Story of Kedarnath Jyotirlinga केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Thursday, 23 April 2020

Story of Kedarnath Jyotirlinga केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कहानी

  • इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।
  • पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदार कहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।



The history of the establishment of this Jyotirlinga in a nutshell is that on the Kedar Shringa of the Himalayas, the great sage Mahatapasvi Nara and Narayana Rishi used to do penance. Pleased with his worship, Lord Shankar appeared and chose to live forever in the form of Jyotirlinga as his seat. This place is located on the Kedarnath mountain Raja called Kedar in the Himalayas.
The legend of Panchkedar is believed to be such that the Pandavas wanted to get rid of the sin of Bhadratrutya when they were victorious in the war of Mahabharata. For this he wanted to get the blessings of Lord Shankar, but he was angry with the people. The Pandavas went to Kashi to see Lord Shankar, but they did not meet him. They came to the Himalayas looking for them. Lord Shankar did not want to see the Pandas, so they were going from there to Kedar. On the other hand, the Pandavas were also very firm, and they followed them. By then Lord Shankar took the form of a bull and he met other animals. The Pandavas became suspicious. So Bhima took his huge form and spread his legs on two hills. All other cows and bulls got out, but the bulls like Shankar Ji were not ready to go under the feet. Bhima forcefully pounced on this bull, but the bull began to enter the ground. Then Bhima held the part of the triangular back of the bull. Lord Shankar was pleased to see the devotion and determination of the Pandas. He immediately freed the Pandas from sin by giving darshan. Since that time, Lord Shankar is worshiped in Shri Kedarnath in the shape of a bull's back. It is believed that when Lord Shankar disappeared as a bull, Kathmandu appeared above his torso. Now there is a famous temple of Pashupatinath. Shiva's arms appear at Tungnath, at the main Rudranath, at the navel Madamsadeshwar and at the Jata Kalpeshwar. Therefore, along with these four places, Shri Kedarnath is called Panchkedar. There are magnificent temples of Shiva.

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