Prakash Parv Baba Deep Singh Ji-प्रकाश पर्व श्री गुरु बाबा दिप सिंह जी - ॐ जय माता दी ॐ

Latest:

Translate

Search This Blog

“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Prakash Parv Baba Deep Singh Ji-प्रकाश पर्व श्री गुरु बाबा दिप सिंह जी

जब भी श्री हरिमंदर साहिब, अमृतसर की चर्चा चलती है तब हमेशा महान बलिदानी बाबा दीप सिंह जी के अद्वितीय बलिदान की याद अनायास आ जाती है। बाबा जी ने श्री हरिमंदर साहिब की पवित्रता की रक्षा के लिए बलिदान दिया। आध्यात्मिक शक्ति के पुंज बाबा दीप सिंह जी शीश कट जाने के बाद भी शीश हथेली पर रख कर लड़े और श्री हरिमंदर साहिब की परिक्रमा में पहुंच कर अपना वचन पूरा किया।

जन्म एवं शिक्षा-दीक्षा
बाबा दीप सिंह जी का जन्म श्री अमृतसर के ‘पहुविंड’ नामक गांव में पिता भगता जी और माता जीऊणी जी के घर सन् 1682 ई. में हुआ था। बाबा जी बचपन में ही दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की सेवा में श्री आनंदपुर साहिब आ गए थे। बाबा जी ने दशमेश पिता के हाथों से अमृत पान किया और उन्हीं से शस्त्र संचालन एवं गुरबाणी-अध्ययन की शिक्षा प्राप्त की। बाबा जी की रुचियां आध्यात्मिक थीं और आप सदैव नाम-सिमरन तथा गुरबाणी पठन में रत रहते। आप अत्यंत सुडौल एवं दृढ़ शरीर वाले योद्धा भी थे। आपने दशमेश पिता द्वारा लड़े गए सभी युद्धों में भाग लिया और खूब पराक्रम दिखाया।


बाबा जी की विद्वता
दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी इनकी विद्वता से भी बहुत प्रभावित थे। जब गुरु जी ने श्री गुरु साहिब का भावार्थ किया था तो उसे सबसे पहले सुनने वाले 47 सिखों में ये भी एक थे।

धीर मलिकों ने जब श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बीड़ देने से इंकार कर दिया तो दशमेश पिता ने इन्हें भाई मनी सिंह जी के साथ मिलकर तलवंडी साबो में रहकर श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बीड़ तैयार करने का आदेश दिया। यहां बाबा दीप सिंह जी ने कई हस्तलिखित बीड़ें (श्री गुरु ग्रंथ साहिब) तैयार कीं जो बाद में चार तख्त साहिबान पर भेजी गईं।

बाबा जी तलवंडी साबो में रहते हुए गुरबाणी पठन-पाठन और अध्ययन करवाने की सेवा भी करते रहे। इस प्रकार यहां गुरबाणी के अर्थ करने की एक टकसाल आरंभ हुई जो कालांतर में ‘दमदमी टकसाल’ कहलाई।

योद्धा के रूप में : जब बाबा बंदा सिंह बहादुर पंजाब आए तब बाबा दीप सिंह जी उनके साथ हो लिए और अनेक युद्धों में शामिल होकर अपनी वीरता के जौहर दिखाए।

बाबा बंदा सिंह बहादुर की शहादत के बाद आप फिर तलवंडी साबो लौट आए और गुरबाणी-अध्ययन व पठन-पाठन में जुट गए।

सन् 1730-32 ई. में ‘बंदई खालसा’ और ‘तत्त खालसा’ के आपसी विवाद को सुलझाने में भी आपने भाई मनी सिंह जी के साथ मिलकर भूमिका निभाई।

सन् 1748 ई. में जब ‘मिसलों’ की स्थापना हुई तो बाबा दीप सिंह जी को ‘शहीदां दी मिसल’ का जत्थेदार नियुक्त किया गया।

श्री हरिमंदर साहिब की रक्षा में बलिदान
सन् 1757 ई. में अहमद शाह अब्दाली ने नगर श्री अमृतसर पर कब्जा कर श्री हरिमंदर साहिब को ढहा दिया और अमृत सरोवर को मिट्टी से भर दिया। यह खबर मिलते ही बाबा जी का खून खौल उठा। 75 वर्ष की वृद्धावस्था होने के बावजूद आपने खंडा उठा लिया।
तलवंडी साबो से चलते समय बाबा जी के साथ सिर्फ आठ सिख थे, परंतु रास्ते में और सिखों के आकर मिलते रहने से श्री तरनतारन तक पहुंचते-पहुंचते सिखों की संख्या पांच हजार तक पहुंच गई।

श्री तरनतारन से दस किलोमीटर दूर गोहलवड़ गांव के निकट सिखों और अफगान सिपहसालार जहान खान के लश्कर में जबरदस्त जंग शुरू हो गई। श्री हरिमंदर साहिब की बेअदबी से क्रोधित सिखों ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए।

अफगानों को गाजर-मूली की तरह काटते हुए बाबा दीप सिंह जी आगे बढ़ रहे थे कि तभी एक घातक वार बाबा जी की गर्दन पर पड़ा। बाबा जी की गर्दन कट गई और वह युद्ध भूमि में गिर पड़े। यह देख कर एक सिख पुकार उठा :
प्रण तुम्हारा दीप सिंघ रहयो। गुरुपुर जाए सीस मै देहऊ। मे ते दोए कोस इस ठै हऊ।

अर्थात बाबा दीप सिंह जी, आपका प्रण तो गुरु नगरी में जाकर शीश देने का था पर वह तो अभी दो कोस दूर है।

यह सुनते ही बाबा दीप सिंह जी फिर उठ खड़े हुए। दाहिने हाथ में खंडा लिया, बाएं हाथ से शीश संभाला और पुन: युद्ध आरंभ कर दिया। बाबा जी युद्ध करते-करते गुरु की नगरी तक जा पहुंचे। बाबा जी के साथ-साथ अनेक सिख शहीद हो गए, परंतु श्री हरिमंदर साहिब की बेअदबी का बदला ले लिया गया।

बाबा दीप सिंह जी का अंतिम संस्कार श्री अमृतसर नगर में चाटीविंड दरवाजे के पास गुरुद्वारा रामसर साहिब के निकट किया गया। आज इस पवित्र स्थान पर गुरुद्वारा श्री शहीदगंज साहिब सुशोभित है। बाबा जी ने श्री हरिमंदर साहिब की परिक्रमा में जहां शीश भेंट किया था, वहां भी गुरुद्वारा साहिब निर्मित है। बाबा जी का खंडा श्री अकाल तख्त साहिब में सुशोभित है।

Whenever the discussion of Shri Harimandar Sahib, Amritsar is going on, always the memory of the unique sacrifice of the great sacrifice Baba Deep Singh Ji comes spontaneously. Baba Ji sacrificed to protect the sanctity of Shri Harimander Sahib. Baba Deep Singh Ji, the Punja of spiritual power, fought with the head on the palm even after his head was cut and reached the circumambulation of Shri Harimandar Sahib and fulfilled his promise.

Birth and education
Baba Deep Singh ji was born in 1682 AD in the house of father Bhagata ji and mother jiuni ji in the village named 'Pahuwind' of Shri Amritsar. Baba ji had come to Shri Anandpur Sahib in the service of Shri Guru Gobind Singh Ji, Dashmesh's father in his childhood. Baba ji received Amrit from the hands of Dashmesh's father and got education of arms operation and Gurbani studies from him. Baba ji's interests were spiritual and you would always stay in Naman-Simran and Gurbani recitation. He was also a warrior with a very curvy and firm body. You participated in all the battles fought by Dashmesh's father and showed great courage.


Baba ji's scholarship
Dashmesh's father Shri Guru Gobind Singh ji was also very impressed by his scholarship. When Guru Ji had done the devotion of Sri Guru Sahib, he was also one of the 47 Sikhs who listened to him first.

When Dheer Malikon refused to give the beed of Sri Guru Granth Sahib, Dashmesh's father along with Bhai Mani Singh ji ordered him to prepare the beed of Sri Guru Granth Sahib by staying in Talwandi Sabo. Here Baba Deep Singh Ji prepared several handwritten beedas (Sri Guru Granth Sahib) which were later sent to Char Takht Sahiban.

While living in Talwandi Sabo, Baba also continued to serve Gurbani, reading and studying. Thus, a mint for Gurbani was started here, which was later called 'Damdami mint'.

As a warrior: When Baba Banda Singh Bahadur came to Punjab, Baba Deep Singh ji joined him and showed his heroism by joining many wars.

After the martyrdom of Baba Banda Singh Bahadur, you returned to Talwandi Sabo again and got involved in Gurbani studies and reading.

In 1730-32 AD, he also played a role with Bhai Mani Singh ji in resolving the mutual dispute between 'Bandai Khalsa' and 'Tatta Khalsa'.

In 1748, when 'Misalon' was established, Baba Deep Singh Ji was appointed as the Jathedar of 'Shaheedan Di Missal'.

Sacrifice in defense of Shri Harimander Sahib
In 1757 AD, Ahmad Shah Abdali captured the city Sri Amritsar and demolished Shri Harimandar Sahib and filled the Amrit Sarovar with mud. Baba ji's blood boiled after receiving this news. Despite being an old age of 75, you took up the Khanda.
There were only eight Sikhs with Baba ji while walking from Talwandi Sabo, but the number of Sikhs reaching Shri Tarn Taran reached five thousand by the way and with Sikhs coming together.

A fierce battle ensued in the Lashkar of Sikhs and Afghan warlord Jahan Khan near Gohalvad village, ten kilometers from Sri Tarn Taran. Enraged by the insolence of Shri Harimander Sahib, the Sikhs rescued the enemy's sixes.

While cutting the Afghans like carrot-radish, Baba Deep Singh ji was moving that when a fatal attack hit Baba ji's neck. Baba ji's neck was cut and he fell into the battle ground. Seeing this, a Sikh called out:
Pran your deep Singh. Gurupur goes to Sise, I am here. I am cursing you.

That is, Baba Deep Singh ji, your pledge was to go to the Guru city to give the head, but it is still two curses away.

Baba Deep Singh Ji stood up again on hearing this. Khanda in right hand, Shisha with left hand and started the war again. Baba ji reached the Guru's city while fighting. Along with Baba Ji, many Sikhs were martyred, but Shri Harimander Sahib's vengeance was avenged.

The last rites of Baba Deep Singh ji were performed near Gurdwara Ramsar Sahib near Chatwind Darwaza in Shri Amritsar Nagar. Today, Gurudwara Shri Shaheedganj Sahib is adorned at this holy place. Gurdwara Sahib is also built where Baba ji offered the head in the circumambulation of Shri Harimander Sahib. Baba Ji's Khanda is embellished in Sri Akal Takht Sahib.

No comments:

Post a comment