Sri Guru Har Rai Ji Prakash Parv History-श्री गुरु हर राय जी प्रकाश पर्व इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Sri Guru Har Rai Ji Prakash Parv History-श्री गुरु हर राय जी प्रकाश पर्व इतिहास

बचपन में चोले से अटक कर फूल झड़ जाने से दुखी हो जाने वाले सिखों के सातवें गुरु श्री हरिराय जी विनम्रता की प्रतिमूर्ति थे। उनके प्रकाश पर्व (31 जनवरी) पर विशेष..

सिखों के सातवें गुरु श्री हरिराय जी का प्रकाश (जन्म) माघ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी, संवत 1686 वि. (31 जनवरी 1630) को कीरतपुर साहिब में हुआ। छठे गुरु हरिगोविंद साहिब के सबसे बड़े पुत्र गुरदित्ता जी उनके पिता थे और माता थीं निहाल कौर जी। उनका बचपन कीरतपुर साहिब के प्राकृतिक वातावरण में बीता, इसलिए उनका व्यक्तित्व अत्यंत कोमल, भावुक और संवेदनशील होता चला गया।

छठे गुरु हरिगोविंद अपने पौत्र हरि राय जी से बहुत स्नेह करते थे। गुरु जी के बचपन की कथा है कि एक बार वे एक बड़ा-सा चोला पहन कर फुलवारी में चले गए। लंबे चोले में अटककर कई फूल भूमि पर बिखर गये। फूलों का झड़ते देखकर उन्हें बहुत दुख हुआ। दादा हरिगोविंद जी ने उन्हें समझाया कि चोला बड़ा हो तो संभाल कर चलना चाहिए। यानी जिम्मेदारी बड़ी मिले तो उसे गंभीरता से निभाना चाहिए। उन्होंने इस सीख को सदा के लिए धारण कर लिया।


चैत्र कृष्ण पक्ष त्रयोदशी संवत 1701 वि. (14 मार्च, 1644) को श्री हरिराय जी सप्तम गुरु के रूप में गुरु गद्दी पर सुशोभित हुए। उन्होंने अपने दादा द्वारा स्थापित की गई सभी नीतियों का उसी प्रकार पालन किया। उनके पास 2200 सिख सैनिकों की एक बड़ी सेना थी। गुरु जी स्वयं भी शस्त्र धारण किया करते थे, परंतु गुरु जी के काल में कोई जंग नहीं हुई।

सातवें गुरु बहुत अच्छे वैद्य भी थे। दयालु प्रवृत्ति होने के कारण उन्होंने आम लोगों के लिए एक दवाखाना खोल रखा था, जहां गरीबों-बीमारों का इलाज किया जाता था। उन्होंने सभी प्रकार से योग्य जानकर अपने छोटे पुत्र मात्र पांच वर्षीय श्री हरि कृशन जी को 1661 ई. में गुरुगद्दी की जिम्मेदारी सौंप दी। इसके कुछ समय बाद ही गुरु हरिराय जी कार्तिक कृष्ण पक्ष नवमी सम्वत 1718 वि. (20 अक्टूबर सन 1661) को कीरतपुर साहिब में लगभग 32 वर्ष की उम्र में ज्योति जोत समा गए।

Shri Hariray ji, the seventh Guru of the Sikhs, who was saddened by the loss of his flower and got stuck with a flower, was an icon of humility. Special on their light festival (31 January) ..

The light (birth) of Shri Hariray ji, the seventh Guru of the Sikhs, took place at Magha Shukla Paksha Trayodashi, Samvat 1686 (31 January 1630) at Kiratpur Sahib. The eldest son of the sixth Guru Harigovind Sahib, Gurditta ji was his father and mother was Nihal Kaur ji. His childhood was spent in the natural environment of Kiratpur Sahib, so his personality became very tender, emotional and sensitive.

The sixth Guru Harigovind loved his grandson Hari Rai Ji very much. There is a legend of Guruji's childhood that once he went to Phulwari wearing a big costume. Many flowers got scattered on the ground after being stuck in long dresses. He was very sad to see the flowering of flowers. Dada Harigovind ji explained to him that if the Chola is big, he should walk with care. That is, if he gets a big responsibility, he should take it seriously. He embraced this learning forever.


On Chaitra Krishna Paksha Trayodashi Samvat 1701 V. (March 14, 1644), Shri Hariray ji as the seventh Guru adorned the Guru's throne. He followed all the policies established by his grandfather in the same way. He had a large army of 2200 Sikh soldiers. Guru ji himself used to wear weapons, but there was no war during Guru ji's time.

The seventh Guru was also a very good Vaidya. Being kind-hearted, he opened a dispensary for the common people, where the poor and the sick were treated. Knowing all the ways, he entrusted the responsibility of Gurugaddi to his younger son, only five-year-old Shri Hari Krishanji in 1661 AD. Shortly after this, Guru Hariray ji, Kartik Krishna Paksha Navami Samvat 1718 AD (October 20, 1661), at Jyoti Jotam, was completed at the age of 32 in Kiratpur Sahib.

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