Sri Guru Govind Singh Ji Prakash Parv History-श्री गुरु गोबिंद सिंह जी प्रकाश पर्व इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Sri Guru Govind Singh Ji Prakash Parv History-श्री गुरु गोबिंद सिंह जी प्रकाश पर्व इतिहास

परोपकारी गुरु गोविंद सिंह जी में सबसे बड़ी बात यह थी कि वे अपने आपको औरों जैसा सामान्य व्यक्ति ही मानते थे। गुरु गोविंद सिंह जी के बारे में लिखना मुश्किल है, क्योंकि साहिब-ए-कलाम बादशाह दरवेश गुरु गोविंद सिंह जैसा न कोई हुआ और न कोई होगा।


पुत्र के रूप में :-
आपके जीवन के बारे में लिखते समय यह समझ में नहीं आता है कि आपका जीवन किस पक्ष में लिखा जाए। अगर आपको एक पुत्र के रूप में ‍देखा जाए तो आपके जैसा कोई पुत्र नहीं जिसने अपने पिता को हिंदू धर्म की रक्षा के लिए शहीद होने का आग्रह किया हो।

पिता के रूप में :- अगर आपको पिता के रूप में देखें तो भी आपके जैसा महान पिता कोई नहीं, जिन्होंने खुद अपने बेटों को शस्त्र दिए और कहा कि जाओ मैदान में दुश्मन का सामना करो और शहीदी जाम को पिओ।
लेखक के रूप में :- अगर आपको लिखारी के रूप में देखा जाए तो आप धन्य हैं। आपका दसम ग्रंथ, आपकी भाषा, आपकी इतनी ऊंची सोच को समझ पाना आम बात नहीं है।


त्यागी के रूप में :- अगर एक त्यागी के रूप में आपको देखा जाए तो आपने आनंदपुर के सुख छोड़, मां की ममता, पिता का साया, बच्चों के मोह को आसानी से धर्म की रक्षा के लिए त्याग दिया।


योद्धा के रूप में :-
अगर आपको एक योद्धा के रूप में देखें तो ‍हैरानी होती है कि आपने अपने हर तीर पर एक तोला सोना लगवाया हुआ था। जब इस सोने का कारण आपसे सिखों ने पूछा कि मरते तो इससे दुश्मन होते है फिर ये सोना क्यों?

तो आपका उत्तर था कि मेरा कोई दुश्मन नहीं है। मेरी लड़ाई जालिम के जुल्म के खिलाफ है। इन तीरों से जो कोई घायल होंगे वो इस सोने की मदद से अपना इलाज करवा कर अच्छा जीवन व्यतीत करें और अगर उनकी मौत हो गई तो उनका अंतिम संस्कार हो सकें।

गुरु के रूप में :- आपके जैसा गुरु भी कोई नहीं जिसने अपने को सिखों के चरणों में बैठकर अमृत की दात मंगाई और वचन किया कि मैं आपका सेवक हूं जो हुकूम दोगे मंजूर करूंगा। समय आने पर आपने सिखों के हुकूम की पालना भी की।

आपने अपने जीवन का हर पल परोपकार में व्यतीत किया। आपके जितने गुणों का बखान किया जाए वो कम ही है। अंत में बस इतना ही कि 'जैसा तू तैसा तू ही क्या किछ उपमा दी जें।'

The biggest thing in the philanthropist Guru Govind Singh ji was that he considered himself as a normal person. It is difficult to write about Guru Govind Singh ji, because Sahib-e-Kalam emperor Darvesh was neither like nor will anyone like Guru Govind Singh.


As a son: -
While writing about your life it is not understandable which side of your life to write. If you are seen as a son then there is no son like you who has urged his father to be a martyr for the defense of Hinduism.

As a father: - Even if you see him as a father, there is no great father like you, who himself gave weapons to his sons and said go face the enemy in the field and drink martyr jam.
As a writer: - If you are seen as a writing, then you are blessed. It is not common to understand your ten texts, your language, your high thinking.


As a Tyagi: - If you are seen as a Tyagi, then you gave up the joys of Anandpur, the mother's love, the father's shadow, the child's fascination with ease to protect the religion.


As a warrior: -
If you see him as a warrior, then you are shocked that you had a gold weaver installed on each of your arrows. When the Sikhs asked you the reason for this gold, if they die then there are enemies, then why this gold?

So your answer was that I have no enemy. My fight is against the oppression of the bloodthirsty. Those who will be injured by these arrows, get their treatment with the help of this gold and lead a good life and if they die, they can be cremated.

As a Guru: - There is no Guru like you, who seated himself at the feet of the Sikhs and asked for the teeth of the nectar and vowed that I will be your servant who will accept the order. When the time came, you also cared for the Sikhs.

You spent every moment of your life in philanthropy. The number of qualities you have to be mentioned is less. In the end, all that is said is, 'As you tit, what are you upma di ji'.

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