Story of Jagannath Temple Puri जगन्नाथ मंदिर पुरी की कहानी (one of dham of char dham/चार धाम में से एक) - ॐ जय माता दी ॐ

Latest:

Translate

Search This Blog

“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Thursday, 23 April 2020

Story of Jagannath Temple Puri जगन्नाथ मंदिर पुरी की कहानी (one of dham of char dham/चार धाम में से एक)

जगन्नाथ मंदिर पुरी  

जगन्नाथ मंदिर ( उड़ीसा के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित है। यह मंदिर भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। 'जगन्नाथ' शब्द का अर्थ "जगत का स्वामी" होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है। इस मंदिर को हिन्दुओं के चार धाम में से एक गिना जाता है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का मंदिर है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। मंदिर का वार्षिक रथयात्रा उत्सव प्रसिद्ध है। इसमें मंदिर के तीनों मुख्य देवता- भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र और भगिनी सुभद्रा, तीनों तीन अलग-अलग भव्य और सुसज्जित रथों में विराजमान होकर नगर की यात्रा को निकलते हैं। मध्य काल से ही यह उत्सव अति हर्षोल्लस के साथ मनाया जाता है। इसके साथ ही यह उत्सव भारत के ढेरों वैष्णव कृष्ण मंदिरों में मनाया जाता है एवं यात्रा निकाली जाती है।

इतिहास
इस मंदिर का सबसे पहला प्रमाण महाभारत के वनपर्व में मिलता है। कहा जाता है कि सबसे पहले सबर आदिवासी विश्ववसु ने नीलमाधव के रूप में इनकी पूजा की थी। आज भी पुरी के मंदिरों में कई सेवक हैं, जिन्हें दैतापति के नाम से जाना जाता है।

मंदिर निर्माण
राजा इंद्रद्युम्न मालवा का राजा था, जिनके पिता का नाम भारत और माता सुमति थीं। राजा इंद्रद्युम्न को सपने में जगन्नाथ के दर्शन हुये थे। कई ग्रंथों में राजा इंद्रद्युम्न और उनके यज्ञ के बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने यहां कई विशाल यज्ञ किए और एक सरोवर बनवाया। एक रात भगवान विष्णु ने उनको सपने में दर्शन दिए और कहा नीलांचल पर्वत की एक गुफा में मेरी एक मूर्ति है, उसे नीलमाधव कहते हैं। ‍तुम एक मंदिर बनवाकर उसमें मेरी यह मूर्ति स्थापित कर दो। राजा ने अपने सेवकों को नीलांचल पर्वत की खोज में भेजा। उसमें से एक था ब्राह्मण विद्यापति। विद्यापति ने सुन रखा था कि सबर कबीले के लोग नीलमाधव की पूजा करते हैं और उन्होंने अपने देवता की इस मूर्ति को नीलांचल पर्वत की गुफा में छुपा रखा है। वह यह भी जानता था कि सबर कबीले का मुखिया विश्ववसु नीलमाधव का उपासक है और उसी ने मूर्ति को गुफा में छुपा रखा है। चतुर विद्यापति ने मुखिया की बेटी से विवाह कर लिया। आखिर में वह अपनी पत्नी के जरिए नीलमाधव की गुफा तक पहुंचने में सफल हो गया। उसने मूर्ति चुरा ली और राजा को लाकर दे दी।[1]

विश्ववसु अपने आराध्य देव की मूर्ति चोरी होने से बहुत दु:खी हुआ। अपने भक्त के दु:ख से भगवान भी दु:खी हो गए। भगवान गुफा में लौट गए, लेकिन साथ ही राजा इंद्रद्युम्न से वादा किया कि वह एक दिन उनके पास ज़रूर लौटेंगे बशर्ते कि वह एक दिन उनके लिए विशाल मंदिर बनवा दे। राजा ने मंदिर बनवा दिया और भगवान विष्णु से मंदिर में विराजमान होने के लिए कहा। भगवान ने कहा कि तुम मेरी मूर्ति बनाने के लिए समुद्र में तैर रहा पेड़ का बड़ा टुकड़ा उठाकर लाओ, जो द्वारिका से समुद्र में तैरकर पुरी आ रहा है। राजा के सेवकों ने उस पेड़ के टुकड़े को तो ढूंढ लिया, लेकिन सब लोग मिलकर भी उस पेड़ को नहीं उठा पाए। तब राजा को समझ आ गया कि नीलमाधव के अनन्य भक्त सबर कबीले के मुखिया विश्ववसु की ही सहायता लेना पड़ेगी। सब उस वक्त हैरान रह गए, जब विश्ववसु भारी-भरकम लकड़ी को उठाकर मंदिर तक ले आए।




अब बारी थी, लकड़ी से भगवान की मूर्ति गढ़ने की। राजा के कारीगरों ने लाख कोशिश कर ली, लेकिन कोई भी लकड़ी में एक छैनी तक भी नहीं लगा सका। तब तीनों लोक के कुशल कारीगर भगवान विश्‍वकर्मा एक बूढ़े व्यक्ति का रूप धरकर आए। उन्होंने राजा को कहा कि वे नीलमाधव की मूर्ति बना सकते हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी शर्त भी रखी कि वे 21 दिन में मूर्ति बनाएंगे और अकेले में बनाएंगे। कोई उनको बनाते हुए नहीं देख सकता। उनकी शर्त मान ली गई। लोगों को आरी, छैनी, हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। राजा इंद्रद्युम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा बूढ़ा कारीगर मर गया है। उसने राजा को इसकी सूचना दी। अंदर से कोई आवाज सुनाई नहीं दे रही थी तो राजा को भी ऐसा ही लगा। सभी शर्तों और चेतावनियों को दरकिनार करते हुए राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया। जैसे ही कमरा खोला गया तो बूढ़ा व्यक्ति गायब था और उसमें तीन अधूरी ‍मूर्तियां पड़ी मिलीं। भगवान नीलमाधव और उनके भाई के छोटे-छोटे हाथ बने थे, लेकिन उनकी टांगें नहीं, जबकि सुभद्रा के हाथ-पांव बनाए ही नहीं गए थे। राजा ने इसे भगवान की इच्छा मानकर इन्हीं अधूरी मूर्तियों को स्थापित कर दिया। तब से लेकर आज तक तीनों भाई बहन इसी रूप में विद्यमान हैं।

वर्तमान में जो मंदिर है, वह 7वीं सदी में बनवाया था। हालांकि इस मंदिर का निर्माण ईसा पूर्व दो में भी हुआ था। यहां स्थित मंदिर तीन बार टूट चुका है। 1174 ईस्वी में ओडिशा के शासक अनंग भीमदेव ने इसका जीर्णोद्धार करवाया था। मुख्‍य मंदिर के आसपास लगभग 30 छोटे-बड़े मंदिर स्थापित हैं।


Jagannath Temple Puri

Jagannath Temple (Located in the coastal city of Puri in Odisha. This temple is dedicated to Lord Jagannath (Shri Krishna). The word 'Jagannath' means "Lord of the World". His city is called Jagannathpuri or Puri. This temple is called by Hindus. It is counted as one of the Char Dham. It is a temple of Vaishnava sect, dedicated to Lord Krishna, an incarnation of Lord Vishnu. The annual Rath Yatra festival of the temple is famous. The three main deities of the temple - Lord Jagannath, his elder brother Balabhadra and Bhagini Subhadra, travel in the city in three different grand and decorated chariots. This festival is celebrated with great joy from the middle ages. Along with this, this festival is celebrated in many Vaishnav Krishna temples in India and the yatra is carried out.

History
The earliest evidence of this temple is found in the Vanaparva of Mahabharata. It is said that the first Sabar tribal Vishwavasu worshiped him as Neelmadhav. Even today there are many servants in the temples of Puri, known as Daityapati.

Temple construction
King Indradyumna was the king of Malwa, whose father's name was India and mother Sumati. King Indradyumna had visions of Jagannath in his dream. Many texts have written in detail about King Indradyumna and his yajna. He performed many huge yagyas here and built a lake. One night Lord Vishnu appeared to him in a dream and said that I have an idol in a cave in Nilanchal mountain, it is called Neelmadhav. You should build a temple and install this idol in me. The king sent his servants in search of Mount Nilanchal. One of them was Brahmin Vidyapati. Vidyapati had heard that the people of Sabar clan worship Neelamadhav and he hid this idol of their deity in the cave of Nilanchal mountain. He also knew that Vishvavasu, the head of the Sabar clan, is a worshiper of Neelmadhav and he has hidden the idol in the cave. Chatur Vidyapati married the chief's daughter. Eventually he was able to reach Neelmadhav's cave through his wife. He stole the idol and brought it to the king. [1]

Vishvavasu was deeply saddened by the theft of his idol. God also became sad due to the sorrow of his devotee. The Lord returned to the cave, but at the same time promised King Indradyumna that he would one day return to him provided that he would one day build a huge temple for him. The king built the temple and asked Lord Vishnu to sit in the temple. God said that to make my idol you bring a big piece of tree floating in the sea, which is coming from Dwarika swimming in the sea and Puri. The king's servants found a piece of that tree, but not all of them could raise the tree together. Then the king understood that only Vishwavasu, the head of the Sabar clan, a devotee of Nilmadhav, would have to take help. All were surprised when Vishvavasu brought the heavy wood to the temple.

Now it was time to carve the idol of God with wood. The king's artisans tried a million, but no one could even put a chisel in the wood. Then Lord Vishwakarma, a skilled craftsman of the three worlds came in the form of an old man. He told the king that he could make an idol of Neelmadhav, but at the same time he also kept his condition that he would make the idol in 21 days and make it alone. No one can see them making. His condition was accepted. People kept hearing the sound of saws, chisels, hammers. King Indradyumna's queen Gundicha could not resist. When she went to the door, she could not hear any sound. She panicked. He felt that the old artisan has died. He informed the king. If no sound was heard from inside, the king felt the same. Bypassing all the conditions and warnings, the king ordered the room door open. As soon as the room was opened, the old man was missing and three incomplete idols were found in it. Lord Neelmadhav and his brother had small hands, but not their legs, while Subhadra's hands and feet were not made. The king, considering it as the will of God, installed these incomplete idols. Since then, all three siblings exist in this form.

The present-day temple is built in the 7th century. However, this temple was also built in two BC. The temple located here has been broken three times. It was renovated by Anang Bhimdev, the ruler of Odisha in 1174 AD. Around 30 small and big temples are installed around the main temple.

No comments:

Post a comment