Sri Guru Har Gobind Ji Prakash Parv History-श्री गुरु हर गोबिंद जी प्रकाश पर्व इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Sri Guru Har Gobind Ji Prakash Parv History-श्री गुरु हर गोबिंद जी प्रकाश पर्व इतिहास

मीरी – पीरी के मालिक – गुरु हरगोबिन्द साहिब जी
मीरी पीरी के मालिक…सच्चे पातशाह जिन्होंने अपनी आंखों से सिखी का पौधा मजबूत होते देखा है…विरासत में मिले इस पौधे की जड़े मजबूत करने में इन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी…जी हां बात कर रहे हैं सिखों के छठे पातशाह साहिब श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब जी की…जिनका आज है प्रकाश पर्व जिसे देशभर में बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जा रहा है…मीरी पीरी के मालिक, दाता बन्दी छोड़, भक्ति और शक्ति के मालिक साहिब श्री गुरु हरगोबिन्द जी का जन्म 5 जुलाई 1595 में …गुरु की वडाली जिला अमृतसर में हुआ …इनकी माता गंगा जी…जो औलाद न होने के कारण परेशान थी …गुरु अर्जुन देव जी ने इसके लिए बाबा बुड्ढा जी का आशीर्वाद लेने को कहा…बाबा बुड्ढा जी जो गुरु घर और गायों को घास डालने की सेवा करते थे…माता गंगा जी एक दिन तैयार होकर कई तरह के पकवान बनाकर बाबा बुड्ढा जी के पास गईं…मगर बाबा बुड्ढा जी ने ये पकवान नहीं खाए… लेकिन माता गंगा ने पुत्र का वरदान मांगा…इस पर बाबा बुड्ढा जी ने कहा कि मैं तो गुरु घर का साधारण सा सेवक हूं …लेकिन गुरु अर्जुन देव जी सब कुछ जानते थे …पुत्र की चाहत में माता गंगा जी फिर गुरु अर्जुन देव जी के पास आई तब गुरु अर्जुन देव जी ने कहा कि आप बाबा बुड्ढा जी के पास वेष बदल कर साधारण कपड़े पहन कर जाएं… इस तरह माता गंगा जी आस्था के साथ, मिस्सी रोटी , लस्सी का कटोरा, और प्याज़ लेकर गईं एक बार फिर बाबा बुड्ढा जी की सेवा में पहुंची …अब की बार बाबा बुड्ढा जी को भूख बड़ी तेज लगी थी और प्याज को हाथ से तोड़ते हुए बाबा बुड्ढा जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि पुत्री तेरे घर ऐसे पुत्र का जन्म होगा जो प्याज़ की तरह दुश्मनों के छक्के छुड़ाएंगा। इस तरह बाबा बुड्ढा जी के आशीर्वाद से गुरु हरगोबिन्द जी का जन्म हुआ…पुत्र के जन्म की खुशी में गुरु अर्जुन देव ने अमृतसर में छ हरटों वाला कुआ लगवाया ..जिसे छेहरटा साहिब कहा जाता है…गुरु हरगोबिन्द जी के प्रकाश पर्व को पूरे देश में बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है…इस दिन नगर कीर्तन निकाले जाते हैं …लंगर लगाए जाते है गुरुद्वारों में संगत गुरु घर की सेवा में लीन नज़र आती है … हर श्रद्धालु आस्था में रंगा नज़र आता है पूरा माहौल गुरु हरगोबिन्द जी के रंग में रंग जाता है…।
चेहरे पर अलग ही नूर जो किसी दरवेश के चेहरे पर ही होता है…जब गुरु हरगोबिन्द जी की उम्र महज 11 साल की थी…तब इनके पिता गुरु अर्जुन देव जी शहीद हो गए थे…गुरू अर्जुन देव जी की शहीदी के बाद गुरुगद्दी का भार गुरु हरगोबिन्द जी के कंधों पर आ गया…यही बस नही हुआ नन्हें हरगोबिन्द जी को मारने की भी कोशिशें की गईं …मगर उस अकाल पुरख के आगे किसी का बस नहीं चलता और शत्रुओं की सभी चालें धरी की धरी रह जाती हैं…गुरु हरगोबिन्द जी के जन्म से सबसे ज्यादा दुखी थे पृथी चंद …उन्होंने नन्हें साहिबजादें को मारने के लिए कई साजिशें रचीं…पहले तो उनको दूध में जहर पिलाने की कोशिश की गई …फिर सांप कटवाने की चाल चली गई…मगर पृथी चंद अपनी सभी चालों में नाकाम रहा..बाल उम्र में गुरु हरगोबिंद जी को चेचक जैसी खतरनाक बीमारी ने घेर लिया…ठीक होने के बाद गुरु साहिब ने अकाल पुरख का शुक्रिया अदा करते हुए कहा…

सदा सदा हरि जापे।।प्रभ बालक राखे आपे।।
सीतला ते रखिआ बिहारी।। पारब्रह्म प्रभ कृपा धारी।।
गुरु हरगोबिन्द जी जब 6 साल के हुए तो श्री गुरु अर्जुन देव जी ने बाबा बुड्ढा जी से कहा बाबा जी फट्टी पर पैंती लिखकर साहिबजादे को दें…बाबा जी ने पांचों गुरुओं का ध्यान लगाकर फट्टी लिखी …इस तरह बाबा बुड्ढा जी से साहिब श्री हरगोबिन्द जी ने आस्त्र – शस्त्र , घुड़सवारी, तीरंदाजी, निशानेबाजी, राजनीति और रणनीति की शिक्षा ग्रहण की…जब इन्हें गुरुगद्दी सौंपी गई तो गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने कहा बाबा जी मुझे तलवारें पहनाओं..बाबा बुड्ढा जी ने उन्हें दो तलवारें पहनाई मीरी और पीरी। गुरु हरगोबिन्द जी के तीन विवाह हुए …माता नानकी, माता महादेवी और माता दमोदरी जी इनकी पत्नियां थीं…इनके घर बाबा गुरदिता, बाबा सूरजमल, बाबा अणी राय, बाबा अटल राय , गुरु तेग बहादुर ने जन्म लिया जबकि बीबी बीरो आपकी पुत्री थीं। गुरु हरगोबिन्द जी ने जो दो तलवारें धारण की थीं …वो दोनों आध्यात्मिक और शक्ति का प्रतीक थीं । मीरी तलवार प्रतीक थी राजनीतिक शक्ति और पीरी प्रतीक थी आध्यात्मिक शक्ति का …राजनीति में सिख अपनी अच्छी तरह से पैठ बनाए…इसके लिए 1609 में गुरु जी ने श्री हरिमंदिर साहिब, अमृतसर में अकाल तख्त का निर्माण करवाया… जहांगीर का हुक्म था कोई भी अपना निजि चबूतरा 2 फुट से ऊंचा नहीं बनवाएगा लेकिन गुरु जी ने इन बातों की कोई परवाह नहीं की और अकाल तख्त बारह फुट ऊंचा बनवाया गया…यहां बैठकर गुरु साहिब सिखों को धर्म उपदेश के साथ साथ सिख मसलों को सुलझाते थे…गुरु जो होते है परम ज्ञानी होते हैं और वो करते हैं सबके साथ न्याय …अन्याय तो उनके दरबार में होता ही नहीं…लोग गुरु साहिब की न्यायप्रियता से इस कदर कायल हो गए कि दिल्ली और लाहौर जाने की बजाए यहीं आने लगे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी की ओर से स्थापित श्री अकाल तख्त साहिब में आज भी सिखों के फैसले होते हैं…समय की नज़ाकत को समझते हुए…गुरु हरगोबिन्द साहिब जी ने शास्त्र शिक्षा ली…वो हर तरह के हथियार चलाने में माहिर थे…वे महान योद्धा थे…वो चाहते थे कि हर एक सिख बहादुर बने…जुल्म और अत्याचार का डटकर मुकाबला करे…गुरु गद्दी संभालते हुए जब इन्होंने मीरी और पीरी तलवारें धारण कीं…तो तब सिख इतिहास ने एक नया मोड़ लिया…छठे पातशाह साहिब श्री गुरु हरगोबिन्द जी की बातों से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें भेंट स्वरूप घोड़े और शस्त्र देने शुरू कर दिए…अकाल तख्त पर कवियों और ढाडियों ने गुरु यश और वीर योद्धाओं की गाथाएं गानी शुरू कर दीं…लोगों ने मुगल साम्राज्य को जड़ से उखाड़ने का मन बना लिया…गुरु हरगोबिन्द जी गुरु नानक देव जी के विचारों को प्रफुल्लित करने में जुटे थे…जो मुगल बादशाह जहांगीर को बर्दाश्त नहीं था …गुरु जी की यश गाथा सुन कर जहांगीर ने गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया…

Miri - owner of Piri - Guru Hargobind Sahib

Owner of Miri Piri… True Patshah who has seen the Sikh plant growing stronger with his own eyes… He has left no stone unturned in strengthening the roots of this inherited plant… Yes, the sixth Patshah Sahib of the Sikhs, Shri Guru Hargobind Sahib ji… Today is Prakash Parv, which is being celebrated with great reverence and pomp across the country… The owner of Miri Piri, the donor Bandi Chodi, of devotion and power Lalik Sahib Sri Guru Hargobind ji was born on 5 July 1595… in Guru's Wadali District Amritsar… His mother Ganga ji… who was troubled due to lack of children… Guru Arjun Dev Ji asked Baba Budha ji’s blessings for this. … Baba Budha ji who used to serve grass to the Guru house and cows… Mother Ganga ji got ready one day and went to Baba Budha ji by making many types of dishes… but Baba Budha ji made this dish Do not eat… but Mata Ganga asked for the boon of the son… On this Baba Budha ji said that I am a simple servant of Guru Ghar… but Guru Arjun Dev ji knew everything… Mata Ganga ji then Guru Arjun in want of a son Then Guru Arjun Dev Ji came to Dev Ji and said that you should change your dress with Baba Budha ji and put on simple clothes… in this way Mata Ganga Ji with faith, missi roti, bowl of lassi, and onion She went once again to the service of Baba Budha ji… Now this time Baba Budha ji was very hungry and while breaking the onion by hand, Baba Budha ji blessed and said that the daughter will be born to your son who will Like the onion, the enemies' sixes will be delivered. In this way, Guru Hargobind ji was born with the blessings of Baba Budha ji… In the joy of the birth of a son, Guru Arjun Dev installed a six-well well in Amritsar .. which is called Chheharta Sahib… Prakash Parv of Guru Hargobind ji all over the country. It is celebrated with great reverence and pomp… On this day city kirtans are taken out… Anchors are put up, in the gurudwaras, the sangat Guru is absorbed in the service of the house… The whole atmosphere seems to be colored in the faith of the devotees, the whole atmosphere is colored in the color of Guru Hargobind ji….

Noor on the face, which is on the face of a dervish… When Guru Hargobind ji was just 11 years old, then his father Guru Arjun Dev ji was martyred… after the martyrdom of Guru Arjun Dev ji, the burden of Guru Gaddi Guru Hargobind ji fell on his shoulders… It was not just that even small attempts were made to kill Hargobind ji… but no one can walk in front of that famine ancestor and all the tricks of enemies remain I… Prithi Chand was most saddened by the birth of Guru Hargobind ji… He hatched many conspiracies to kill the younger Sahibzadas… First they tried to poison him in milk… Then the trick of snake snatching went away… But Prithi Chand Apna All tricks failed .. Guru Hargobind Ji was surrounded by a dangerous disease like smallpox in his age… After recovering, Guru Sahib thanked the Akal Purakh…

Always go to Hari.

Sitla te Rakhia Bihari. Parbrahm Prabh Kripa Dhari ...

When Guru Hargobind ji was 6 years old, Shri Guru Arjun Dev ji asked Baba Budha ji to give Sahibzade by writing a panty on Baba ji… Baba ji wrote with attention to the five gurus… and wrote Baba Budha ji to Sahib Shri Hargobind Ji studied weapons - weapons, horse riding, archery, shooting, politics and strategy… When he was handed the Guru Gaddi, Guru Hargobind Singh Ji said Baba Ji made me wear swords .. Baba Budha Ji made him wear two swords Miri and Piri. Guru Hargobind ji had three marriages… Mata Nanaki, Mata Mahadevi and Mata Damodari ji were his wives… Baba Gurdita, Baba Surajmal, Baba Ani Rai, Baba Atal Rai, Guru Tegh Bahadur were born to his house while Bibi Biro was your daughter. The two swords that Guru Hargobind ji wore… were both spiritual and symbol of strength. Miri Talwar was a symbol of political power and Piri was a symbol of spiritual power… Sikhs in politics made good inroads… For this, Guruji built the Akal Takht in Sri Harimandir Sahib, Amritsar in 1609… Jahangir was dictated by anyone. The private platform will not be built more than 2 feet high, but Guruji did not care about these things and the Akal Takht was made twelve feet high… sitting here Guru Sahib Along with preaching religion to Sikhs, they used to solve Sikh issues… Gurus who are supreme knowledgeable and they do justice to all… injustice does not happen in their court… people became so convinced of the justness of Guru Sahib that Instead of going to Delhi and Lahore, they started coming here, in Sri Akal Takht Sahib, established by Guru Hargobind Singh Ji, even today, the decisions of the Sikhs are… Realizing the danger of time… Guru Harg Bind Sahib ji took scripture education… He was adept in wielding all kinds of weapons… He was a great warrior… He wanted every Sikh to be brave… to fight persecution and tyranny… When he took the throne, when he took the throne, Miri and Piri Wearing swords… So Sikh history took a new turn… People were impressed by the words of the sixth Patshah Sahib Shri Guru Hargobind ji and presented them with horses and weapons They started… Poets and Dhadis started singing saga of Guru Yash and valiant warriors on the Akal Takht… People made up their mind to uproot the Mughal Empire… Guru Hargobind ji in cheerful thoughts of Guru Nanak Dev ji Was converting… which the Mughals
गुरु जी के अथक प्रयासों से सिख परम्परा में नया मोड़ आ रहा था और सिख धर्म तेजी से विकास कर रहा था …गुरू हरगोबिन्द जी की आभा और शक्ति का लोगों के दिलो दिमाग पर ऐसा असर हुआ कि वो गुरु के रंग में रंग गए….उनकी आध्यात्मिक और भक्ति की शक्ति का प्रभाव धर्म के ठेकेदारों को बर्दाश्त नहीं हो रहा था…मुगल बादशाह जहांगीर को ये बात हजम नहीं हो रही थी …उसने गुरू जी को ग्वालियर के किले में नज़रबंद कर दिया…गुरु साहिबान बड़े ही दयालु होते हैं…जेल के दौरान गुरु महाराज को जो रुपए मिलते वो अन्य कैदियों को बांट देते थे…ग्वालियर के इस किले में कई राजे महाराजे भी सजा काट रहे थे …उनका जीवन नरक से भी बदतर था…जहां सच्चा शहनसाह होगा वहां का वातावरण तो बदलना जाहिर सी बात है…गुरु हरगोबिन्द जी के जेल जाने से मानो जेल की आबो हवा ही बदल गई…साईं मीयां मीर जी जो कि हजरत मुहम्मद साहिब के खलीफा वंश से ताल्लुक रखते थे…उनका मुस्लिम समाज में बड़ा ही सम्मान था..उन्होंने गुरु हरगोबिन्द जी को आजाद करने की सिफारिश की…जब वजीरखान गुरु हरगोबिन्द जी को आजाद करने के लिए ग्वालियर के किले में पहुंचा तो गुरु साहिब ने रिहा होने से इंकार कर दिया…वो चाहते थे कि 52 राजाओं को भी उनके साथ छोड़ा जाए…इस तरह बादशाह ने 52 राजाओं को ग्वालियर के किले से मुक्त करवाया…गुरु जी ने 52 कलियों वाला चोला बनवाया और उस पर बनी एक एक कली उन्होंने इन राजाओं को पकड़ने को कहा इस तरह सारे राजा गुरु जी का चोला पकड़कर किले के बाहर आ गए…इस उपकार के कारण लोग गुरु साहिब को दाता बन्दी छोड़ कहने लगे। गुरु हरगोबिन्द जी इन सभी हिन्दू राजाओं को रिहा करवा कर गुरु मर्यादा अनुसार अमृतसर पहुंचे…ये दिन दीवाली की तरह थी…गुरु जी के आने की खुशी में लोगों ने घी के दीए जला कर अपनी खुशी का इज़हार किया और सारे शहर में दीपमाला प्रज्वलित की गई …
गुरू हरगोबिन्द जी ने सिख धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए कई यात्राएं की एक बार जब कश्मीर की यात्रा कर रहे थे तो इनकी मुलकात माता भाग्भरी से हुई…जिन्होंने सवाल पूछा कि क्या आप गुरु नानक देव जी हैं…क्योंकि भाग्भरी ने पहले गुरु नानक देव जी को नहीं देखा था…उन्होंने गुरु नानक देव जी के लिए 52 कलियों का चोला बनाया …माता भाग्भरी की गुरु नानक देव के प्रति श्रद्धा को देखते हुए गुरु हरगोबिन्द जी ने ये चोला पहना और इसी चोले को पहनकर गुरु जी ने 52 राजाओं को गवालियर के किले की कैद से छुड़वाया था…तभी से इन्हें दाता बन्दी छोड़ कहा जाता है…
पंजि पिआले पंजि पीर छठमु पीरु बैठा गुर भारी।
पंज प्याले से भाव यह है सच, संतोष, दया, धर्म और धीरज के गुण उस अकाल पुरख में ही हो सकते हैं…गुरु हरगोविंद साहिब जी ने लोक भलाई के ऐसे ऐसे काम किए हैं जिनकी तारीफ में शब्द भी कम पड़ सकते हैं….और हमारी जुबान इस लायक नहीं है कि हम उनकी तारीफ कर सकें…सभी गुरुओं में एक ही जोत है इसलिए तो कहा भी गया है…
अरजुन काया पलटि कै मूर्ति हरगोबिन्द सवारी
दलिभंजन गुरु सूरमा वड जोधा बहु परउपकारी ।।
दलभंजन गुरू सूरमा से भाव यह है कि उनमें गुण ही गुण भरे पड़े हैं…गुरु हरगोबिन्द जी और मुगलों के बीच चार युद्ध हुए… जिसमें गुरु हरगोबिन्द जी ने जीत का परचम फहराया…पंजाब के आधुनिक नगर हरगोबिन्दपुर में भगवानदास क्षत्रिय ने इस जमीन पर अपना हक जताया और जबरदस्ती इस जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की…इसमें भगवानदास मारा गया…जिसमें मुगलों की बुरी तरह से हार हुई। मुगलों और गुरु हरगोबिन्द साहिब में दूसरी जंग अप्रैल 1634 नें हुई…इस जंग की वजह बड़ी ही मामूली थी…सिखों ने गलती से शाहजहां की मुगल फौज का शाही बाज उठा लिया…सिख अमृतसर के गुम्मटाला गांव में शिकार कर रहे थे और मुगल भी इस इलाके में थे …बाज उठाने के कारण दोनों पक्षों में ये युद्ध हुआ…बेशक इस लड़ाई में गुरु हरगोबिन्द जी शामिल नहीं थे…मगर शाहजहां इस कदर भड़का कि उसने लोहगढ़ के किले पर हमला कर दिया..बेशक सिखों की संख्या कम थी…मगर उन्होंने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए…इस तरह तीसरी और चौथी लड़ाई में गुरु के सिख ही विजेता रहे और मुगलों की जबरदस्त हार हुई…गुरु हरगोबिन्द साहिब जी ने बाणी की रचना नही की …मगर गुरु अर्जुन साहिब तक की बाणी को संकलित किया और इसका प्रचार -प्रसार किया…आखिरकार गुरु जी सतलुज नदी पार करके कीरतपुर पहुंचे…यहां इन्होंने धर्म प्रचार का एक सैंटर खोला…जहां पर उन्होंने तकरीबन 10 साल व्यतीत किए…गुरु हरगोबिन्द जी की याद में 85 गुरुद्वारा साहिब बने हुए हैं …यही नहीं धन धन साहिब श्री हरगोबिन्द जी ने पहले ही पातालपुरी नाम का कोठा बना रखा था उन्होंने सारी संगत को हुक्म किया कि कोई भी इस कोठे में न आए …चार दिन लगातार आप दरवाजा खोल कर पाठ करते और दरवाजा बंद करके प्रभु भक्ति में लीन रहते थे…यहां पर वे प्रभु का सिमरन करते थे…जब पांचवें दिन गुरु हर राय ने दरवाजा खोला तो वो आसन अवस्था में 19 मार्च 1644 को ज्योति जोत में समा गए…ये चैत्र की 5 और 6तारीख को सम्वत 1701 थी।

Due to the untiring efforts of Guru Ji, a new twist was coming in the Sikh tradition and Sikhism was developing rapidly… The aura and power of Guru Hargobind ji had such an effect on the hearts and minds of the people that they were painted in the color of Guru…. His spiritual and devotional power was not being tolerated by the contractors of religion… Mughal emperor Jahangir could not digest it… He arrested Guruji in the fort of Gwalior. … Guru Sahiban is very kind… He used to distribute the money that Guru Maharaj received during the jail to other prisoners… In this fort of Gwalior many Raja Maharajas were also punishing… their life was worse than hell… where There will be a real shahnsah, the atmosphere there is clear to change… It is as if Guru Hargobind ji has gone to jail, as if the air of the prison has changed… Sayin Miyan Mir ji from the Khalifa dynasty of Hazrat Muhammad Sahib He used to have… He had great respect in the Muslim society… He recommended the liberation of Guru Hargobind ji… When Wazirkhan reached the fort of Gwalior to liberate Guru Hargobind ji, Guru Sahib refused to be released … He wanted 52 kings to be released along with him… In this way the emperor freed 52 kings from the fort of Gwalior… Guru ji built a 52-clad chola and he But every single bud he asked to capture these kings, in this way all the kings came out of the fort holding Guru Ji's costume… Due to this benevolence, people started telling Guru Sahib to leave the donor prisoner. Guru Hargobind ji got all these Hindu kings released and reached Amritsar according to Guru Maryada… This day was like Diwali… In the joy of Guru ji, people expressed their happiness by lighting a lamp of ghee and lighting the lamp in the whole city. Gone…

Guru Hargobind ji took many trips to propagate and propagate Sikhism. Once when he was traveling to Kashmir, he was met by Mata Bhagabhuri… who asked the question whether you are Guru Nanak Dev Ji… because Bhagabhri first called Guru Nanak Did not see Dev ji… He made 52 buds for Guru Nanak Dev ji… In view of Mata Bhagbhari’s reverence for Guru Nanak Dev, Guru Hargobind Ji wore this Chola and by wearing this Chola, Guru ji rescued 52 kings from the captivity of the fort of Gwalior… Since then they are called Daata Bandi Chhod…

Panji Piyal Panji Pir Chhatmu Piru Bait Baar heavy.

The feeling from the Panj cup is that the qualities of truth, contentment, kindness, religion and endurance can only be in that famine… Guru Hargobind Sahib Ji has done such works of public good which words can be less in praise of him…. And our tongue is not worth it so that we can praise them… all the gurus have only one hold, so it is said that…

Arjun Kaya Palati Kai Murti Hargobind Rides

Dalibhanjan Guru Surma Vad Jodha Bahu Parupkari.

The feeling from Dalbhanjan Guru Surma is that they are full of virtues… There were four wars between Guru Hargobind ji and the Mughals… In which Guru Hargobind ji won the victory… Bhagwandas Kshatriya in the modern city of Hargobindpur, Punjab, on this land Rightfully and forcefully tried to occupy this land… Bhagwandas was killed in it… in which the Mughals were badly defeated. The second war in Mughals and Guru Hargobind Sahib took place in April 1634… The reason for this war was very minor… Sikhs mistakenly took the royal eagle of Shah Jahan's Mughal army… Sikhs were hunting in Gumtala village of Amritsar and Mughals also Were in the area… Because of the raising of the eagle, this war took place on both sides… Of course Guru Hargobind ji was not involved in this fight… but Shah Jahan was so enraged that he attacked the fort of Lohgarh. Of course, the number of Sikhs was small… but they got rid of the sixes of the Mughals… Thus in the third and fourth battle, the Guru's Sikhs were the winners and the Mughals suffered a tremendous defeat… Guru Hargobind Sahib did not compose the Baani… but Compiled the speech till Guru Arjun Sahib and propagated it… Finally Guru Ji crossed the Sutlej River and reached Kiratpur… Here he opened a center of propagation of Dharma… And he spent almost 10 years… 85 gurudwara sahibs remain in memory of Guru Hargobind ji… Not only this, Dhan Dhan Sahib Shri Hargobind ji had already maintained a room named Patalpuri. He ordered all the sangat that nobody I did not come… For four days continuously you used to open the door and close the door and indulge in devotion to God… Here he used to worship God… When Guru Har R If the end of the door opened, he postures light on March 19, 1644 in the state holding ... These Chaitra was 5 Samvat 1701 on the 6th.

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