle, Singh. The devotee who worships this goddess with reverence on the fourth day of Durga Puja has all kinds of diseases, mourning and the end of age and fame.

पंचम दुर्गा : श्री स्कंदमाता (Maa Skandamata)



“सिंहासनगता नित्यं पद्याञ्चितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥“


श्री दुर्गा का पंचम रूप श्री स्कंदमाता हैं। श्री स्कंद (कुमार कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। नवरात्रि के पंचम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है। इनकी आराधना से विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं।
इनकी आराधनासे मनुष्य सुख-शांति की प्राप्ति करता है। सिह के आसन पर विराजमान तथा कमल के पुष्प से सुशोभित दो हाथो वाली यशस्विनी देवी स्कन्दमाता शुभदायिनी है।

माँ दुर्गा का पंचम रूप स्कन्दमाता के रूप में जाना जाता है. भगवान स्कन्द कुमार (कार्तिकेय)की माता होने के कारण दुर्गा जी के इस पांचवे स्वरूप को स्कंद माता नाम प्राप्त हुआ है. भगवान स्कन्द जी बालरूप में माता की गोद में बैठे होते हैं इस दिन साधक का मन विशुध्द चक्र में अवस्थित होता है. स्कन्द मातृस्वरूपिणी देवी की चार भुजायें हैं, ये दाहिनी ऊपरी भुजा में भगवान स्कन्द को गोद में पकडे हैं और दाहिनी निचली भुजा जो ऊपर को उठी है, उसमें कमल पकडा हुआ है। माँ का वर्ण पूर्णतः शुभ्र है और कमल के पुष्प पर विराजित रहती हैं। इसी से इन्हें पद्मासना की देवी और विद्यावाहिनी दुर्गा देवी भीकहा जाता है। इनका वाहन भी सिंह है|
माँ स्कंदमाता सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी हैं| इनकी उपासना करने से साधक अलौकिक तेज की प्राप्ति करता है | यह अलौकिक प्रभामंडल प्रतिक्षण उसके योगक्षेम का निर्वहन करता है| एकाग्रभाव से मन को पवित्र
करके माँ की स्तुति करने से दुःखों से मुक्ति पाकर मोक्ष का मार्ग सुलभ होता है|

The fifth form of Sri Durga is Sri Skandamata. Being the mother of Shri Skanda (Kumar Karthikeya), she is called Skandmata. They are worshiped and worshiped on the fifth day of Navratri. With their worship, the attainments of the awakening of the pure cycle are attained automatically.
By worshiping them, man achieves happiness and peace. The two-handed Yashaswini Devi Skandamata Shubhadayini is adorned on the seat of the lion and is adorned with lotus flowers.


The fifth form of Goddess Durga is known as Skandmata. Being the mother of Lord Skanda Kumar (Kartikeya), this fifth form of Durga ji has received the name Skanda Mata. Lord Skanda ji is sitting in the lap of mother in child form, on this day the mind of the seeker is situated in the Vishuddh Chakra. Skanda is the four arms of the mother goddess, Goddess in her right upper arm, holding Lord Skanda in her lap, and the right lower arm which is raised up, holding a lotus in it. Mother's character is completely auspicious and remains on the lotus flower. With this, she is also called Goddess of Padmasana and Durga Devi Vidyavahini. His vehicle is also a lion.
Maa Skandamata is the presiding goddess of Suryamandal. By worshiping them, the seeker attains supernatural glory. This supernatural aura percussion discharges its Yogaksham. Sanctified mind

By praising the mother, by attaining freedom from sorrows, the path of salvation is accessible.


षष्ठम दुर्गा : श्री कात्यायनी (Maa Katyayani)






“चन्द्रहासोज्जवलकरा शार्दूलावरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्यादेवी दानव घातिनी॥“

श्री दुर्गाका षष्ठम् रूप श्री कात्यायनी। महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था। इसलिए वे कात्यायनी कहलाती हैं। नवरात्रि के षष्ठम दिन इनकी पूजा और आराधना होती है। इनकी आराधना से भक्त का हर काम सरल एवं सुगम होता है। चन्द्रहास नामक तलवार के प्रभाव से जिनका हाथ चमक रहा है, श्रेष्ठ सिंह जिसका वाहन है, ऐसी असुर संहारकारिणी देवी कात्यायनी कल्यान करें।


माँ दुर्गा के छठे रूप को माँ कात्यायनी के नाम से पूजा जाता है. महर्षि कात्यायन की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर उनकी इच्छानुसार उनके यहां पुत्री के रूप में पैदा हुई थीं. महर्षि कात्यायन ने इनका पालन-पोषण
किया तथा महर्षि कात्यायन की पुत्री और उन्हीं के द्वारा सर्वप्रथम पूजे जाने के कारण देवी दुर्गा को कात्यायनी कहा गया.देवी कात्यायनी अमोद्य फलदायिनी हैं इनकी पूजा अर्चना द्वारा सभी संकटों का नाश होता है, माँ कात्यायनी दानवों तथा पापियों का नाश करने वाली हैं. देवी कात्यायनी जी के पूजन से भक्त के भीतर अद्भुत शक्ति का संचार होता है. इस दिन साधक का मन ‘आज्ञा चक्र’ में स्थित रहता है. योग साधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होने पर उसे सहजभाव से मां कात्यायनी के दर्शन प्राप्त होते हैं. साधक इस लोक में रहते हुए अलौकिक तेज से युक्त रहता है.माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यन्त दिव्य और स्वर्ण के समान
चमकीला है. यह अपनी प्रिय सवारी सिंह पर विराजमान रहती हैं. इनकी चार भुजायें भक्तों को वरदान देती हैं, इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है, तो दूसरा हाथ वरदमुद्रा में है अन्य हाथों में तलवार तथा कमल का फूल है.

Sri Durgaka Shashtam Roop Shri Katyayani. Pleased by the penance of Maharishi Katyayan, Adishakti was born as a daughter to him. Therefore she is called Katyayani. They are worshiped and worshiped on the seventh day of Navratri. By worshiping them, every work of the devotee is simple and easy. Those whose hands are shining with the effect of a sword named Chandrahas, Shishya Singh, whose vehicle is, should do such asura sahakaarkarini Devi Katyayani Kalyan.


The sixth form of Maa Durga is worshiped as Maa Katyayani. Pleased with the difficult penance of Maharishi Katyayan, she was born as his daughter according to his wish. Maharishi Katyayan raised them
Goddess Durga is said to be Katyayani due to her being worshiped by Maharishi Katyayan and the first worshiped by her. Devi Katyayani is Amodaya Phaladayini. Her prayers destroy all the troubles, mother Katyayani is the destroyer of demons and sinners. The worship of Goddess Katyayani ji brings wonderful power within the devotee. On this day, the mind of the seeker is located in the command cycle. This command cycle has a very important place in yoga practice. When the mind of the seeker is situated in the command cycle, he gets the vision of mother Katyayani with ease. The seeker remains in this world with supernatural splendor. The form of Mother Katyayani is very divine and like gold.

Is bright She sits on her beloved ride lion. His four arms give a boon to the devotees, one hand is in Abhaya Mudra, the other hand is in Varadmudra, the other hand has a sword and lotus flower.




सप्तम दुर्गा : श्री कालरात्रि (Maa Kaalratri)


“एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥“


श्री दुर्गा का सप्तम रूप श्री कालरात्रि हैं। ये काल का नाश करने वाली हैं, इसलिए कालरात्रि कहलाती हैं। नवरात्रि के सप्तम दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है। इस दिन साधक को अपना चित्त भानु चक्र (मध्य ललाट) में स्थिर कर साधना करनी चाहिए।
संसार में कालो का नाश करने वाली देवी ‘कालरात्री’ ही है। भक्तों द्वारा इनकी पूजा के उपरांत उसके सभी दु:ख, संताप भगवती हर लेती है। दुश्मनों का नाश करती है तथा मनोवांछित फल प्रदान कर उपासक को संतुष्ट करती हैं।

मां दुर्गा के सातवें स्वरूप या शक्ति को कालरात्रि कहा जाता है, दुर्गा-पूजा के सातवें दिन माँ काल रात्रि की उपासना का विधान है. मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक है, इनका वर्ण अंधकार की भाँतिकाला है, केश बिखरे हुए हैं, कंठ में विद्युत की चमक वाली माला है, माँ कालरात्रि के तीन नेत्र ब्रह्माण्ड की तरह विशाल व गोल हैं, जिनमें से
बिजली की भाँति किरणें निकलती रहती हैं, इनकी नासिका से श्वास तथा निःश्वाससे अग्नि की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं. माँ का यह भय उत्पन्न करने वाला स्वरूप केवल पापियों का नाश करने के लिए.
माँ कालरात्रि अपने भक्तों को सदैव शुभ फल प्रदान करने वाली होती हैं इस कारण इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है. दुर्गा पूजा के सप्तम दिन साधक का मन ‘सहस्रार’ चक्र में अवस्थित होता है.कालरात्रिमर्हारात्रिर्मोहरात्रिश्र्च दारूणा. त्वं श्रीस्त्वमीश्र्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा..मधु कैटभ नामक महापराक्रमी असुर से जीवन की रक्षा हेतु भगवान
विष्णु को निंद्रा से जगाने के लिए ब्रह्मा जी ने इसी मंत्र से मां की स्तुति की थी. यह देवी काल रात्रि ही महामाया हैं और भगवान विष्णु की योगनिद्रा हैं. इन्होंने ही सृष्टि को एक दूसरे से जोड़ रखा है.देवी काल-रात्रि का वर्ण काजल के समान काले रंग का है जो अमावस की रात्रि से भी अधिक काला है. मां कालरात्रि के तीन बड़े बड़े उभरे हुए
नेत्र हैं जिनसे मां अपने भक्तों पर अनुकम्पा की दृष्टि रखती हैं. देवी की चार भुजाएं हैं दायीं ओर की उपरी भुजा से महामाया भक्तों को वरदान दे रही हैं और नीचे की भुजा से अभय का आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं.बायीं भुजा में क्रमश: तलवार और खड्ग धारण किया है. देवी कालरात्रि के बाल खुले हुए हैं और हवाओं में लहरा रहे हैं. देवी काल रात्रि गर्दभ पर सवार हैं. मां का वर्ण काला होने पर भी कांतिमय और अद्भुत दिखाई देता है. देवी कालरात्रि का यह विचित्र रूप भक्तों के लिए अत्यंत शुभ है अत: देवी को शुभंकरी भी कहा गया है.
The seventh form of Shri Durga is Sri Kalratri. They are the destroyer of Kaal, hence called Kalratri. They are worshiped and worshiped on the seventh day of Navratri. On this day, the seeker should practice his mind in the Bhanu Chakra (middle frontal).
Kalratri is the goddess who destroys kalo in the world. After his worship by the devotees, all his sorrows and sorrows are taken away. Destroys enemies and satisfies worshipers by providing desired results.


The seventh form or power of Maa Durga is called Kaalratri, on the seventh day of Durga Puja, Maa Kaal is the law of worship of the night. The appearance of Maa Kalratri is very terrible to see, its color is dark like dark, hair is scattered, there is a garland of lightning in the throat, the three eyes of Maa Kalratri are huge and round like the universe, of which
Rays of light emanate from their nostrils, from their nostrils the fierce flames of fire and breath go out. This fear-inducing nature of Mother only to destroy sinners.
Maa Kalratri is always giving auspicious results to her devotees, for this reason they are also called Shubhankari. On the seventh day of Durga Puja, the mind of the seeker is situated in the 'Sahasrara' cycle. God to protect life from a mahaprakrami asura named Madhu Catabh
To awaken Vishnu from sleep, Brahma ji praised the mother with this mantra. This goddess is Mahamaya at night and is the yognidra of Lord Vishnu. They have connected the universe to each other. The color of the dark and dark night is black like kajal, which is darker than the moonless night. Three great grown ups of Maa Kalratri

There are eyes with which the mother keeps a look of compassion on her devotees. The goddess has four arms, with the upper arm on the right side, Mahamaya is giving a boon to the devotees and with the lower arm is blessing Abhay. He holds the sword and the sword in the left arm respectively. The hair of Goddess Kalratri is open and swaying in the winds. Goddess Kaal is riding on the night garb. Even if the color of the mother is black, it looks radiant and amazing. This peculiar form of Goddess Kalratri is extremely auspicious for the devotees, hence the Goddess is also called Shubhankari.

अष्टम दुर्गा : श्री महागौरी (Maa Mahagauri)



“श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बर धरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥“


श्री दुर्गा का अष्टम रूप श्री महागौरी हैं। इनका वर्ण पूर्णतः गौर है, इसलिए ये महागौरी कहलाती हैं। नवरात्रि के अष्टम दिन इनका पूजन किया जाता है। इनकी उपासना से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
माँ महागौरीकी आराधना से किसी प्रकार के रूप और मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। उजले वस्त्र धारण किये हुए महादेव को आनंद देवे वाली शुद्धता मूर्ती देवी महागौरी मंगलदायिनी हों।

देवी दुर्गा के नौ रूपों में महागौरी आठवीं शक्ति स्वरूपा हैं. दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है. महागौरी आदी शक्ति हैं इनके तेज से संपूर्ण विश्व प्रकाश-मान होता है इनकी शक्ति अमोघ फलदायिनी हैम माँ महागौरी की अराधना से भक्तों को सभी कष्ट दूर हो जाते हैंतथा देवी का भक्त जीवन में पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी बनता है.दुर्गा सप्तशती (Durga Saptsati) में शुभ निशुम्भ से पराजित होकर गंगा के तट पर जिस देवी की
प्रार्थना देवतागण कर रहे थे वह महागौरी हैं. देवी गौरी के अंश से ही कौशिकी का जन्म हुआ जिसने शुम्भ निशुम्भ के प्रकोप से देवताओं को मुक्त कराया. यह देवी गौरी शिव की पत्नी हैं यही शिवा और शाम्भवी के नाम से भी
पूजित होती हैं.

महागौरी स्वरूप :

महागौरी की चार भुजाएं हैं उनकी दायीं भुजा अभय मुद्रा में हैंऔर नीचे वाली भुजा में त्रिशूल शोभता है. बायीं भुजा में डमरू डम डम बज रही है और नीचे वाली भुजा से देवी गौरी भक्तों की प्रार्थना सुनकर वरदान देती हैं. जो स्त्री इस देवी की पूजा भक्ति भाव सहित करती हैं उनके सुहाग की रक्षा देवी स्वयं करती हैं. कुंवारी लड़की मां की पूजा करती हैं तो उसे योग्य पति प्राप्त होता है. पुरूष जो देवी गौरी की पूजा करते हैं उनका जीवनसुखमय रहता है देवी उनके पापों को जला देती हैं और शुद्ध अंत:करण देती हैं. मां अपने भक्तों को अक्षय आनंद और तेज प्रदान करती हैं.

महागौरी कथा :

देवी पार्वती रूप में इन्होंने भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं. जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं.इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं. पार्वती जी का रंग अत्यंत
ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौरवर्ण का वरदान देते हैं.
एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को
गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा.महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं. देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह
देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया. इस इंतजार में वहकाफी कमज़ोर हो गया. देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस परबहुत दया आती है, और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी. इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं.

The eighth form of Shri Durga is Sri Mahagauri. Their color is completely noticed, hence they are called Mahagauri. They are worshiped on the eighth day of Navratri. Impossible tasks are also made possible by their worship.
Worship of Mother Mahagauri can be achieved in any form and desired fruit. Mahagauri Mangaladayini should be the chastity idol goddess who gives pleasure to Mahadev wearing bright clothes.


Mahagauri is the eighth power of the nine forms of Goddess Durga. Mahagauri is worshiped on the eighth day of Durga Puja. Mahagauri is accustomed power, his fast makes the whole world light-up, his power is immense fruit, the worship of Maa Mahagauri removes all the sufferings of the devotees and the devotee of Goddess becomes the possessor of the holy and renewable virtues in life. Durga Saptashati (Durga Saptsati) defeated by auspicious beginnings, the goddess on the banks of the Ganges

The Gods were praying that they are Mahagauri. Kaushiki was born from the part of Goddess Gauri who freed the gods from the wrath of Shumbha Nishumbh. This goddess Gauri is the wife of Shiva, also in the name of Shiva and Shambhavi
Are worshiped.

Mahagauri Format:


Mahagauri has four arms, his right arm is in Abhaya Mudra and the trident is adorned in the lower arm. Damru Dum Dum is playing in the left arm and Goddess Gauri with the bottom arm gives a boon after hearing the prayers of the devotees. Those women who worship this goddess with devotion, protect their suhag. When a virgin girl worships her mother, she gets a worthy husband. The men who worship Goddess Gauri have a happy life, Goddess burns their sins and gives them pure conscience. Mother gives Akshay Anand and Tej to her devotees.




Mahagauri legend:


In the form of Goddess Parvati, she did hard penance to get Lord Shiva as her husband, once Lord Bholenath said something after seeing Parvati ji. Due to which the Goddess's mind is hurt and Parvati ji becomes engrossed in penance. Thus, when Parvati does not come for years to do austerity, Lord Shiva reaches Parvati, searching for Parvati, and is surprised to see Parvati there. They remain. Parvati ji's color is extremely

It is full of vigor, their shade is visible like the white and black flowers of the moonlight, pleased with their clothes and ornaments and gives goddess Uma the blessing of Gauravarna.
According to a legend, to get Lord Shiva in the form of a husband, the goddess had undergone a severe penance, which makes her body black. Pleased with the austerity of the goddess, God accepts them and Shiva ji's body
When we wash with the Ganges and water, the goddess becomes very radiant Gaur varna like electricity and since then she is named Gauri. There is also another legend related to Mahagauri ji according to which, according to which, a lion was very hungry, he ate food. In search, Devi Uma is doing penance. Seeing the goddess, Singh's appetite increased but he

I sat there waiting for the goddess to get up from austerity. During this wait, he became very weak. When the goddess wakes up from penance, seeing the condition of the lion, she feels very pity for him, and the mother makes him her ride because in a way she also did penance. Hence the vehicle of Goddess Gauri is both bull and lion.


नवम् दुर्गा : श्री सिद्धिदात्री (Maa Siddhidaatri)



“सिद्धगंधर्वयक्षादौर सुरैरमरै रवि।
सेव्यमाना सदाभूयात सिद्धिदा सिद्धिदायनी॥“


श्री दुर्गा का नवम् रूप श्री सिद्धिदात्री हैं। ये सब प्रकार की सिद्धियों की दाता हैं, इसीलिए ये सिद्धिदात्री कहलाती हैं। नवरात्रि के नवम दिन इनकी पूजा औरआराधना की जाती है।
सिद्धिदात्रीकी कृपा से मनुष्य सभी प्रकार की सिद्धिया प्राप्त कर मोक्ष पाने मे सफल होता है। मार्कण्डेयपुराण में अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व एवं वशित्वये आठ सिद्धियाँ बतलायी गयी है। भगवती
सिद्धिदात्री उपरोक्त संपूर्ण सिद्धियाँ अपने उपासको को प्रदान करती है। माँ दुर्गा के इस अंतिम स्वरूप की आराधना के साथ ही नवरात्र के अनुष्ठान का समापन हो जाता है।
इस दिन को रामनवमी भी कहा जाता है और शारदीय नवरात्रि के अगले दिन अर्थात दसवें दिन को रावण पर राम की विजय के रूप में मनाया जाता है। दशम् तिथि को बुराई पर अच्छाकई की विजय का प्रतीक माना जाने वाला त्योतहार विजया दशमी यानि दशहरा मनाया जाता है। इस दिन रावण, कुम्भकरण और मेघनाथ के पुतले जलाये जाते हैं। 
माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति सिद्धिदात्री हैं, नवरात्र-पूजन के नौवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है. नवमी के दिन सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है. दुर्गा मईया जगत के कल्याण हेतु नौ रूपों में प्रकट हुई और इन रूपों में अंतिम रूप है देवी सिद्धिदात्री का. देवी प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण जगत की रिद्धि सिद्धि अपने भक्तों को प्रदान करती हैं. देवी सिद्धिदात्री का रूप अत्यंत सौम्य है, देवी की चार भुजाएं हैं दायीं भुजा में माता ने चक्र और गदा धारण किया है, मां बांयी भुजा में शंख और कमल का फूल है.
मां सिद्धिदात्री कमल आसन पर विराजमान रहती हैं, मां की सवारी सिंह हैं. देवी ने सिद्धिदात्री का यह रूप भक्तों पर अनुकम्पा बरसाने के लिए धारण किया है. देवतागण, ऋषि-मुनि, असुर, नाग, मनुष्य सभी मां के भक्त
हैं. देवी जी की भक्ति जो भी हृदय से करता है मां उसी पर अपना स्नेह लुटाती हैं. मां का ध्यान करने के लिए आप “सिद्धगन्धर्वयक्षाघरसुरैरमरैरपि सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी..” इस मंत्र से स्तवन कर सकते हैं.

सिद्धि के प्रकार :

पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इन्हीं की कृपा से सिध्दियों को प्राप्त किया था तथा इन्हें के द्वारा भगवान शिव को अर्धनारीश्वर रूप प्राप्त हुआ. अणिमा, महिमा,गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां हैं जिनका मार्कण्डेय पुराण में उल्लेख किया गया है
इसके अलावा ब्रह्ववैवर्त पुराण (Brahmvaivart Puran) में अनेक सिद्धियों का वर्णन है जैसे 1. सर्वकामावसायिता 2. सर्वज्ञत्व 3. दूरश्रवण 4. परकायप्रवेशन 5. वाक्‌सिद्धि 6. कल्पवृक्षत्व 7. सृष्टि 8. संहारकरणसामर्थ्य 9. अमरत्व 10 सर्वन्यायकत्व. कुल मिलाकर 18 प्रकार की सिद्धियों का हमारे शास्त्रों में वर्णन मिलता है. यह देवी इन सभी सिद्धियों की स्वामिनी हैं. इनकी पूजा से भक्तों को ये सिद्धियां प्राप्त होती हैं.

The ninth form of Shri Durga is Shri Siddhidatri. She is the giver of all types of accomplishments, hence she is called Siddhidatri. They are worshiped and worshiped on the ninth day of Navratri.
By the grace of Siddhidatri, man achieves all kinds of siddhis and is successful in attaining salvation. In the Markandeepuran, eight siddhis have been told about Anima, Mahima, Garima, Laghima, Attainment, Prakamya, Ishita and subdivision. Bhagwati
Siddhidatri provides all the above mentioned accomplishments to his worshipers. The ritual of Navratri ends with the worship of this final form of Maa Durga.
This day is also called Ramnavami and the next day of Sharadiya Navaratri i.e. the tenth day is celebrated as Rama's victory over Ravana. On the tenth day, the festival of Vijaya Dashami i.e. Dussehra is celebrated as a symbol of the victory of the good over evil. On this day effigies of Ravana, Kumbhakaran and Meghnath are burnt.

The ninth power of Maa Durga is Siddhidatri, on the ninth day of Navratri-poojan, there is a law to worship Maa Siddhidatri. On the occasion of Navmi eternal knowledge is gained. Durga Mayya appeared in nine forms for the welfare of the world and in these forms the final form is that of Goddess Siddhidatri. When the Goddess is pleased, she provides Riddhi Siddhi of the entire world to her devotees. The form of Goddess Siddhidatri is very gentle, the Goddess has four arms, in the right arm the mother is wearing a chakra and mace, the mother left arm has a conch and a lotus flower.

Mother Siddhidatri sits on a lotus seat, mother's ride is Leo. The Goddess has worn this form of Siddhidatri to show compassion to the devotees. Gods, sages, monks, asuras, snakes, humans are all devotees of the mother
Huh. Mother devotes her affection on devotion to Goddess with all her heart. You can perform eulogy with this mantra "Siddhagandharvayakshagharsuraramarpari vyavamana sada bhuyat siddhida siddhyadini .." to meditate on the mother.

Type of accomplishment:


According to the Puran, Lord Shiva had attained Siddhis by his grace and through these Lord Shiva received Ardhanarishwar form. Anima, Mahima, Garima, Laghima, Attainment, Prakamya, Ishvita and subdivision are the eight siddhis mentioned in the Markandeya Purana.


Apart from this, Brahmvaivart Puran describes many siddhis such as 1. Sarvakamavasayita 2. Omniscience 3. Darsharvana 4. Parakya Pravashana 5. Vakasiddhi 6. Kalpavrikshatva 7. Srishti 8. Sanathakaranakashamarthi 9. Immortality 10 Sarvaniyakattva. In total, 18 types of siddhis are described in our scriptures. This goddess is the master of all these siddhis. By worshiping them, devotees get these siddhis.




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