Sri Guru Tegh Bahadur Ji Prakash Parv श्री गुरु तेग बहादुर जी प्रकाश पर्व इतिहास - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Sri Guru Tegh Bahadur Ji Prakash Parv श्री गुरु तेग बहादुर जी प्रकाश पर्व इतिहास

गुरू तेग बहादुर सिखों के नवें गुरु थे जिन्होने प्रथम गुरु नानक द्वारा बताए गये मार्ग का अनुसरण करते रहे। उनके द्वारा रचित ११५ पद्य गुरु ग्रन्थ साहिब में सम्मिलित हैं। उन्होने काश्मीरी पण्डितों तथा अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाने का विरोध किया। इस्लाम स्वीकार न करने के कारण 1675 में मुगल शासक औरंगजेब ने सबके सामने उनका सिर कटवा दिया।

        गुरुद्वारा शीश गंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब उन स्थानों का स्मरण दिलाते हैं जहाँ गुरुजी की हत्या की गयी तथा जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है।

        इस महावाक्य अनुसार गुरुजी का बलिदान न केवल धर्म पालन के लिए नहीं अपितु समस्त मानवीय सांस्कृतिक विरासत की खातिर बलिदान था। धर्म उनके लिए सांस्कृतिक मूल्यों और जीवन विधान का नाम था। इसलिए धर्म के सत्य शाश्वत मूल्यों के लिए उनका बलि चढ़ जाना वस्तुतः सांस्कृतिक विरासत और इच्छित जीवन विधान के पक्ष में एक परम साहसिक अभियान था।

प्रारंभिक जीवन :

        गुरु तेग़ बहादुर जी का जन्म पंजाब के अमृतसर नगर में हुआ था। ये गुरु हरगोविन्द जी के पाँचवें पुत्र थे। आठवें गुरु इनके पोते 'हरिकृष्ण राय' जी की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण जनमत द्वारा ये नवम गुरु बनाए गए। इन्होंने आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे। उनका बचपन का नाम त्यागमल था। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुग़लों के हमले के ख़िलाफ़ हुए युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया।

        उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेग़ बहादुर (तलवार के धनी) रख दिया। युद्धस्थल में भीषण रक्तपात से गुरु तेग़ बहादुर जी के वैरागी मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनका का मन आध्यात्मिक चिंतन की ओर हुआ। धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति गुरु तेग़ बहादुर जी ने एकांत में लगातार 20 वर्ष तक 'बाबा बकाला' नामक स्थान पर साधना की। आठवें गुरु हरकिशन जी ने अपने उत्तराधिकारी का नाम के लिए 'बाबा बकाले' का निर्देश दिया।

        गुरु जी ने धर्म के प्रसार लिए कई स्थानों का भ्रमण किया। आनंदपुर साहब से कीरतपुर, रोपण, सैफाबाद होते हुए वे खिआला (खदल) पहुँचे। यहाँ उपदेश देते हुए दमदमा साहब से होते हुए कुरुक्षेत्र पहुँचे। कुरुक्षेत्र से यमुना के किनारे होते हुए कड़ामानकपुर पहुँचे और यहीं पर उन्होंने साधु भाई मलूकदास का उद्धार किया।

        गुरु तेगबहादुर जी प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में गए, जहाँ उन्होंने आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, उन्नयन के लिए रचनात्मक कार्य किए। आध्यात्मिकता, धर्म का ज्ञान बाँटा। रूढ़ियों, अंधविश्वासों की आलोचना कर नये आदर्श स्थापित किए। उन्होंने परोपकार के लिए कुएँ खुदवाना, धर्मशालाएँ बनवाना आदि कार्य भी किए। इन्हीं यात्राओं में 1666 में गुरुजी के यहाँ पटना साहब में पुत्र का जन्म हुआ। जो दसवें गुरु- गुरु गोविंद सिंह बने।

        गुरु तेगबहादुर जी सिखों के नौवें गुरु माने जाते हैं। औरंगज़ेब के शासन काल की बात है। औरंगज़ेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर रोज़ गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था। एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगज़ेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया परन्तु उसे बताना भूल गया कि उसे किन किन श्लोकों का अर्थ राजा से सामने नहीं करना था।

Guru Teghd was the ninth Guru of the teachings, who followed the path laid down by the first Guru Nanak. The 115 verses composed by him are included in Guru Granth Sahib. He strongly opposed the conversion of Kashmiri Pandits and other Hindus into Muslim. In 1675, the Mughal ruler Aurangzeb beheaded him for not accepting Islam.



The Gurudwara Sheesh Ganj Sahib and the Gurudwara Rez Ganj Sahib commemorate the places where Guruji was killed and where his last rites were performed. Guru Tegh Bahadur Saheb has a place in world history for those who sacrificed their lives to protect religion and human values, ideals and principles.



According to this Mahavakya, Guruji's sacrifice was not only for the practice of religion, but for all human cultural heritage. Religion was the name of cultural values ​​and law of life for him. Therefore, his sacrifice for the true eternal values ​​of religion is in fact a supreme campaign in favor of cultural heritage and favorite life.



early life:



Guru Teghab ji was born in Amritsar city of Punjab. He was the fifth son of Guru Hargobind ji. The eighth Guru was made the ninth Guru by public opinion due to the premature death of his grandson 'Harikrishna Rai'. I built Anandpur Sahib and they were engaged there. His childhood name was Disgamal. At the age of only 14, he showed valor in the war against his father against the attack of the Mughals.



Impressed by his heroism, his father named him Tega (Rich of the sword) from Likhagamal. The horrific bloodshed in the battlefield had a profound effect on Guru Teghab Ji's reclusive mind and his mind turned to spiritual contemplation. Guru Tegh Bahadur Ji, the idol of patience, quietness and renunciation, practiced in solitude at a place called 'Baba Bakala' for 20 consecutive years. Eighth Guru Harkishen Ji instructed 'Baba Bakale' to name his successor.



Guru ji visited many places for the spread of religion. He reached Khiala (Khadal) from Anandpur Saheb via Kiratpur, Ration, Saifabad. While preaching here, Damid saheb reached Kurukshetra. From Kurukshetra reached Kadarmakpur via the banks of the Yamuna and it was here that he saved the sage brother Malukdas.



Guru Tegh Bahadur went to Prayag, Banaras, Patna, Assam etc. areas where he did creative work for spiritual, social, economic, connectivity. Spirituality, knowledge of religion. New ideals were established by criticizing routers, end trusts. He also worked to get wells dug, dharamshalas built for philanthropy. In these discoveries, a son was born to Guruji in 1666 at Patna Sahib. Who became the tenth Guru- Guru Govind Singh.




Guru Tegh Bahadur is considered the ninth Guru of the Sikhs. It is a matter of the reign of Aurangzeb. In the court of Aurangzeb, a scholar Pandit used to read verses of the Gita daily and recite its meaning, but he left some verses in the Gita. One day Pandit became ill and sent his son to tell Aurangzeb the Gita but he forgot which shlokas he did not mean to the king.

        पंडित के बेटे ने जाकर औरंगज़ेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया। गीता का पूरा अर्थ सुनकर औरंगज़ेब को यह ज्ञान हो गया कि प्रत्येक धर्म अपने आपमें महान है किन्तु औरंगजेब की हठधर्मिता थी कि वह अपने के धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म की प्रशंसा सहन नहीं थी।

        जुल्म से त्रस्त कश्मीरी पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस प्रकार ‍इस्लाम स्वीकार करने के लिए अत्याचार किया जा रहा है, यातनाएं दी जा रही हैं। गुरु चिंतातुर हो समाधान पर विचार कर रहे थे तो उनके नौ वर्षीय पुत्र बाला प्रीतम(गोविन्द सिंह ) ने उनकी चिंता का कारण पूछा ,पिता ने उनको समस्त परिस्थिति से अवगत कराया और कहा इनको बचने का उपाय एक ही है कि मुझको प्राणघातक अत्याचार सहते हुए प्राणों का बलिदान करना होगा।

        वीर पिता की वीर संतान के मुख पर कोई भय नहीं था कि मेरे पिता को अपना जीवन गंवाना होगा। उपस्थित लोगों द्वारा उनको बताने पर कि आपके पिता के बलिदान से आप अनाथ हो जाएंगे और आपकी मां विधवा तो बाल प्रीतम ने उत्तर दियाः “यदि मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों बच्चे यतीम होने से बच सकते हैं या अकेले मेरी माता के विधवा होने जाने से लाखों माताएँ विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है।”

        अबोध बालक का ऐसा उत्तर सुनकर सब आश्चर्य चकित रह गए। तत्पश्चात गुरु तेगबहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगज़ेब से कह ‍दें कि यदि गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे। और यदि आप गुरु तेगबहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे। इससे औरंगजेब क्रुद्ध हो गया और उसने गुरु जी को बन्दी बनाए जाने के लिए आदेश दे दिए।

        गुरुजी ने औरंगजेब से कहा कि यदि तुम जबरदस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए। औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया। उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेगबहादुर का शीश काटने का हुक्म दिया और गुरु तेगबहादुर ने हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।
Pandit's son went and told Aurangzeb the meaning of the entire Gita. Hearing the full meaning of the Gita, Aurangzeb realized that every religion is great in itself, but Aurangzeb's dogma was that he could not bear the praise of any religion other than his own.



        The oppressed Kashmiri Pandit Guru came to Tegh Bahadur and told him how he was being tortured and tortured to accept Islam. When the Guru was anxious, considering the solution, his nine-year-old son Bala Pritam (Govind Singh) asked him the reason for his concern, the father made him aware of the whole situation and said that the only way to avoid them is to bear the mortal torture You will have to sacrifice your life.



        There was no fear on the face of the brave child of the brave father that my father would have to lose his life. When the attendees told them that you would be orphaned by your father's sacrifice and your mother widow, Bal Pritam replied: "If millions of children can be saved from being single or can be widowed by my mother alone If millions of mothers can avoid being widowed, then I accept that. "



        Hearing such an answer of an innocent child, everyone was surprised. After that Guru Tegh Bahadur ji told the pundits that you should go and tell Aurangzeb that if Guru Tegh Bahadur has converted to Islam, after that we will also convert to Islam. And if you could not get Guru Tegh Bahadur to adopt Islam, then we also will not accept Islam. This enraged Aurangzeb and he ordered Guru ji to be arrested.




        Guruji told Aurangzeb that if you force people to convert to Islam, then you are not a true Muslim because the religion of Islam does not teach that anyone should be made a Muslim. Aurangzeb became enraged on hearing this. He ordered to cut the head of Guru Tegh Bahadur at Chandni Chowk in Delhi and Guru Tegh Bahadur sacrificed his life laughing.

        गुरु तेगबहादुर की याद में उनके शहीदी स्थल पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा शीश गंज साहिब है। गुरु तेगबहादुर जी की बहुत सारी रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब के महला 9 में संग्रहित हैं।। गुरुद्वारे के निकट लाल किला, फिरोज शाह कोटला और जामा मस्जिद भी अन्‍य आकर्षण हैं। गुरु तेगबहादुर जी की शहीदी के बाद उनके बेटे गुरु गोबिन्द राय को गुरु गद्दी पर बिठाया गया। जो सिक्खों के दसवें गुरु गुरु गोबिन्द सिंह जी बने।

        श्री कीरतपुर साहिब जी पहुँचकर भाई जैता जी से स्वयँ गोबिन्द राय जी ने अपने पिता श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का शीश प्राप्त किया और भाई जैता जो रँगरेटा कबीले के साथ सम्बन्धित थे। उनको अपने आलिंगन में लिया और वरदान दिया ‘‘रँगरेटा गुरु का बेटा’’। विचार हुआ कि गुरुदेव जी के शीश का अन्तिम सँस्कार कहां किया जाए।

        दादी माँ व माता गुजरी ने परामर्श दिया कि श्री आनंदपुर साहिब जी की नगरी गुरुदेव जी ने स्वयँ बसाई हैं अतः उनके शीश की अँत्येष्टि वही की जाए। इस पर शीश को पालकी में आंनदपुर साहिब लाया गया और वहाँ शीश का भव्य स्वागत किया गया सभी ने गुरुदेव के पार्थिक शीश को श्रद्धा सुमन अर्पित किए तद्पश्चात विधिवत् दाह सँस्कार किया गया।

        कुछ दिनों के पश्चात भाई गुरुदिता जी भी गुरुदेव का अन्तिम हुक्मनामा लेकर आंनदपुर साहिब पहुँच गये। हुक्मनामे में गुरुदेव जी का वही आदेश था जो कि उन्होंने आंनदपुर साहिब से चलते समय घोषणा की थी कि उनके पश्चात गुरु नानक देव जी के दसवें उत्तराधिकारी गोबिन्द राय होंगे। ठीक उसी इच्छा अनुसार गुरु गद्दी की सभी औपचारिकताएं सम्पन कर दी जाएँ। उस हुक्मनामे पर परिवार के सभी सदस्यों और अन्य प्रमुख सिक्खों ने शीश झुकाया और निश्चय किया कि आने वाली बैसाखी को एक विशेष समारोह का अयोजन करके गोबिन्द राय जी को गुरूगद्दी सौंपने की विधिवत् घोषणा करते हुए सभी धर्मिक पारम्परिक रीतियाँ पूर्ण कर दी जाएँगी।

        सहनशीलता , कोमलता और सौम्यता की मिसाल के साथ साथ गुरू तेग बहादुर जी ने हमेशा यही संदेश दिया कि किसी भी इंसान को न तो डराना चाहिए और न ही डरना चाहिए । इसी की मिसाल दी गुरू तेग बहादुर जी ने बलिदान देकर. जिसके कारण उन्हें हिन्द की चादर या भारत की ढाल भी कहा जाता है उन्होंने दूसरों को बचाने के लिए अपनी कुर्बानी दी। गुरू तेग बहादुर जी को अगर अपनी महान शहादत देने वाले एक क्रांतिकारी युग पुरूष कह लिया जाए तो कहना जऱा भी गलत न होगा पूरा गुरू चमत्कार या करमातें नहीं दिखाता.

        वो उस अकालपुरख की रजा में रहता है और अपने सेवकों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करता है. गुरू तेग बहादुर जी ने धर्म की खातिर अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया. ऐसा कोई संत परमेश्वर ही कर सकता है जिसने अपने पर में निज को पा लिया हो. अर्थात्  अपने हृदय में परमात्मा को पा लिया  उसके भेद को तो कोई बिरला ही समझ सकता है आज जरूरत गुरू घर से जुड़ने की इसलिए तो गुरबाणी में कही गई बातों को अमली जामा पहनाने ।

        संसार को ऐसे बलिदानियों से प्रेरणा मिलती है, जिन्होंने जान तो दे दी, परंतु सत्य का त्याग नहीं किया। नवम पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी भी ऐसे ही बलिदानी थे। गुरु जी ने स्वयं के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के अधिकारों एवं विश्वासों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। अपनी आस्था के लिए बलिदान देने वालों के उदाहरणों से तो इतिहास भरा हुआ है, परंतु किसी दूसरे की आस्था की रक्षा के लिए बलिदान देने की एक मात्र मिसाल है-नवम पातशाह की शहादत।


A gurudwara is built in memory of Guru Tegh Bahadur at his martyr site, which is named Gurdwara Sheesh Ganj Sahib. Many of Guru Tegh Bahadur's writings are stored in Mahala 9 of Guru Granth Sahib. The Red Fort, Feroz Shah Kotla and Jama Masjid are also other attractions near the gurudwara. After the martyrdom of Guru Tegh Bahadur, his son Guru Gobind Rai was placed on the throne. Who became Guru Gobind Singh Ji, the tenth Guru of the Sikhs.

        After reaching Shri Kiratpur Sahib, Gobind Rai himself received the title of his father Shri Guru Tegh Bahadur Sahib from Bhai Jaita ji and Bhai Jaita who was associated with the Rangreta clan. Took him in his embrace and gave him the boon "Rangreta Guru's son". The idea was that where to do the last cremation of the head of Gurudev Ji.

        Grandmother and mother Gujri advised that Gurudev Ji, the city of Shri Anandpur Sahib, has settled himself, so that his head should be looked at. On this, the Sheesh was brought to the Anandpur Sahib in the palanquin and there was a grand welcome of the Sheesh, who all paid homage to Gurudev's Parthik Sheesh, after which he was duly honored.

        After a few days, Bhai Gurudita ji also reached Anandpur Sahib with Gurudev's last order. In the order, Gurudev Ji had the same order that he had announced while walking from Anandpur Sahib, that he would be followed by Gobind Rai, the tenth successor of Guru Nanak Dev Ji. According to the same wish, all the formalities of Guru Gaddi should be completed. On that order, all the family members and other prominent Sikhs bowed their head and decided that all religious rituals would be completed by duly declaring the coming Baisakhi by handing over the Gurugaddi to Gobind Rai by organizing a special ceremony.

        With the example of tolerance, tenderness and mildness, Guru Tegh Bahadur Ji always gave the message that no human should be intimidated nor scared. Guru Tegh Bahadur Ji gave an example of this by sacrificing. Due to which he is also called Hind Chadar or the shield of India, he sacrificed his life to save others. If Guru Tegh Bahadur ji is called a revolutionary era man who gave his great martyrdom, then it would not be wrong to say that the whole teacher does not show miracles or miracles.

        He lives in the raja of that Akalpurkh and inspires his servants to do the same. Guru Tegh Bahadur Ji sacrificed everything for the sake of religion. Only such a saint can do God, who has got his own self. That is, no one can understand the mystery of having got the divine in his heart, today the need to join the Guru's house is why to implement the things said in Gurbani.

        The world gets inspiration from such sacrifices, who gave their lives, but did not give up the truth. Navam Patshah Sri Guru Tegh Bahadur Ji was a similar sacrifice. Guru ji gave up his life not to protect himself, but to protect the rights and beliefs of others. History is replete with examples of those who sacrificed for their faith, but the only example of sacrifice to protect another's faith is the martyrdom of the ninth husband.

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