When mother Sita became silver-जब माता सीता बन गई चण्डी - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Tuesday, 28 April 2020

When mother Sita became silver-जब माता सीता बन गई चण्डी



जब माता सीता बन गई चण्डी 
एक समय की बात है कि भगवान् श्री राम राज सभा में विराज रहे थे उसी समय विभीषण वहाँ पहुंचे। वे बहुत भयभीत और हडबड़ी में लग रहे थे। सभा में प्रवेश करते ही वे कहने लगे – हे राम ! मुझे बचाइये, कुम्भकर्ण का बेटा मूलकासुर आफत ढा रहा है। अब लगता है न लंका बचेगी और न मेरा राज पाठ।
भगवान श्री राम द्वारा ढांढस बंधाये जाने और पूरी बात बताये जाने पर विभीषण ने बताया कि कुम्भकर्ण का एक बेटा मूल नक्षत्र में पैदा हुआ था। इसलिये उस का नाम मूलकासुर रखा गया है। इसे अशुभ जानकर कुंभकर्ण ने जंगल में फिंकवा दिया था।
जंगल में मधुमक्खियों ने मूलकासुर को पाल लिया। मूलकासुर बड़ा हुआ तो उसने कठोर तपस्या कर के ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया, अब उनके दिये वर और बल के घमंड में भयानक उत्पात मचा रखा है। जब जंगल में उसे पता चला कि आपने उसके खानदान का सफाया कर लंका जीत ली और राज पाट मुझे सौंप दिया है वह तब से अत्यन्त क्रोध में है।
भगवन आपने जिस दिन मुझे राज पाट सौंपा उसके कुछ दिन बाद ही वह पाताल वासियों के साथ लंका पहुँच कर मुझ पर धावा बोल दिया। मैंने छः महिने तक मुकाबला किया पर ब्र्ह्मा जी के वरदान ने उसे इतना ताकतवर बना दिया है कि मुझे भागना पड़ा।
अपने बेटे, मन्त्रियों तथा स्त्री के साथ किसी प्रकार सुरंग के जरिये भाग कर यहाँ पहुँचा हूँ। उसने कहा कि ‘पहले धोखेबाज भेदिया विभीषण को मारुंगा फिर पिता की हत्या करने वाले राम को भी मार डालूँगा। वह आपके पास भी आता ही होगा। समय कम है, लंका और अयोध्या दोनों खतरे में हैं। जो उचित समझते हों तुरन्त कीजिये। भक्त की पुकार सुन श्रीराम जी हनुमान तथा लक्ष्मण सहित सेना को तैयार कर पुष्पक विमान पर चढ़ झट लंका की ओर चल पड़े।
मूलकासुर को श्री राम चंद्र के आने की बात मालूम हुई, वह भी सेना लेकर लड़ने के लिये लंका के बाहर आ डटा।भयानक युद्ध छिड़ गया और सात दिनों तक घोर युद्ध होता रहा। मूलकासुर भगवान श्री राम की सेना पर अकेले ही भारी पड़ रहा था। अयोध्या से सुमन्त्र आदि सभी मन्त्री भी आ पहुँचे। हनुमान् जी भी संजीवनी लाकर वानरों, भालुओं तथा मानुषी सेना को जिलाते जा रहे थे। सब कुछ होते हुये भी पर युद्ध का नतीजा उनके पक्ष में जाता नहीं दीख रहा था अतः भगवान् चिन्ता में थे।
विभीषण ने बताया कि रोजाना मूलकासुर तंत्र साधना करने गुप्त गुफा में जाता है। उसी समय ब्रह्मा जी वहाँ आये और भगवान से कहने लगे – ‘रघुनन्दन ! इसे तो मैंने स्त्री के हाथों मरने का वरदान दिया है। आपका प्रयास बेकार ही जायेगा। श्री राम, इससे संबंधित एक बात और है, उसे भी जान लेना लाभान्वित हो सकता है। जब इसके भाई-बंधु लंका युद्ध में मारे जा चुके तो एक दिन इसने मुनियों के बीच दुखी हो कर कहा, ‘चण्डी सीता के कारण मेरा समूचा कुल नष्ट हुआ’। इस पर एक मुनि ने नाराज होकर उसे शाप दे दिया – ‘दुष्ट ! तुने जिसे चण्डी कहा है, वही सीता तेरे प्राण लेगी।' मुनि का इतना कहना था कि वह उन्हें खा गया। यह देखकर बाकी मुनि उस के डर से चुप चाप खिसक गये। तो हे राम, अब कोई दूसरा उपाय नहीं है।अब तो केवल सीता ही इसका वध कर सकती हैं। आप उन्हें यहाँ बुला कर इसका वध करवाइये, इतना कह कर ब्रह्मा जी चले गये।भगवान् श्री राम ने हनुमान जी और गरुड़ को तुरन्त पुष्पक विमान से सीता जी को लाने भेजा।
सीता देवी-देवताओं की मन्नत मनातीं, तुलसी, शिव-प्रतिमा, पीपल आदि के फेरे लगातीं, ब्राह्मणों से ‘पाठ, रुद्रीय’ का जप करातीं, दुर्गा जी की पूजा करती कि विजयी श्री राम शीघ्र लौटें। तभी गरुड़ और हनुमान् जी उनके पास पहुँचे और राम जी का संदेश सुनाया। पति के संदेश को सुन कर सीता तुरन्त चल दीं। भगवान श्री राम ने उन्हें मूलकासुर के बारे में सारा कुछ बताया। फिर तो भगवती सीता अत्यन्त क्रोधित हुईं । उनके शरीर से एक दूसरी तामसी शक्ति निकल पड़ी, उसका स्वर बड़ा भयानक था। यह छाया सीता चण्डी के वेश में लंका की ओर बढ चलीं।
इधर श्री राम ने वानर सेना को इशारा किया कि मूलकासुर जो तांत्रिक क्रियाएं कर रहा है उसको उसकी गुप्त गुफा में जा कर तहस नहस करें। वानर गुफा के भीतर पहुंच कर उत्पात मचाने लगे तो मूलकासुर दांत किटकिटाता हुआ सब छोड़ छाड़ कर वानर सेना के पीछे दौड़ा। हड़बड़ी में उसका मुकुट गिर पड़ा। फिर भी भागता हुआ वह युद्ध के मैदान में आ गया।
युद्ध के मैदान में छाया सीता को देखकर मूलकासुर गरजा, तू कौन ? अभी भाग जा, मैं औरतों पर मर्दानगी नही दिखाता। छाया सीता ने भी भीषण आवाज करते हुये कहा, ‘मैं तुम्हारी मौत-चण्डी हूँ, तूने मेरा पक्ष लेने वाले मुनियों और ब्राह्मणों को खा डाला था, अब मैं तुम्हें मार कर उसका बदला चुकाउंगी। इतना कह कर छाया सीता ने मूलकासुर पर पाँच बाण चलाये। मूलकासुर ने भी जवाब में बाण चलाये। कुछ देर तक घोर युद्द हुआ पर अन्त में ‘चण्डिकास्त्र’ चला कर छाया सीता ने मूलकासुर का सिर उड़ा दिया। वह लंका के दरवाजे पर जा गिरा।
राक्षस हाहाकार करते हुए इधर उधर भाग खड़े हुए। छाया सीता लौट कर सीता के शरीर में प्रवेश कर गयी। मूलका सुर से दुखी लंका की जनता ने मां सीता की जय जयकार की और विभीषन ने उन्हें धन्यवाद दिया। कुछ दिनों तक लंका में रहकर श्री राम सीता सहित पुष्पक विमान से अयोध्या लौट आये।
जय श्री सीता माँ
जय श्री राम जी



Once upon a time, Lord Rama was staying in the Raj Sabha, at the same time Vibhishan arrived there. He looked very scared and nervous. As soon as he entered the assembly, he said - O Ram! Save me, Kumbhakarna's son Moolakasura Aftat is raining. Now it seems neither Lanka will survive nor my secret lesson.
When Lord Sri Rama tied up the dhandhas and told the whole thing, Vibhishan told that a son of Kumbhakarna was born in the original constellation. That is why he is named Moolakasura. Seeing it inauspicious, Kumbhakarna threw it in the forest.
In the forest, bees nurtured moolakasura. When Malkasura grew up, he pleased Brahmaji by doing harsh penance, now there is a terrible disturbance in the arrogance of his groom and force. When he finds out in the forest that you have vanquished his family and conquered Lanka and handed over the Raj Pat to me, he has been in a great rage ever since.
Bhagwan, the day you handed me the Raj Pat, a few days after that he reached Lanka with the residents of Patal and attacked me. I fought for six months but Brahma Ji's boon made him so powerful that I had to run away.
Somewhere along with my son, ministers and women have reached here through the tunnel. He said that 'I will first kill the fraudulent scaperer Vibhishana and then I will kill Ram who killed his father. He will also come to you. Time is short, both Lanka and Ayodhya are in danger. Do what you think is appropriate immediately. Hearing the call of the devotee, Shri Ram Ji prepared Hanuman and Laxman along with the army and hurried to the Pushpak plane and headed towards Lanka.
Moolakasura came to know about the arrival of Shri Ram Chandra, he also came out of Lanka to fight with the army. A fierce war broke out and a fierce battle continued for seven days. Moolakasura alone was overshadowing Lord Rama's army. All ministers etc. also came from Ayodhya. Hanuman was also bringing Sanjeevani and raising monkeys, bears and the Manushi army. Despite everything, the result of the war was not going to go in their favor, so God was worried.
Vibhishan told that daily Moolakasura goes to the secret cave to do Tantra Sadhana. At the same time Brahma ji came there and started saying to God - 'Raghunandan! I have given this boon to die at the hands of a woman. Your effort will go in vain. Shri Ram, there is one more thing related to this, it can be beneficial to know that too. When its siblings were killed in the Lanka war, one day it grieved among the sages and said, 'My entire family was destroyed by the silver Sita'. At this a sage resented and cursed him - 'Wicked! Sita will take your life as what you have called silver. ' The sage said that he ate them. Seeing this, the rest of the monks slipped away in fear of him. So O Ram, there is no other solution now. Now only Sita can kill it. You call them here and get them killed, saying so much Brahma went away.
Sita used to celebrate the vow of the Gods and Goddess, make Tulsi, Shiva-idol, Peepal etc., chant 'recitation, rudriya' to the Brahmins, and worship Durga ji that the victorious Shri Rama should return soon. Just then Garuda and Hanuman ji reached him and told Ram ji's message. Sita left immediately after listening to her husband's message. Lord Shri Ram told him everything about Moolakasura. Then Bhagwati Sita became very angry. A second tamasic force came out of his body, his voice was terrible. This shadow went towards Lanka in disguise of Sita Chandi.
Here Shri Rama indicated to the monkey army that Moolakasura, who is doing tantric actions, should destroy him by going to his secret cave. When the monkeys reached the cave and started creating a ruckus, the Moolakasura left all the teeth, gritting the teeth and ran after the vanar army. His crown fell in haste. Still running away he came to the battlefield.
Moolakasura thunders upon seeing Shadow Sita in the battlefield, who are you? Run away now, I do not show masculinity on women. Chhaya Sita also said in a fierce voice, 'I am your death-silver, you had eaten the sages and Brahmins who took my side, now I will repay you by killing you. Saying this, Chhaya Sita fired five arrows at Moolakasura. Moolakasura also fired arrows in response. There was a fierce battle for some time but in the end Chhaya Sita blew the head of Moolakasura by running 'Chandikastra'. He fell to the door of Lanka.
The demons ran around, crying out. Chhaya returned to Sita and entered Sita's body. Unhappy with Moolaka Sur, the people of Lanka cheered on Mother Sita and Vibhishan thanked her. After staying in Lanka for a few days, Shri Ram along with Sita returned to Ayodhya by Pushpak aircraft.
Jai Shree Sita Maa

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