Story of shivratri-शिवरात्रि की कहानी - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 26 April 2020

Story of shivratri-शिवरात्रि की कहानी

महाशिवरात्रि भगवान शिव का त्यौहार है जिसका हर शिव भक्त बेसब्री से इंतजार करते है और शिव की भक्ति और भांग के रंग में मग्न हो जाते है.. । यह त्यौहार हिन्दू तिथि के हिसाब से फाल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी/चतुर्दशी को मनाया जाता है । हिन्दू पुराणों के अनुसार इसी दिन सृष्टि के आरंभ में मध्यरात्रि मे भगवान शिव ब्रह्मा से रुद्र के रूप में प्रकट हुए थे । इसीलिए इस दिन को महाशिवरात्रि या शिवरात्रि कहा जाता है। यह भी माना जाता है की इस दिन भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह हुआ था. इस दिन लोग व्रत रखते हैं और भगवान शिव की पुजा करते है। शिवरात्रि के व्रत से एक पौराणिक कथा भी जुडी हैं।
महाशिवरात्रि की पौराणिक कथा 



प्राचीन काल की बात है. एक गांव में गुरूद्रूह नाम का एक शिकारी रहता था। जानवरो का शिकार करके वह अपने परिवार का पालन पौषण किया करता था ।

शिवरात्रि के दिन जब वह शिकार के लिए गया, तब पूरे दिन शिकार खोजने के बाद भी उसे कोई जानवर नहीं मिला, परेशान होकर वह एक तालाब के पास गया और तालाब के किनारे एक पेड पर अपने साथ पीने के लिए थोडा सा पानी लेकर चढ गया । वह “बेल-पत्र” का पेड़ था और ठीक इसके नीचे एक प्राकर्तिक शिवलिंग भी था जो सूखे बेलपत्रों से से ढका हुआ था जिसकी वजह से वह शिवलिंग दिखाई नहीं दे रहा था। अनजाने मे उसके हाथ से कुछ बेल-पत्र एवं पानी की कुछ बूंदे पे़ड के नीचे बने शिवलिंग पर गिरीं और जाने अनजाने में दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और पहले प्रहर की पूजा भी हो गई।
रात की पहली पहर बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची।
जैसे ही शिकारी ने उसे मारने के लिए अपने धनुष पर तीर चढ़ाया हिरणी ने घबरा कर ऊपर की ओर देखा ओर शिकारी से कांपते हुए स्वर में बोली- ” हे शिकारी मुझे मत मारो।” शिकारी ने कहा – वह मजबूर है क्योकि उसका परिवार भूखा है इसलिए वह अब उसे नहीं छोड सकता। हिरणी ने कहा कि वह अपने बच्चों को अपने स्वामी को सौंप कर लौट आयेगी। तब वह चाहे तो उसका शिकार कर ले। । शिकारी को हिरणी पर दया आ गयी और उसने उसे जाने दिया।
कुछ ही देर बाद एक और हिरणी अपने बच्चो के साथ उधर से निकली। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे शिकारी!’ इन बच्चो को मुझे इनके पिता के पास सौप आने दो और उसके बाद तुम चाहो तो मेरा शिकार कर सकते हो. मै तुम्हारे पास स्वयं उपस्थित हो जाउंगी.
शिकारी ने कहा – हे मृग मै विवश हूँ. मुझे अपने बच्चो और पत्नी के खातिर तुम्हरा शिकार करना ही होगा. हिरणी ने कहा – जिस प्रकार तुम्हे अपने बच्चो की चिंता है ठीक उसी प्रकार प्रकार मुझे भी अपने बच्चो की चिंता है. इसलिए मुझे अपने बच्चो की खातिर कुछ समय दे दो. उसके पश्चात् में तुम्हारे सामने खुद आत्मसमर्पित हो जाउंगी.
हिरणी की अपने बच्चो के प्रति आपार ममता को देखकर शिकारी को उस पर भी दया आ गई और उसे भी जाने दिया.
समय व्यतीत करने के लिए शिकारी बेल के वृष के पते तोड़ तोड़ कर नीचे फैकता गया तभी शिकारी को एक ओर हिरण दिखाई दिया और शिकारी ने उसे मारने हेतु अपना धनुष झट से उठा लिया. शिकारी को देख हिरण ने कहा – अगर तुमने मेरे बच्चो और मेरी पत्नी का शिकार कर दिया है तो कृपया मेरा भी शीर्घ शिकार कर दो और यदि उन्हें जीवनदान दिया है तो मेरे प्राण भी कुछ समय के लिए दे दो ताकि मै अपने बच्चो से एक बार मिल सकू. इसके बाद मै तुम्हे वचन देता हूँ की मै तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊंगा. शिकारी ने उसे भी जाने दिया और कुछ समय के बाद तीनो हिरण शिकारी के सामने उपस्थित हो गए. शिकारी दिनभर भूखा-प्यासा रहा और अंजाने में ही उससे शिवलिंग की पूजा भी हो गई और इस प्रकार शिवरात्रि का व्रत भी संपन्न हो गया. व्रत के प्रभाव से उसका मन पाप मुक्त और निर्मल हो गया और उसने तीनो हिरणों को छोड़ दिया. शिकारी भूतकाल में हुए अपने द्वारा निर्दोष जीवों की हत्या के पश्चाताप से दुखी था. तभी वहा भगवान शिव प्रकट हुए और बोले – आज के बाद तुम्हे ऐसा काम नहीं करना होगा जो तुम्हे पाप और आत्मग्लानी के बोझ तले दबाता जा रहा है. शिकारी ने रोते हुए कहा की ऐसी कृपा मुझ पापी पर क्यों?.

भगवान शकंर ने शिकारी से कहा – आज शिवरात्रि है और तुमने अनजाने में ही सही लेकिन मेरा व्रत और बेलपत्रो से मेरी पूजा की है. इसलिए तुम्हारा कायाकल्प हुआ है और तुम्हारा मन पवित्र हुआ है. जो भी शिवभक्त महाशिवरात्रि के दिन यह कथा सुनेगा उसे वह सब फल मिलेगा जो तुम्हे मिला है.

Mahashivaratri is the festival of Lord Shiva in which every Shiva devotees wait impatiently and become engrossed in the colors of Bhakti and cannabis of Shiva ... This festival is celebrated on the Trayodashi / Chaturdashi of Falgun Krishna Paksha according to Hindu date. According to Hindu mythology, Lord Shiva appeared in the form of Rudra from Brahma at midnight at the beginning of creation on this day. That is why this day is called Mahashivratri or Shivaratri. It is also believed that Lord Shankar and Mata Parvati were married on this day. On this day people observe fast and worship Lord Shiva. A mythological story is also associated with the fasting of Shivaratri.
Legend of Mahashivaratri



It is a thing of ancient times. A hunter named Gurudruh lived in a village. He used to hunt his animals and nurture his family.

On the day of Shivratri, when he went for hunting, even after searching for the whole day he could not find any animals, disturbed he went to a pond and climbed a tree by the side of the pond with some water to drink with him. . It was a "Bel-Patra" tree and just below it there was also a natural Shivling which was covered with dried Belpatras due to which the Shivling was not visible. Unknowingly, some bell-papers and a few drops of water fell from his hand on the Shivling made under the tree, and inadvertently, the hungry-thirsty hunter was fasted throughout the day and the first Prahar was also worshiped.
At the first hour of the night, a pregnant woman came to drink water at the deer pond.
As the hunter shot an arrow at his bow to kill him, Hirani looked up in awe and said in a trembling tone to the hunter, "Hey hunter don't kill me." The hunter said - he is helpless because his family is hungry so he can no longer leave him. Hirani said that she would return by handing over her children to her master. Then if he wants to hunt him. . The hunter took pity on Hirani and let him go.
Shortly after, another Hirani came out from there with her children. He did not take long to shoot arrows at the bow. He was about to drop the arrow that the deer said, "Hey hunter!" Let these children hand me over to their father and after that you can hunt me if you want. I will be present to you myself.
The hunter said - O deer, I am helpless. I have to hunt you for my children and wife. Hirani said - Just as you are concerned about your children, in the same way I also worry about my children. So give me some time for the sake of my children. After that I will surrender myself in front of you.
Seeing Hirani's love for her children, the hunter felt pity on her and also let her go.
To pass the time, the hunter broke the address of the tree of the vine and threw it down, when the hunter saw a deer on one side and the hunter lifted his bow quickly to kill him. Seeing the hunter, the deer said - If you have hunted my children and my wife, then please hunt me too soon and if you have given them life, then give my life for some time so that I will give my children once Could meet After this I promise you that I will appear before you. The hunter also let him go and after some time the three deer appeared before the hunter. The hunter remained hungry and thirsty throughout the day, and in the unknown itself, Shivalinga was also worshiped and thus the fast of Shivaratri was also concluded. Due to the effect of the fast, his mind became sin-free and clean and he released all the three deer. The hunter was saddened by the remorse of killing innocent creatures in the past. That's when Lord Shiva appeared and said - After today you will not have to do such a thing which keeps on pressing you under the burden of sin and self-aggrandizement. The hunter cried and said, "Why is this kind of a sinner on me?"

Lord Shakkar said to the hunter - Today is Shivaratri and you have unconsciously corrected me but have worshiped me with my fast and bell letters. That is why you have been rejuvenated and your mind has been sanctified. Whoever will listen to this story on the day of Shiva devotee Mahashivratri will get all the fruits that you have got.

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