Prakash Parv of Shri Guru angad Dev Ji-श्री गुरु अंगद देव जी का प्रकाश पर्व - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Prakash Parv of Shri Guru angad Dev Ji-श्री गुरु अंगद देव जी का प्रकाश पर्व

श्री गुरु अंगद देव जी  फेरु मल जी तरेहण क्षत्रि के घर माता दया कौर जी की पवित्र कोख से मत्ते की सराए परगना मुक्तसर में वैशाख सुदी इकादशी सोमवार संवत १५६१ को अवतरित हुए| आपके बचपन का नाम लहिणा जी था| गुरु नानक देव जी को अपने सेवा भाव से प्रसन्न करके आप गुरु अंगद देव जी के नाम से पहचाने जाने लगे|

आप जी की शादी खडूर निवासी श्री देवी चंद क्षत्रि की सपुत्री खीवी जी के साथ १६ मघर संवत १५७६ में हुई| खीवी जी की कोख से दो साहिबजादे दासू जी व दातू जी और दो सुपुत्रियाँ अमरो जी व अनोखी जी ने जन्म लिया|

भाई जोधा सिंह खडूर निवासी से लहिणा जी को गुरु दर्शन की प्रेरणा मिली| जब आप संगत के साथ करतारपुर के पास से गुजरने लगे तब आप दर्शन करने के लिए गुरु जी के डेरे में आ गए| गुरु जी के पूछने पर आप ने बताया, “मैं खडूर संगत के साथ मिलकर वैष्णोदेवी के दर्शन करने जा रहा हूँ| आपकी महिमा सुनकर दर्शन करने की इच्छा पैदा हुई| किरपा करके आप मुझे उपदेश दो जिससे मेरा जीवन सफल हो जाये|” गुरु जी ने कहा, “भाई लहिणा तुझे प्रभु ने वरदान दिया है, तुमने लेना है और हमने देना है| अकाल पुरख की भक्ति किया करो| यह देवी देवते सब उसके ही बनाये हुए हैं|”


लहिणा जी ने अपने साथियों से कहा आप देवी के दर्शन कर आओ, मुझे मोक्ष देने वाले पूर्ण पुरुष मिल गए हैं| आप कुछ समय गुरु जी की वहीं सेवा करते रहे और नाम दान का उपदेश लेकर वापिस खडूर अपनी दुकान पर आगये परन्तु आपका धयान सदा करतारपुर गुरु जी के चरणों में ही रहता| कुछ दिनों के बाद आप अपनी दुकान से नमक की गठरी हाथ में उठाये करतारपुर आ गए| उस समय गुरु जी धान में से नदीन निकलवा रहे थे| गुरु जी ने नदीन की गठरी को गाये भैंसों के लिए घर ले जाने के लिए कहा| लहिणा जी ने शीघ्रता से भीगी गठड़ी को सिर पर उठा लिया और घर ले आये| गुरु जी के घर आने पर माता सुलखणी जी गुरु जी को कहने लगी जिस सिख को आपने पानी से भीगी गठड़ी के साथ भेजा था उसके सारे कपड़े कीचड़ से भीग गए हैं| आपने उससे यह गठड़ी नहीं उठवानी थी|



In the house of Shri Guru Angad Dev ji Feru Mal ji Terehan Kshatri, the sacred pargana of the mother with the holy womb of Mata Daya Kaur Ji appeared in Muktasar on Vaishakh Sudi Ikadashi on Monday Samvat 1561. Your childhood name was Lahina ji. Pleasing Guru Nanak Dev Ji with his sense of service, you began to differentiate yourself with the name of Guru Angad Dev Ji.

He was married to Khivi Ji, the daughter of Shri Devi Chand Kshatra, a resident of Khadur, in the 14th of Marv 15. Two Sahibzade Dasu ji and Datu ji and two sons Amro ji and Anokhi ji were born from Khivi Ji's womb.

Lahina ji got inspiration from Guru Darshan from Bhai Jodha Singh Khadur resident. When you started passing through Kartarpur with Sangat, then when you came to Guruji's camp to see Guru, you said, "I am going to see Vaishnodevi together with Khadur Sangat." Hearing your glory, a desire to see was born. Please teach me by Kirpa so that my life will be successful. Guruji said, "Brother, God has given you a boon, you have to take it and we have to give it. Do devotion to the famine-stricken one. All these gods and goddesses are made by him.



Lahiji said to his companions, come to see Goddess, I have found complete men who give salvation. You continued to serve Guru ji for some time and set fire to your shop in the name of preaching the name, but always keep your attention at the feet of Kartarpur Guru ji. After a few days, you took a bundle of salt from your shop and came to Kartarpur, at that time, Guruji was getting Nadine out of the paddy. Guru ji asked to take Nadine's bundle home for cows buffalo. Lahina ji quickly lifted the wet bundle on her head and brought it home. On coming to Guru ji's house, Mata Sulakhani started telling Guruji, who sent you with a bundle soaked with water, all his clothes are wet with mud. You did not have to lift this bundle.

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