Poornagiri Mata Shaktipeeth- पूर्णागिरी माता शक्तिपीठ - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Tuesday, 28 April 2020

Poornagiri Mata Shaktipeeth- पूर्णागिरी माता शक्तिपीठ

अत्यंत चमत्कारी व सिद्ध है पूर्णागिरी माता का मंदिर.




देवी शक्ति पीठ: जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां-वहां हुआ शक्तिपीठों का निर्माण - Story of Shaktipeeth 
शक्ति पीठों के संबंध में मान्यता है कि जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां-वहां हुआ शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। दरअसल देवी पुराण के अनुसार एक बार राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन शिव और सती को आमंत्रित नहीं किया।
माता सती को नारद से यह बात पता चली की उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है। उन्होंने शिवजी के मना करने पर भी जि़द की और अपने पिता के यहां यज्ञ में सम्मिलत होने के लिए हरिद्वार चली गई। वहां जाने पर जब उन्हें पता चला कि यज्ञ में शिवजी को छोड़कर सारे देवताओं को आमंत्रित किया गया है।
तब उन्होंने अपने पिता से शिवजी को न बुलाने का कारण पूछा तो दक्ष ने शिवजी के बारे में अपमानजनक बातें कही। वे बातें माता सती से सहन नहीं हुई और उन्होंने अग्रिकुंड में कूदकर अपने प्राणों की आहूति दे दी। जब ये समाचार शिवजी तक पहुंचा तो वे बहुत क्रोधित हुए उनका तीसरा नेत्र खुल गया। वीरभद्र ने उनके कहने पर दक्ष का सिर काट दिया।
शिव को इस वियोग से निकालने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती माता के देह को कई हिस्सों में विभाजित कर दिया। कहा जाता है कि जहां-जहां सती के अंग गिरे वहां-वहां शक्तिपीठों का निर्माण किया गया। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन मिलता है।
वहीं, देवी भागवत में 108 देवी गीता में 72 व तंत्रचूड़ामणि में 52 शक्ति पीठ बताए गए हैं। विभाजन के बाद भारत में कुल 42 शक्ति पीठ रह गए हैं, बाकि विदेश में स्थित हैं। 

साल में शक्ति की उपासना के चार प्रमुख पर्वों में से एक शारदीय नवरात्रि का माना जाता है। जो इन दिनों चल रहा है। इन 9 दिवसीय पर्व में एक चैत्र नवरात्रि और दो गुप्त नवरात्रि भी आती हैं।
ऐसे में देवी मां की उपासना के तहत भक्त देवी मां के मंदिरों में दर्शनों को जाते हैं। वहीं इन दिनों में देवी मां के शक्ति पीठों का दर्शन अत्यंत खास माना जाता है।
ऐसे में आज हम आपको उत्तरांचल में स्थित देवी मां के एक ऐसे शक्ति पीठ के बारे में बता रहे हैं। जिसे महाकाली की पीठ माना जाता है। वहीं यहां सती माता की नाभि गिरने का भी स्थान माना गया है। इसके साथ ही आज हम आपको बताएंगे कि आखिर इन शक्ति पीठों के अस्तित्व में आने की कहानी क्या है।
अत्यंत चमत्कारी इस शक्ति पीठ ( Purnagiri Mandir ) के संबंध में कहा जाता है कि अभी कुछ वर्षों पूर्व तक शाम होते ही यहां रूकना मना होता था, वहीं शाम के समय यहां से आने वाला सुमधुर संगीत बहुत कम व उन सिद्ध लोगों को ही सुनाई देता था जो यहां शाम के समय मौजूद रह जाते थे। लेकिन उनके लिए भी इस संगीत के स्थान तक पहुंचा मुमकिन न के बराबर था।


अत्यंत चमत्कारी व सिद्ध है पूर्णागिरी माता का मंदिर..
दरअसल पूर्णागिरी का मंदिर अन्नपूर्णा शिखर पर 5500 फीट की ऊंचाई पर है। कहा जाता है कि दक्ष प्रजापति की कन्या और शिव की अर्धांगिनी सती की नाभि का भाग यहां पर विष्णु चक्र से कट कर गिरा था।
प्रतिवर्ष इस शक्तिपीठ की यात्रा करने आस्थावान श्रद्धालु कष्ट सहकर भी यहां आते हैं। यह स्थान नैनीताल जनपद के पड़ोस में और चंपावत जनपद के टनकपुर से मात्र 17 किलोमीटर की दूरी पर है। "मां वैष्णो देवी" जम्मू के दरबार की तरह पूर्णागिरी दरबार में हर साल लाखों की संख्या में लोग आते हैं।
अत्यन्त दुरुह और खतरनाक रास्ता...
यहां पहुंचने का रास्ता अत्यन्त दुरुह और खतरनाक है। क्षणिक लापरवाही अनन्त गहराई में धकेलकर जीवन समाप्त कर सकती है। नीचे काली नदी का कल-कल करता पानी स्थान की दुरुहता से हृदय में कम्पन पैदा कर देता है।

Goddess Shakti Peetha: Where every part of Sati fell, there was the construction of Shaktipeeths - Story of Shaktipeeth
In relation to Shakti Peethas, it is believed that wherever the parts of Sati fell, Shaktipeeths were built there. Actually according to Devi Purana, once King Daksha performed a yajna. In this yajna, he invited all the gods, but did not invite Shiva and Sati.

Mother Sati came to know from Narada that a yagna is being done at her father's place. He also insisted on Shiva's refusal and went to Haridwar to attend the yajna of his father. On going there, when he came to know that all the gods except Shiva were invited to the yagna.

When he asked his father the reason for not calling Shivji, Daksha said derogatory things about Shivji. Those things were not tolerated by Mother Sati and she jumped into Agrikund and sacrificed her life. When this news reached Shivji, he became very angry and his third eye opened. Virabhadra beheaded Daksha at his behest.

To remove Shiva from this disconnection, Lord Vishnu divided the body of Sati Mata into several parts from the Sudarshan Chakra. It is said that wherever the parts of Sati fell, Shaktipeeths were built there. The description of 51 Shaktipeeths is found in Devi Purana.

At the same time, 108 Devi Bhagwat has 108 Devi Gita and Tantra Chudamani 52 Shakti Peetha. After partition, there are 42 Shakti Peethas in India, the rest are located abroad.



Shardiya Navaratri is considered one of the four major festivals of Shakti worship in the year. Which is going on these days. These 9 day festivals also include one Chaitra Navratri and two Gupta Navratri.

In such a situation, under the worship of the Mother Goddess, the devotees visit the temples of the Mother Goddess. At the same time, the view of Shakti Peethas of the Mother Goddess is considered very special in these days.

In such a situation, today we are telling you about one such Shakti Peetha of the Mother Goddess located in Uttaranchal. Which is considered the back of Mahakali. At the same time, the place of Sati Mata's navel fall is also considered. With this, today we will tell you what is the story of these Shakti Peethas coming into existence.

In connection with this extremely miraculous Shakti Peetha (Purnagiri Mandir), it is said that till a few years ago, it was forbidden to stop here in the evening, whereas the melodious music coming from here in the evening was heard only by those few and perfect people. Was who used to be present here in the evening. But for him too, reaching this place of music was impossible.



The temple of Purnagiri Mata is very miraculous and perfect ..
Actually, the temple of Purnagiri is at an elevation of 5500 feet on the Annapurna peak. It is said that the navel of Sati, the daughter of Daksha Prajapati and the Ardhangini Sati of Shiva, fell here from the Vishnu Chakra.

Faithful devotees also visit this Shaktipeeth every year after suffering. This place is in the neighborhood of Nainital district and only 17 kilometers from Tanakpur in Champawat district. "Maa Vaishno Devi" Like the court of Jammu, the Purnagiri court attracts millions of people every year.

Extremely dangerous and dangerous way ...
The way to reach here is very bitter and dangerous. Momentary carelessness can end life by being pushed into eternal depths. The water flowing down the Kali river every day causes vibrations in the heart due to the condition of the place.

देवराज इन्द्र ने की थी तपस्या यहां...
वहीं मंदिर के रास्ते में टुन्नास नामक स्थान पड़ता है, यहां पर देवराज इन्द्र ने तपस्या की, ऐसी भी जनश्रुती है। यहां ऊंची चोटी पर गाढ़े गए त्रिशुल आदि ही शक्ति के उस स्थान को इंगित करते हैं जहां सती का नाभि प्रवेश गिरा था।
पूर्णगिरी क्षेत्र की महिमा और उसके सौन्दर्य से एटकिन्सन भी बहुत अधिक प्रभावित था उसने लिखा है "पूर्णागिरी के मनोरम दृष्यों की विविधता एवं प्राकृतिक सौन्दर्य की महिमा अवर्णनीय है, प्रकृति ने जिस सर्वव्यापी वन सम्पदा के अधिर्वक्य से इस पर्वत शिखर पर स्वयं को अभिव्यक्त किया है, उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका का कोई भी क्षेत्र शायद ही इसकी समता कर सके, किन्तु केवल मान्यता व आस्था के बल पर ही लोग इस दुर्गम घने जंगल में अपना पथ आलोकित कर सके हैं।"



ऐसे समझें यहां की कथा
इस देवी दरबार की गणना भारत की शक्तिपीठों में की जाती है। शिवपुराण में रूद्र संहिता के अनुसार दश प्रजापति की कन्या सती का विवाह भगवान शिव के साथ किया गया था। एक समय दक्ष प्रजापति द्वारा यज्ञ का आयोजन किया गया जिसमें समस्त देवी देवताओं को आमंत्रित किया गया परन्तु शिव शंकर का अपमान करने की दृष्टि से उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया।
सती द्वारा अपने पति भगवान शिव शंकर का अपमान सहन न होने के कारण अपनी देह की आहुति यज्ञ मण्डप में कर दी गई। सती की जली हुई देह लेकर भगवान शिव शंकर आकाश में विचरण करने लगे भगवान विष्णु ने शिव शंकर के ताण्डव नृत्य को देखकर उन्हें शान्त करने की दृष्टि से सती के शरीर के अंग पृथक-पृथक कर दिए।

सती का नाभि: जहां-जहां पर सती के अंग गिरे वहां पर शक्तिपीठ स्थापित हो गये। पूर्णागिरी में सती का नाभि अंग गिरा वहां पर देवी की नाभि के दर्शन व पूजा अर्चना की जाती है।
ऐसे पहुंचे माता के दरबार, यह रखें तैयारी
पूर्णागिरी मैया का यह धाम टनकपुर(उत्तरांचल) में ही स्थित है। यहां पहुंचने के लिए टनकपुर नजदीक का रेलवे स्टेशन है। इसके अलावा बरेली से टनकपुर के लिए तमाम बसें उपलब्ध रहती हैं।
टनकपुर टेक्सी स्टैंड से पूर्णागिरी धाम के लिए दिन भर टैक्सी, बसों की सेवा उपलब्ध रहती है। टनकपुर से पूर्णागिरी धाम की दूरी 22 किलोमीटर है।
शक्ति पीठ में दर्शनार्थ आने वाले यात्रियों की संख्या वर्ष भर में 25 लाख से अधिक होती है। यहां आने के लिये आप सड़क या रेल के द्वारा पहुंच सकते है। वायु मार्ग से आने के लिए यहां का निकटतम हवाई अडड़ा पन्तनगर है। यहाँ सर्दी के मौसम में गरम कपड़े जरूरी हैं और तो और ग्रीष्म ऋतु मे हल्के ऊनी कपडों की जरूरत पड़ सकती है।

Devraj Indra did penance here ...
On the way to the temple, there is a place called Tunnas, here, Devraj Indra did penance, such is also Janashruti. Here the Trishul, etc., carved on a high peak indicates the place of power where Sati's navel entrance had fallen.

Atkinson was also deeply impressed by the splendor and beauty of the Purnagiri region.He wrote that "The diversity of panoramic views of Purnagiri and the splendor of natural beauty is indescribable, the universal forest wealth that nature has expressed itself on this mountain peak. , Hardly any region of North and South America can overcome it, but only on the strength of recognition and faith Only people have been able to illuminate their path in this inaccessible dense forest. "




Understand this story here
This goddess court is counted among the Shaktipeeths of India. According to the Rudra Samhita in Shivpuran, the daughter Sati of Dash Prajapati was married to Lord Shiva. Once a yajna was organized by Daksha Prajapati in which all the Gods and Goddesses were invited but they were not invited to insult Shiva Shankar.

Sati sacrificed her body in the Yagya Mandap because of not tolerating insult to her husband Lord Shiva Shankar. With the burnt body of Sati, Lord Shiva started wandering in the sky, Lord Vishnu, seeing the Tandava dance of Shiva Shankar, separated the body parts of Sati in order to calm them.



Sati's navel: Wherever Sati's limbs fell, Shaktipeeths were established there. In Purnagiri, the navel of Sati fell, where there is worship and worship of the Goddess's navel.

This is how Mother's court arrived, keep this preparation
This Dham of Purnagiri Maiya is located in Tanakpur (Uttaranchal). Tanakpur is the nearest railway station to reach here. Apart from this, all the buses are available from Bareilly to Tanakpur.

Taxi, buses services are available from Tanakpur taxi stand to Purnagiri Dham throughout the day. The distance from Tanakpur to Purnagiri Dham is 22 kilometers.

The number of travelers coming to the Shakti Peeth is more than 25 lakhs during the year. You can reach by road or rail to come here. The nearest airport to reach by air is Adra Pantnagar. Warm clothes are necessary here in winter and light woolen clothes may be needed in summer.


ऐसे समझें मां पूर्णागिरि का महातम्य...
चीन, नेपाल और तिब्बत की सीमाओं से घिरे सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण चंपावत जिले के प्रवेशद्वार टनकपुर से 19 किलोमीटर दूर स्थित यह शक्तिपीठ मां भगवती की 108 सिद्धपीठों में से एक है।
तीन ओर से वनाच्छादित पर्वत शिखरों एवं प्रकृति की मनोहारी छटा के बीच कल-कल करती सात धाराओं वाली शारदा नदी के तट पर बसा टनकपुर नगर मां पूर्णागिरि के दरबार में आने वाले यात्रियों का मुख्य पडाव है।
इस शक्तिपीठ में पूजा के लिए वर्ष-भर यात्री आते-जाते रहते हैं किंतु चैत्र मास की नवरात्र में यहां मां के दर्शन का इसका विशेष महत्व बढ जाता है। मां पूर्णागिरि का शैल शिखर अनेक पौराणिक गाथाओं को अपने अतीत में समेटे हुए है।
पौराणिक गाथाओं एवं शिव पुराण रुद्र संहिता के अनुसार मां सती का नाभि अंग अन्नपूर्णा शिखर पर गिरा जो पूर्णागिरि के नाम से विख्यात् हुआ तथा देश की चारों दिशाओं में स्थित मल्लिका गिरि,कालिका गिरि,हमला गिरि व पूर्णागिरि में इस पावन स्थल पूर्णागिरि को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ।
देवी भागवत और स्कंद पुराण तथा चूणामणिज्ञानाणव आदि ग्रंथों में इस प्राचीन सिद्धपीठ का भी वर्णन है जहां एक चकोर इस सिद्ध पीठ की तीन बार परिक्रमा कर राज सिंहासन पर बैठा। यहां छोटे बच्चों का मुंडन कराना सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

माता के बारे में कई गाथाएं और किन्दवंतिया प्रचलित है। कुछ लोगों की मान्यता है माता पूर्णागिरी का दरबार विश्व के 51 शक्ति पीठों में एक है अत: इस दरबार का अपना अलग महत्व है तभी यहां की जाने वाली मनौती अधूरी नहीं जाती। कुछ लोग बताते हैं पूर्णागिरी का इतिहास जानने से कई रहस्यमय तथ्यों की जानकारी मिलती है।

नवरात्रियों पर आते हैं लाखों भक्त
यहां हर नवरात्रि पर भक्तों के आने का सिलसिला जारी रहता है। सामान्यत: केवल नवरात्र में ही नहीं बल्कि हर मौसम में भक्त यहां आते हैं। वहीं शरद ॠतु की नवरात्रियों के स्थान पर यहां मेले का आनंद चैत्र की नवरात्रियों में ही अधिक लिया जा सकता है, क्योंकि वीरान रास्ता व इसमें पडऩे वाले छोटे-छोटे गधेरे मार्ग की जगह-जगह दुरुह बना देते हैं।
चैत्र की नवरात्रियों में लाखों की संख्या में भक्त अपनी मनोकामना लेकर यहाँ आते हैं। अपूर्व भीड़ के कारण यहाँ दर्शनार्थियों का ऐसा तांता लगता है कि दर्शन करने के लिए भी लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती है। मेला बैसाख माह के अन्त तक चलता है।
बाघ भी आता था यहां 
बुजुर्गों के अनुसार कुछ वर्ष पहले तक यहां शाम होते ही एक बाघ(माता की सवारी) आ जाता था, जो माता के मंदिर के पास ही सुबह तक रूकता। इस कारण पूर्व में लोग शाम होते ही यह स्थान खाली कर देते। अभी भी रात में यहां जाना वर्जित माना जाता है। मान्यता है कि यहां रात के समय केवल देवता ही आते हैं।

यहां वृक्ष नहीं काटे जाते 
यह स्थान महाकाली की पीठ माना जाता है, नेपाल इसके बगल में है। जिस चोटी पर सती का नाभि प्रदेश गिरा था उस क्षेत्र के वृक्ष नहीं काटे जाते। टनकपुर के बाद ठुलीगाढ़ तक बस से तथा उसके बाद घासी की चढ़ाई चढऩे के उपरान्त ही दर्शनार्थी यहां पहुंचते हैं।

This is how you understand the greatness of Mother Poornagiri…
Situated 19 km from Tanakpur, the gateway to the strategically important Champawat district, bordering China, Nepal and Tibet, this Shaktipeeth is one of the 108 Siddha Peethas of Maa Bhagwati.

Tanakpur city, situated on the banks of the seven-stream Sharda River, which is surrounded by three sides of the forested peaks and the beautiful landscape of nature, is the main stop for travelers coming to the court of Ma Purnagiri.

In this Shaktipeeth, travelers come and go throughout the year for worship, but in the Navratri of Chaitra month, the special significance of the mother's visit increases here. The rock peak of Maa Purnagiri contains many mythological stories in its past.

According to mythological legends and Shiva Purana Rudra Samhita, the navel limb of Mother Sati fell on the Annapurna Shikhar, which was known as Purnagiri and located in all four sides of the country, Mallika Giri, Kalika Giri, Hamad Giri and Purnagiri, this holy place, Purnagiri is the highest place. Received.

Devi Bhagwat and Skanda Purana and Churamanagyanananav etc. also have a description of this ancient Siddha Peetha where a chakor circled this Siddha Peeth thrice and sat on the throne. Here, shaving of young children is considered to be the best.



There are many stories about Kita and Kindavantiya prevalent. Some people believe that the court of Mata Purnagiri is one of the 51 Shakti Peethas of the world, so this court has its own separate significance only when the plea made here is not incomplete. Some people say that knowing the history of Purnagiri provides information about many mysterious facts.



Millions of devotees visit Navratri
The procession of devotees continues on every Navratri here. Generally, devotees come here not only in Navratri but also in every season. On the other hand, instead of the Navratris of Sharadu, the fair can be enjoyed here only in the Navratris of Chaitra, because the deserted way and the small donkeys that fall in it make the place of the path difficult.

Lakhs of devotees come here with their wishes in the Navratri of Chaitra. Due to the extraordinary crowd, there seems to be such influx of visitors here that one has to wait a long time to have a darshan. The fair runs till the end of Baisakh month.

Tiger also used to come here
According to the elders, till a few years ago, a tiger (mother's ride) used to come here in the evening, which stopped near the mother's temple till morning. Because of this people in the east would vacate this place as soon as evening. It is still considered taboo to go here at night. It is believed that only the gods come here at night.



Trees are not cut here
This place is considered to be the back of Mahakali, Nepal is next to it. Trees of the area on which the navel region of Sati fell, are not cut. After Tanakpur, the visitors reach here only after climbing the bus to Thuligadh and then after climbing Ghasi.

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