असीरगढ़ का किला-एक ऐसा शिव मंदिर जहां अश्वत्थामा आज भी सुबह फुल अर्पित करने आते है-Fort of Asirgarh-One such Shiva temple where Ashwatthama still comes to offer flowers in the morning - - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Tuesday, 12 May 2020

असीरगढ़ का किला-एक ऐसा शिव मंदिर जहां अश्वत्थामा आज भी सुबह फुल अर्पित करने आते है-Fort of Asirgarh-One such Shiva temple where Ashwatthama still comes to offer flowers in the morning -




महाभारत के बारे में जानने वाले लोग अश्वत्थामा के बारे में निश्चित तौर पर जानते होंगे। महाभारत के कई प्रमुख चरित्रों में से एक अश्वत्थामा का वजूद आज भी है। अगर यह पढ़कर आप हैरान हो रहे हैं, तो हम आपको बता दें कि अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने निकले अश्वत्थामा को उनकी एक चूक भारी पड़ी और भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें युगों-युगों तक भटकने का श्राप दे दिया।पिछले लगभग पांच हजार वर्षों से अश्वत्थामा भटक रहे हैं। ऐसा माना जाता है की बुरहानपुर, मध्य प्रदेश स्तिथ असीरगढ़ किले की शिवमंदिर में प्रतिदिन सबसे पहले पूजा करने आते है। शिवलिंग पर प्रतिदिन सुबह ताजा फूल एवं गुलाल चढ़ा मिलना अपने आप में एक रहस्य है। हम यहां आपको महाभारत काल के अश्वत्थामा से जुड़ी वो खास बातें बताने जा रहे हैं, जिनके बारे में आपको शायद ही मालूम होगा।

गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे अश्वत्थामा 

अश्वत्थामा महाभारतकाल अर्थात द्वापरयुग में जन्मे थे। उनकी गिनती उस युग के श्रेष्ठ योद्धाओं में होती थी। वे गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र व कुरु वंश के राजगुरु कृपाचार्य के भानजे थे। द्रोणाचार्य ने ही कौरवों और पांडवों को शस्त्र विद्या में पारंगत बनाया था। 

महाभारत के युद्ध के समय गुरु द्रोण ने हस्तिनापुर राज्य के प्रति निष्ठा होने के कारण कौरवों का साथ देना उचित समझा।अश्वत्थामा भी अपने पिता की भांति शास्त्र व शस्त्र विद्या में निपुण थे। पिता-पुत्र की जोड़ी ने महाभारत के युद्ध के दौरान पांडवों की सेना को छिन्न-भिन्न कर दिया था। 

पांडव सेना को हतोत्साहित देख श्रीकृष्ण ने द्रोणाचार्य का वध करने के लिए युधिष्ठिर से कूटनीति का सहारा लेने को कहा। इस योजना के तहत युद्धभूमि में यह बात फैला दी गई कि अश्वत्थामा मारा गया है। 

श्री कृष्ण ने दिया था श्राप 

जब द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से अश्वत्थामा की मृत्यु की सत्यता जाननी चाही तो युधिष्ठिर ने जवाब दिया कि अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा (अश्वत्थामा मारा गया है, लेकिन मुझे पता नहीं कि वह नर था या हाथी)। यह सुन गुरु द्रोण पुत्र मोह में शस्त्र त्याग कर किंकर्तव्यविमूढ़ युद्धभूमि में बैठ गए और उसी अवसर का लाभ उठाकर पांचाल नरेश द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया। 

पिता की मृत्यु ने अश्वत्थामा को विचलित कर दिया। महाभारत युद्ध के पश्चात जब अश्वत्थामा ने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए पांडव पुत्रों का वध कर दिया तथा पांडव वंश के समूल नाश के लिए उत्तरा के गर्भ में पल रहे अभिमन्यु पुत्र परीक्षित को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया, तब भगवान श्री कृष्ण ने परीक्षित की रक्षा कर दंड स्वरुप अश्वत्थामा के माथे पर लगी मणि निकालकर उन्हें तेजहीन कर दिया और युगों-युगों तक भटकते रहने का शाप दिया था। 

पागल हो जाता है देखने वाला 

कहा जाता है कि असीरगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश के ही जबलपुर शहर के गौरीघाट (नर्मदा नदी) के किनारे भी अश्वत्थामा भटकते रहते हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार कभी-कभी वे अपने मस्तक के घाव से बहते खून को रोकने के लिए हल्दी और तेल की मांग भी करते हैं। कई लोगों ने इस बारे में अपनी आपबीती भी सुनाई।किसी ने बताया कि उनके दादा ने उन्हें कई बार वहां अश्वत्थामा को देखने का किस्सा सुनाया है। तो किसी ने कहा- जब वे मछली पकडऩे वहां के तालाब में गए थे, तो अंधेरे में उन्हें किसी ने तेजी से धक्का दिया था। शायद धक्का देने वाले को उनका वहां आना पसंद नहीं आया। गांव के कई बुजुर्गों की मानें तो जो एक बार अश्वत्थामा को देख लेता है, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। 

शिव मंदिर में करते है पूजा-अर्चना 

किले में स्थित तालाब में स्नान करके अश्वत्थामा शिव मंदिर में पूजा-अर्चना करने जाते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि वे उतावली नदी में स्नान करके पूजा के लिए यहां आते हैं। आश्चर्य कि बात यह है कि पहाड़ की चोटी पर बने किले में स्थित यह तालाब बुरहानपुर की तपती गरमी में भी कभी सूखता नहीं। तालाब के थोड़ा आगे गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर है। मंदिर चारो तरफ से खाइयों से घिरा है। किंवदंती के अनुसार इन्हीं खाइयों में से किसी एक में गुप्त रास्ता बना हुआ है, जो खांडव वन (खंडवा जिला) से होता हुआ सीधे इस मंदिर में निकलता है।

इसी रास्ते से होते हुए अश्वत्थामा मंदिर के अंदर आते हैं। भले ही इस मंदिर में कोई रोशनी और आधुनिक व्यवस्था न हो, यहां परिंदा भी पर न मारता हो, लेकिन पूजा लगातार जारी है। शिवलिंग पर प्रतिदिन ताजा फूल एवं गुलाल चढ़ा रहता है। 

कैसे पहुंचें- 

असीरगढ़ किला बुरहानपुर से लगभग 20 किमी की दूरी पर उत्तर दिशा में सतपुड़ा पहाडिय़ों के शिखर पर समुद्र सतह से 750 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। बुरहानपुर खंडवा से लगभग 80 किमी दूर है। यहां से बुरहारनपुर तक जाने के लिए ट्रेन, बसें व टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं। 

यहां से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट इंदौर है, जो करीब 180 किमी दूर है। बुरहानपुर मध्य प्रदेश के सभी बड़े शहरों से रेल मार्ग द्वारा जुड़ा है।
Those who know about Mahabharata must surely know about Ashwatthama. Ashwatthama, one of the many prominent characters of the Mahabharata, still exists. If you are surprised to read this, then let us tell you that Ashwatthama, who avenged his father's death, suffered one of his lapses and Lord Krishna cursed him to wander for ages and ages. Ashwatthama is wandering from It is believed that Burhanpur, Madhya Pradesh is the first to come to worship the Asirgarh Fort in the Shiv temple daily. Getting fresh flowers and gulal offered daily on Shivling is a mystery in itself. Here we are going to tell you the special things related to Ashwatthama of Mahabharata period, about which you will hardly know.

Ashwatthama was the son of Guru Dronacharya

Ashwatthama was born in the Mahabharata period i.e. Dwaparyuga. He was counted among the best warriors of that era. He was the son of Guru Dronacharya and the nephew of Rajaguru Kripacharya of the Kuru dynasty. It was Dronacharya who made the Kauravas and Pandavas master of weapons.

At the time of the Mahabharata war, Guru Drona considered it appropriate to join the Kauravas due to their loyalty to the Hastinapur state. Ashwatthama was also proficient in scripture and armaments like his father. The father-son duo severed the Pandava army during the war of Mahabharata.

Seeing the Pandava army discouraged, Shri Krishna asked Yudhishthira to resort to diplomacy to kill Dronacharya. Under this plan, it was spread in the battlefield that Ashwatthama was killed.

Shri Krishna gave curse

When Dronacharya asked Dharmaraja Yudhishthira to know the truth of Ashwatthama's death, Yudhishthira replied that Ashwatthama hato naro wa kunjaro wa (Ashwatthama is killed, but I do not know whether he was a male or an elephant). Hearing this, Guru Dron, renouncing his weapon in the son Moh, sat in the battlefield Kinkartavvimuddha and taking advantage of the same opportunity, Dhritadhyumna, son of Drupada, the Panchal king, killed him.

Those who know about Mahabharata must surely know about Ashwatthama. Ashwatthama, one of the many prominent characters of the Mahabharata, still exists. If you are surprised to read this, then let us tell you that Ashwatthama, who avenged his father's death, suffered one of his lapses and Lord Krishna cursed him to wander for ages and ages. Ashwatthama is wandering from It is believed that Burhanpur, Madhya Pradesh is the first to come to worship the Asirgarh Fort in the Shiv temple daily. Getting fresh flowers and gulal offered daily on Shivling is a mystery in itself. Here we are going to tell you the special things related to Ashwatthama of Mahabharata period, about which you will hardly know.

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At the time of the Mahabharata war, Guru Drona considered it appropriate to join the Kauravas due to their loyalty to the Hastinapur state. Ashwatthama was also proficient in scripture and armaments like his father. The father-son duo severed the Pandava army during the war of Mahabharata.

Seeing the Pandava army discouraged, Shri Krishna asked Yudhishthira to resort to diplomacy to kill Dronacharya. Under this plan, it was spread in the battlefield that Ashwatthama was killed.

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When Dronacharya asked Dharmaraja Yudhishthira to know the truth of Ashwatthama's death, Yudhishthira replied that Ashwatthama hato naro wa kunjaro wa (Ashwatthama is killed, but I do not know whether he was a male or an elephant). Hearing this, Guru Dron, renouncing his weapon in the son Moh, sat in the battlefield Kinkartavvimuddha and taking advantage of the same opportunity, Dhritadhyumna, son of Drupada, the Panchal king, killed him....

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