Story of Ghritneshwar Jyotirlinga घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Thursday, 23 April 2020

Story of Ghritneshwar Jyotirlinga घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग की कहानी

इस ज्योतिर्लिंग के विषय में पुराणों में यह कथा वर्णित है- दक्षिण देश में देवगिरिपर्वत के निकट सुधर्मा नामक एक अत्यंत तेजस्वी तपोनिष्ट ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम सुदेहा था दोनों में परस्पर बहुत प्रेम था। किसी प्रकार का कोई कष्ट उन्हें नहीं था। लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी।
ज्योतिष-गणना से पता चला कि सुदेहा के गर्भ से संतानोत्पत्ति हो ही नहीं सकती। सुदेहा संतान की बहुत ही इच्छुक थी। उसने सुधर्मा से अपनी छोटी बहन से दूसरा विवाह करने का आग्रह किया।
पहले तो सुधर्मा को यह बात नहीं जँची। लेकिन अंत में उन्हें पत्नी की जिद के आगे झुकना ही पड़ा। वे उसका आग्रह टाल नहीं पाए। वे अपनी पत्नी की छोटी बहन घुश्मा को ब्याह कर घर ले आए। घुश्मा अत्यंत विनीत और सदाचारिणी स्त्री थी। वह भगवान्‌ शिव की अनन्य भक्ता थी। प्रतिदिन एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर हृदय की सच्ची निष्ठा के साथ उनका पूजन करती थी।
भगवान शिवजी की कृपा से थोड़े ही दिन बाद उसके गर्भ से अत्यंत सुंदर और स्वस्थ बालक ने जन्म लिया। बच्चे के जन्म से सुदेहा और घुश्मा दोनों के ही आनंद का पार न रहा। दोनों के दिन बड़े आराम से बीत रहे थे। लेकिन न जाने कैसे थोड़े ही दिनों बाद सुदेहा के मन में एक कुविचार ने जन्म ले लिया। वह सोचने लगी, मेरा तो इस घर में कुछ है नहीं। सब कुछ घुश्मा का है। अब तक सुधर्मा के मन का कुविचार रूपी अंकुर एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका था। अंततः एक दिन उसने घुश्मा के युवा पुत्र को रात में सोते समय मार डाला। उसके शव को ले जाकर उसने उसी तालाब में फेंक दिया जिसमें घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंगों को फेंका करती थी

मेरे पति पर भी उसने अधिकार जमा लिया। संतान भी उसी की है। यह कुविचार धीरे-धीरे उसके मन में बढ़ने लगा। इधर घुश्मा का वह बालक भी बड़ा हो रहा था। धीरे-धीरे वह जवान हो गया। उसका विवाह भी हो गया। अब तक सुधर्मा के मन का कुविचार रूपी अंकुर एक विशाल वृक्ष का रूप ले चुका था। अंततः एक दिन उसने घुश्मा के युवा पुत्र को रात में सोते समय मार डाला। उसके शव को ले जाकर उसने उसी तालाब में फेंक दिया जिसमें घुश्मा प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंगों को फेंका करती थी।
सुबह होते ही सबको इस बात का पता लगा। पूरे घर में कुहराम मच गया। सुधर्मा और उसकी पुत्रवधू दोनों सिर पीटकर फूट-फूटकर रोने लगे। लेकिन घुश्मा नित्य की भाँति भगवान्‌ शिव की आराधना में तल्लीन रही। जैसे कुछ हुआ ही न हो। पूजा समाप्त करने के बाद वह पार्थिव शिवलिंगों को तालाब में छोड़ने के लिए चल पड़ी। जब वह तालाब से लौटने लगी उसी समय उसका प्यारा लाल तालाब के भीतर से निकलकर आता हुआ दिखलाई पड़ा। वह सदा की भाँति आकर घुश्मा के चरणों पर गिर पड़ा।
जैसे कहीं आस-पास से ही घूमकर आ रहा हो। इसी समय भगवान्‌ शिव भी वहाँ प्रकट होकर घुश्मा से वर माँगने को कहने लगे। वह सुदेहा की घनौनी करतूत से अत्यंत क्रुद्ध हो उठे थे। अपने त्रिशूल द्वारा उसका गला काटने को उद्यत दिखलाई दे रहे थे। घुश्मा ने हाथ जोड़कर भगवान्‌ शिव से कहा- 'प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरी उस अभागिन बहन को क्षमा कर दें। निश्चित ही उसने अत्यंत जघन्य पाप किया है किंतु आपकी दया से मुझे मेरा पुत्र वापस मिल गया। अब आप उसे क्षमा करें और प्रभो!
मेरी एक प्रार्थना और है, लोक-कल्याण के लिए आप इस स्थान पर सर्वदा के लिए निवास करें।' भगवान्‌ शिव ने उसकी ये दोनों बातें स्वीकार कर लीं। ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट होकर वह वहीं निवास करने लगे। सती शिवभक्त घुश्मा के आराध्य होने के कारण वे यहाँ घुश्मेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हुए। घुश्मेश्वर-ज्योतिर्लिंग की महिमा पुराणों में बहुत विस्तार से वर्णित की गई है। इनका दर्शन लोक-परलोक दोनों के लिए अमोघ फलदाई है।



This legend is described in the Puranas about this Jyotirlinga - Near the Devgiriparvat in the south, there lived a very bright Taponishta Brahmin named Sudharma. His wife's name was Sudeha. The two had a lot of mutual love. He had no trouble of any kind. But he had no child.
Astrology-calculation showed that childbirth cannot be born from the womb of Sudeha. Sudeha was very keen on children. He urges Sudharma to remarry to his younger sister.

At first Sudharma did not think about this. But in the end he had to bow to the wife's insistence. They could not defer his request. He married his wife's younger sister Ghushma and brought them home. Ghushma was a very gracious and virtuous woman. She was the exclusive devotee of Lord Shiva. Every day, he made one hundred and one earth shivling and worshiped him with true devotion to the heart.

By the grace of Lord Shiva, a very beautiful and healthy child was born from his womb just a few days later. The birth of the child did not cross the pleasure of both Sudeha and Ghushma. Both days were passing by very comfortably. But do not know how soon after a few days a misconception was born in Sudeha's mind. She started thinking, I have nothing in this house. Everything belongs to Ghushma. By now, the sprout of Sudharma's mind had taken the form of a huge tree. Finally one day he killed Ghushma's young son while sleeping at night. Taking his dead body, he threw it in the same pond in which Ghushma used to throw the earthly Shivling daily.


She also took control of my husband. He also has children. This idea gradually grew in his mind. Here Ghushma's child was also growing up. Gradually he became young. He was also married. By now, the sprout of Sudharma's mind had taken the form of a huge tree. Finally one day he killed Ghushma's young son while sleeping at night. Taking his dead body, he threw it in the same pond in which Ghushma used to throw the mortal Shivling daily.

Everyone came to know about this in the morning. There was a furore in the whole house. Both Sudharma and his daughter-in-law beat their heads and wept bitterly. But Ghushma, as usual, was engrossed in worshiping Lord Shiva. As if nothing has happened. After finishing the puja, she started to leave the earthly Shivalingas in the pond. When she started returning from the pond, her beloved Lal was seen coming out of the pond. He came as usual and fell at the feet of Ghushma.

As if you are walking around from somewhere. At the same time, Lord Shiva also appeared there and started asking Ghushma to ask for the groom. He was extremely enraged by Sudeha's heavy-handed actions. He was looking forward to cutting his throat with his trident. Ghushma folded his hands and said to Lord Shiva - 'Prabhu! If you are happy with me then forgive that unfortunate sister of mine. Surely he has committed a very heinous sin, but by your mercy I got my son back. Now you forgive him and God!

My one more prayer is, for the welfare of the people, you should stay in this place forever. ' Lord Shiva accepted both of these things. Appearing as Jyotirlinga, he started living there. He became famous here by the name of Ghushmeshwar Mahadev because Sati Shiva devotee Ghushma was adorable. The glory of Ghushmeshwar-Jyotirlinga is described in great detail in the Puranas. His philosophy is unfathomable for both people and the world.

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