कालका मंदिर, दिल्ली (Kalka Mandir, Delhi) - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Sunday, 17 May 2020

कालका मंदिर, दिल्ली (Kalka Mandir, Delhi)




अरावली पर्वत श्रृंखला के सूर्यकूट पर्वत पर विराजमान कालकाजी मंदिर के नाम से विख्यात 'कालिका मंदिर' देश के प्राचीनतम सिद्धपीठों में से एक है। जहां नवरात्र में हजारों लोग माता का दर्शन करने पहुंचते हैं।
इस पीठ का अस्तित्व अनादि काल से है। माना जाता है कि हर काल में इसका स्वरूप बदला। मान्यता है कि इसी जगह आद्यशक्ति माता भगवती 'महाकाली' के रूप में प्रकट हुई और असुरों का संहार किया। तब से यह मनोकामना सिद्धपीठ के रूप में विख्यात है। मौजूदा मंदिर बाबा बालक नाथ ने स्थापित किया। उनके कहने पर मुगल सम्राज्य के कल्पित सरदार अकबर शाह ने इसका जीर्णोद्धार कराया।
मंदिर के महंत सुरेंद्रनाथ अवधूत ने बताया कि असुरों द्वारा सताए जाने पर देवताओं ने इसी जगह शिवा (शक्ति) की अराधना की। देवताओं के वरदान मांगने पर मां पार्वती ने कौशिकी देवी को प्रकट किया। जिन्होंने अनेक असुरों का संहार किया लेकिन रक्तबीज को नहीं मार सकीं। तब पार्वती ने अपनी भृकुटी से महाकाली को प्रकट किया। जिन्होंने रक्तबीज का संहार किया। महाकाली का रूप देखकर सभी भयभीत हो गए। देवताओं ने काली की स्तुति की तो मां भगवती ने कहा कि जो भी इस स्थान पर श्रृद्धाभाव से पूजा करेगा, उसकी मनोकामना पूर्ण होगी।
माना जाता है कि महाभारत काल में युद्ध से पहले भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों के साथ यहां भगवती की अराधना की। बाद में बाबा बालकनाथ ने इस पर्वत पर तपस्या की। तब माता भगवती से उनका साक्षात्कार हुआ।
मंदिर की विशेषता
मुख्य मंदिर में 12 द्वार हैं, जो 12 महीनों का संकेत देते हैं। हर द्वार के पास माता के अलग-अलग रूपों का चित्रण किया गया है। मंदिर के परिक्रमा में 36 मातृकाओं (हिन्दी वर्णमाला के अक्षर) के द्योतक हैं। माना जाता है कि ग्रहण में सभी ग्रह इनके अधीन होते हैं। इसलिए दुनिया भर के मंदिर ग्रहण के वक्त बंद होते हैं, जबकि कालका मंदिर खुला होता है।
नवरात्र मेले में घूमती है माता
आम दिनों में इस मंदिर में वेदोक्त, पुराणोक्त व तंत्रोक्त तीनों विधियों से पूजा होती है। नवरात्र में यहां मेला लगता है। रोजाना हजारों लोग माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस मंदिर में अखंड दीप प्रज्जवलित है। पहली नवरात्र के दिन लोग मंदिर से माता की जोत अपने घर ले जाते हैं। नवरात्र में रात 2:30 बजे सुबह की व शाम की आरती सात बजे होती है। मान्यता है कि अष्टमी व नवमी को माता मेला में घूमती हैं। इसलिए अष्टमी के दिन सुबह की आरती के बाद कपाट खोल दिया जाता है। दो दिन आरती नहीं होती। दसवीं को आरती होती है।
कैसे जाएं मंदिर तक
माता के दर्शन करने के लिए मेट्रो से कालकाजी मंदिर मेट्रो स्टेशन उतरकर लोग आसानी से पहुंच सकते हैं। जो बदरपुर मेट्रो लाइन पर स्थित है।

काल्काजी मंदिर का इतिहास – Kalkaji Temple History

3000 साल पहले बने इस मंदिर का कुछ भी भाग अभी बचा हुआ है, क्योकि मुघलो ने इस मंदिर पर आक्रमण कर इसे ध्वस्त कर दिया था।
कहा जाता है की पांडव और कौरवो ने यहाँ सर्वशक्तिमान बनने की प्रार्थना की थी। जबकि मंदिर की वास्तविक संरचना के छोटे से भाग का निर्माण 1734 में किया गया, जिसे पहाड़ी के उपर देखा जा सकता है।
बाद में 19 वी शताब्दी के बीच में अकबर द्वितीय के कोषाध्यक्ष रजा केदारनाथ ने मंदिर में कुछ बदलाव और सुधार किये।
पिछले 5 से 6 दशको में, मंदिर के आस-पास बहुत सी धर्मशालाओ का निर्माण किया गया। वर्तमान मंदिर का निर्माण शामलट थोक ब्राह्मण और थोक जोगियन की जमीन पर किया गया, जो काल्काजी मंदिर के पुजारी है।

काल्काजी मंदिर की कहानी – Kalkaji Temple Story

लाखो साल पहले, मंदिर के पड़ोस में रहने वाले भगवान को दो विशाल दानव कष्ट देने लगे और परिणामस्वरूप उन्होंने सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी से शिकायत की। लेकिन ब्रह्मा जी ने बीच में आने से मना कर दिया और उन्हें माँ पार्वती के पास जाने के लिए कहा।
तभी माँ पार्वती के मुख से कौशकी देवी निकली, जिन्होंने उन दो दानवो पर आक्रमण कर उन्हें मार डाला, लेकिन जैसे ही उन दो दानवो का रक्त सुखी धरती पर गिरा वैसे ही जीवन में हजारो दानव जीवित हो गये और विविध बाधाओ के बावजूद कौशकी देवी लडती रही।
यह सब देखकर माँ पार्वती को उनपर दया आ गयी और परिणामस्वरूप कौशकी देवी की भौहो से माँ काली देवी निकली, जिनके निचले ओंठ निचे पहाडियों पर और उपरी ओंठ आकाश को छु रहे थे। आते ही उन्होंने मरे हुए दानवो का रक्त ग्रहण किया और शत्रुओ पर विजय प्राप्त की।
इसके बाद माँ काली देवी ने उसी जगह को अपना निवासस्थान बना लिया और तभी से उनकी पूजा उस स्थल की मुख्य देवी के रूप में की जाने लगी।
माना जाता है की देवी काल्काजी प्रार्थना करने से खुश होती है और वरदान देती है। वर्षो से देवी काल्काजी वहां रहते हुए अपने भक्तो की मनोकामना पूरी करती है। महाभारत के समय भगवान कृष्णा और पांडव ने यही देवी की पूजा की थी।
आज भी उत्सवो के आयोजन के साथ-साथ काल्काजी मंदिर में रोज देवी काली की पूजा की जाती है। रोज देवी काली की मूर्ति का अभिषक दूध से किया जाता है। अभिषेक के बाद सुबह 6 बजे और शाम 7:30 बजे आरती की जाती है। यह पूजा मंदिर के पुजारियों द्वारा ही की जाती है।
हर रोज हजारो श्रद्धालु यहाँ देवी के दर्शन के लिए आते है और माँ कलिका देवी का आशीर्वाद लेते है। नवरात्र के समय श्रद्धालुओ की समस्या हजारो से बढ़कर लाख तक पहुच जाती है।
पर्यटकों के लिए मंदिर सुबह से देर रात तक खुला रखा जाता है। पर्यटक मंदिर के आस-पास के मनोरम वायुमंडल का भी आनंद ले सकते है।

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