सिद्धावत वृक्ष: यह पेड़ माता पार्वती द्वारा लगाया गया था-Siddhwat tree: This tree was planted by Mata Parvati - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Saturday, 16 May 2020

सिद्धावत वृक्ष: यह पेड़ माता पार्वती द्वारा लगाया गया था-Siddhwat tree: This tree was planted by Mata Parvati


उज्जैन केवल सिंहस्थ्य या महाकाल के लिए बस नहीं जाना जाता है। बल्कि यहां और भी ऐसी चीजें मौजूद हैं जो लोगों की आस्था व विश्वास का प्रतीक हैं। एक ऐसे ही आस्था के प्रतीक का नाम सिद्धवट वृक्ष है। जिसे स्वयं माता पार्वती द्वारा लगाया गया था। इसके अलावा राजा विक्रमादित्य ने बेताल को इसी पेड़ पर सिद्ध किया था।
मुगलों ने लोहे तवों से जड़वा दिया शिप्रा नदी के तट पर स्थित विश्व प्रसिद्ध सिद्धवट उज्जैन की धार्मिक विविधता को प्रमाणित करता है। यह प्रसिद्ध स्थान एक दिव्य चमत्कारिक वट वृक्ष है। जिस प्रकार प्रयाग इलाहबाद में अक्षयवट, गया बिहार में बौद्धवट तथा मथुरा वृन्दावन में बंशीवट है, उज्जैन में सिद्धवट है। ऐतिहासिक वर्णन के अनुसार इस अति प्राचीन वट वृक्ष को मुगल काल में कटवा कर सात लोहे के तवों से जड़वा दिया गया था लेकिन यह दिव्य वृक्ष उन लोहे के तत्वों को तोड़कर फिर से हरा भरा हो गया।

स्कंद पुराण में उल्लेखस्कन्द पुराण के अवन्ति खंड अनुसार इस वट वृक्ष का रोपण स्वयं माता पार्वती ने अपने हाथों से किया था। मां पार्वती ने अपने पुत्र कार्तिकेय को यहां पूजन भी करवाया था। देवों और असुरों की लड़ाई के पूर्व इसी स्थान पर देवताओं ने शिवपुत्र कार्तिकेय का सेनापति पद पर अभिषेक किया था। इसके बाद कार्तिक स्वामी ने तारकासुर राक्षस का वध किया। वध के बाद कार्तिकेय ने जिस शक्ति से तारकासुर का वध किया था, वह शिप्रा नदी के इसी घाट में समाहित हो गई थी। यहीं कारण है कि इस तीर्थ का नाम शक्तिभेद पड़ गया। यह वटवृक्ष कल्पवृक्ष है। संपत्ति अर्थात भौतिक व लौकिक सुख-सुविधाओं की कामना के लिए वट वृक्ष पर रक्षा सूत्र बांधा जाता है। उज्जैन में लगने वाला कार्तिक मेला इसी तीर्थ से जाना जाता है।
विक्रमादित्य ने बेताल वश में कियाअतिप्राचीन सिद्धवट का वर्णन लगभग 5500 साल पुराने स्कन्द पुराण में मिलता है, उसी से इस मंदिर की अतिप्रचीनता का पता चलता है। ऐतिहासिक वर्णन अनुसार सम्राट विक्रमादित्य ने इसी वट वृक्ष के नीचे घोर तपस्या कर बेताल को वश में करने की सिद्धि प्राप्त की थी। साथ ही भारत सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने श्रीलंका आदि सुदूर देशों में धर्म प्रचार की यात्राएं करने से इसी वट वृक्ष का पूजन अर्चन किया था।

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