Prakash Parv of Shri Guru Granth Sahib-श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश पर्व - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Prakash Parv of Shri Guru Granth Sahib-श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश पर्व

सिखों के ग्यारहवें गुरु ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ हैं
इस पवित्र ग्रंथ में 12वीं सदी से लेकर 17वीं सदी तक भारत के कोने-कोने में रची गई ईश्वरीय बानी है
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का संपादन सिखों के पांचवें गुरु ‘गुरु अर्जन देव जी’ द्वारा सन् 1604 ईसवी में कराया
पहली बार बाबा बुड्ढा जी द्वारा इस महान ग्रंथ के उपदेशों को पढ़ा गया
सिखों के सबसे पवित्र ग्रंथ गुरू ग्रंथ साहिब की महिमा अपार है। इसमें आत्मा, परमात्मा का पूजा ज्ञान और गुरू का प्रकाश भरा हुआ है। इस पवित्र ग्रंथ में ही सिखों की हर समस्या का समाधान मौजूद है, वे जब चाहें अपने प्रश्नों का उत्तर गुरु ग्रंथ साहिब में ढूंढ़ सकते हैं। हमारा ईश्वर आज कहां है, यह कोई नहीं जानता, लेकिन उससे जुड़ने का एक ज़रिया यही धार्मिक ग्रंथ हैं। इसी ईश्वरीय शक्ति के साथ हमारे बीच एक और पवित्र वजूद है सिखों के ग्यारहवें गुरु ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ का।

1,430 पन्नों में उल्लेखित रागमयी गुरुबाणी गुरु ग्रंथ साहिब जी की शोभा को बढ़ाती है। इस महान ग्रंथ के संकलन, आलेखन एवं उच्चारण से जुड़ा इतिहास इसके सुनहरे शब्दों की तरह ही सुनहरा है। इस पवित्र ग्रंथ में 12वीं सदी से लेकर 17वीं सदी तक भारत के कोने-कोने में रची गई ईश्वरीय बानी लिखी गई है।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का संपादन सिखों के पांचवें गुरु ‘गुरु अर्जन देव जी’ द्वारा सन् 1604 ईसवी में कराया गया था, लेकिन इस महान ग्रंथ के संकलन एवं आलेखन का असली कार्य तो पहले गुरु ‘गुरु नानक देव जी’ द्वारा ही आरंभ कर दिया गया था।

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार आखिरकार अगस्त 1604 में श्री हरिमंदिर साहिब, अमृतसर में गुरु ग्रंथ साहिब जी का पहला प्रकाश हुआ। संगतों ने कीर्तन दीवान सजाए, बाबा बुड्ढा जी द्वारा महान ग्रंथ के उपदेशों को पढ़ा गया। पहली पातशाही से छठी पातशाही तक अपना जीवन सिख धर्म की सेवा को समर्पित करने वाली बाबा बुड्ढा जी इस महान ग्रंथ के पहले ग्रंथी नियुक्त हुए।

परम ज्योति के रूप में समा जाने से पहले गुरु जी ने संगत से कहा कि ‘हमारे बाद ग्रंथ साहिब ही गुरु है, आज से इन्हें ही गुरु मानिए और इन्हीं के जरिए अपने दुखों का निवारण करें’।

“आज्ञा पई अकाल दी, तबे चलायो पंथ, सब सिखन को हुक्म है गुरु मानयो ग्रंथ”… सिख कौम के दसवें नानक गुरू गोबिंद सिंह जी ने यह अनमोल वचन अपने मुख से बोले थे। जिसके अनुसार आज से गुरु ग्रंथ साहिब ही हमारे गुरु हैं और इसके अलावा किसी भी सिख को अन्य मानवीय गुरु के आगे सिर झुकाने की अनुमति नहीं है।

The eleventh Guru of the Sikhs is ‘Sri Guru Granth Sahib Ji’
This sacred book has a divine book written in every corner of India from the 12th century to the 17th century.
Sri Guru Granth Sahib was edited by Guru Arjan Dev Ji, the fifth Guru of the Sikhs, in 1604 AD.
The teachings of this great book were read by Baba Budha ji for the first time
The glory of Guru Granth Sahib, the most sacred of Sikhs, is immense. It is full of soul, worship of God and knowledge of Guru. There is a solution to every problem of Sikhs in this holy book itself, they can find answers to their questions in Guru Granth Sahib whenever they want. No one knows where our God is today, but this is the only religious scripture to connect with him. With this divine power, there is another holy existence among us of the eleventh Guru of Sikhs, Shri Guru Granth Sahib.

Ragamayi Gurbani mentioned in 1,430 pages enhances the grace of Guru Granth Sahib Ji. The history associated with the compilation, writing and pronunciation of this great book is as golden as its golden words. From the 12th century to the 17th century, the divine book written in every corner of India has been written in this holy book.

Sri Guru Granth Sahib Ji was edited by Guru Arjan Dev Ji, the fifth Guru of the Sikhs in 1604 AD, but the real work of compiling and drafting this great book was first started by Guru 'Guru Nanak Dev Ji'. was given.

According to historical facts, in August 1604, the first light of Guru Granth Sahib came in Sri Harimandir Sahib, Amritsar. The Sangatas decorated the Kirtan Diwan, the teachings of the great book were read by Baba Budha ji. Baba Budha Ji, who dedicated his life to the service of Sikhism from the first Patshahi to the sixth Patshahi, was appointed the first Granthi of this great book.

Before being absorbed as the Supreme Jyoti, Guru Ji told Sangat that 'Granth Sahib is the Guru after us, consider him as Guru from today and only through this, relieve your sufferings'.

"The commandment was famine, the chalbe cult, all Sikhs are dictated by Guru Manayo Granth"… Guru Nanak Guru Gobind Singh, the tenth Sikh community, spoke this precious word from his mouth. According to which the Guru Granth Sahib is our Guru from today and apart from this no Sikh is allowed to bow his head in front of other human gurus.

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