दुनिया के पहले सन्यासी कौन-- सनक, सनंदन, सनातन, और सनत्कुमार-Who is the world's first monk - Sanak, Sanandan, Sanatan, and Sanatkumar - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Friday, 8 May 2020

दुनिया के पहले सन्यासी कौन-- सनक, सनंदन, सनातन, और सनत्कुमार-Who is the world's first monk - Sanak, Sanandan, Sanatan, and Sanatkumar

दुनिया के पहले सन्यासी कौन-- सनक, सनंदन, सनातन, और सनत्कुमार





श्री हरी विष्णु, कौमार सर्ग में चार ब्राह्मणों के रूप में अवतार ग्रहण किया, जो ब्रह्मा जी के संतान थे। इन चारों ने बहुत कठिन अखंड ब्रह्मचर्य का पालन किया, इनकी आयु सर्वदा ही पाँच वर्ष की रहती हैं। कल्प के आदि में, ब्रह्मा जी भगवान विष्णु के नाभि से उत्पन्न हुए पद्म पर विराजमान थे, उन्होंने उस समय सम्पूर्ण जगत को जलमग्न देखा। वे सोचने लगे कि, वे कौन हैं, किसने उन्हें जन्म दिया हैं तथा उनके जन्म का क्या उद्देश्य हैं। उस स्थिति में ब्रह्मा जी ने कई वर्षों तक तपस्या की, तदनंतर पुरुषोत्तम भगवान श्री हरी विष्णु ने उन्हें दर्शन दिया। भगवान श्री विष्णु ने जल प्रलय के परिणामस्वरूप सम्पूर्ण जगत का नाश हुए, उन समस्त प्रजा तथा तत्वों को पुनः उत्पन्न करने का ब्रह्मा जी को निर्देश दिया तथा वहां से अंतर्ध्यान हो गए। तदनंतर ब्रह्मा जी ने १०० वर्षों तक तपस्या की तथा चौदह लोकों की रचना की, उन्होंने सप्त प्राकृतिक सर्ग, १. महत्तत्व, २. अहंकार, ३. तन्मात्राएँ, ४. इन्द्रियाँ, ५. इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता, ६. पञ्च-पर्वा, अविद्या (तम, मोह, महामोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र), तथा तीन वैकृतिक सर्ग ८. स्थावर, ९. तिर्यक्, १०. मनुष्य को उत्पन्न किया।
इन सर्गों की उत्पत्ति के पश्चात, ब्रह्मा जी को संतुष्टि नहीं मिली तथा उन्होंने मन ही मन भगवान श्री हरी विष्णु ध्यान कर इन चारों पुत्रों को उत्पन्न किया। ब्रह्मा जी के ध्यान के परिणामस्वरूप साक्षात् श्री हरी ने ही इन चारों सनक, सनंदन, सनातन, और सनत्कुमार के रूप में अवतार लिया, जो पाँच वर्ष की आयु वाले थे तथा सर्वदा ही पाँच वर्ष आयु के ही रहे।
                                                                                                                            
ब्रह्मा जी द्वारा अपने चार मानस पुत्र सनकादि कुमारों से प्रजा सृष्टि हेतु आज्ञा देना तथा सनकादि कुमारों का मना करना।
इन चारों को उत्पन्न कर ब्रह्मा जी ने उन्हें प्रजा विस्तार के निमित्त निर्देश दिया, परन्तु इन ऋषि कुमारों ने अपने पिता ब्रह्मा जी को इस कार्य के लिए माना कर दिया। उनके अनुसार भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना से अधिक और कोई कार्य उनके लिए उपयुक्त नहीं थीं, वे नारायण की उपासना को ही सर्वाधिक महत्व वाला मना तथा वहां से चले गए। वे चारों जहाँ पर भी जाते थे, सर्वदा ही भगवान विष्णु का भजन करते थे, सर्वदा ही भगवान नारायण के भजन कीर्तन में निरत रहते थे। ये सर्वदा उदासीन भाव से युक्त हो, भजन-साधन में मग्न रहते थे, इन्हीं चारों कुमारों ने उदासीन भक्ति, ज्ञान तथा विवेक का मार्ग शुरू किया, जो आज तक उदासीन अखाड़ा के नाम से चल रहन हैं। चारों भाई सर्वदा एक साथ रहते थे, एक साथ ही ब्रह्माण्ड में विचरण करते थे तथा एक साथ ही वेद-शास्त्रों का अध्ययन किया।

सनकादि ऋषियों द्वारा हंस रूप धारी भगवान विष्णु से ब्रह्म ज्ञानगूढ़ विद्यावेद-शास्त्र प्राप्त करना।
सनकादि ऋषियों श्री हरी भगवान के हंसावतार से ब्रह्म ज्ञान की निगूढ़ शिक्षा ग्रहण की तथा उसका प्रथमोपदेश अपने शिष्य देवर्षि नारद को किया था। वास्तव में ये चारों ऋषि ही चारों वेदों के समान माने गए हैं, चारों वेद इन्हीं का स्वरूप हैं। पूर्व चाक्षुष मन्वंतर के प्रलय के समय जो वेद-शास्त्र प्रलय के साथ लीन हो गए थे, इन चार कुमारों के उन वेद-शास्त्रों को हंस अवतार से प्राप्त किया। नारद मुनि को इन्होंने ही समस्त वेद-शास्त्रों से अवगत करवाया, तदनंतर नारद जी ने अन्य ऋषियों ने प्राप्त किया। इन्हें आत्मा तत्व का पूर्ण ज्ञान था, वैवस्वत मन्वंतर में इन्हीं पाँच वर्ष के बालकों ने, सनातन धर्म ज्ञान प्रदान किया और निवृति-धर्म के प्रवर्तक आचार्य हुए। ये सर्वदा ही दिगंबर भेष धारण किये रहते थे संसार में रहते हुए भी ये कभी किसी भी बंधन में नहीं बंधे। केवल मात्र हरि भजन ही इनके जीवन का मुख्य उद्देश्य था। ये चारों कुमार परम सिद्ध योगी हैं, अपने परम ज्ञान तथा सिद्धियों के परिणामस्वरूप ये सर्वदा ही सिद्ध बाल योगी से जान पड़ते हैं। ज्ञान प्रदान तथा वेद-शास्त्रों के उपदेश, भगवान विष्णु की भक्ति और सनातन धर्म हेतु इन कुमारों ने तीनों लोकों में भ्रमण किया। इन्होंने भगवान विष्णु को समर्पित कई स्त्रोत लिखे।
सनकादि नाम से विख्यात ब्राह्मण होने का कारण।
सनकादि नाम से विख्यात चारों कुमार सनक (पुरातन), सनन्दन (हर्षित), सनातन (जीवंत) तथा सनत् (चिर तरुण) के नाम में ‘सन’ शब्द हैं, इसके अलावा चार भिन्न प्रत्ययों हैं। बुद्धि को अहंकार से मुक्ति का उपाय सनकादि से अभिहित हैं, केवल चैतन्य ही शाश्वत हैं। चैतन्य मनुष्य के शरीर में चार अवस्था जिसे जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय या प्राज्ञ विद्यमान रहती हैं, इस कारण मनुष्य देह चैतन्य रहता हैं। इन्हीं चारों अवस्थाओं में विद्यमान रहते के कारणवश चैतन्य मनुष्य को सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत् से संकेतित किया गया हैं। ये चारों कुमार किसी भी प्रकार की अशुद्धि के आवरण से रहित हैं, परिणामस्वरूप इन्हें दिगंबर वृत्ति वाले जो नित्य नूतन और एक समान रहते हैं “कुमार” कहा जाता हैं। तत्त्वज्ञ (तत्व ज्ञान से युक्त), योगनिष्ठ (योग में निपुण), सम-द्रष्टा (सभी को एक सामान देखना तथा समझना), ब्रह्मचर्य से युक्त होने के कारण इन्हें ब्राह्मण (ब्रह्मा-नन्द में निमग्न) कहा जाता हैं।
सनकादि कुमारों द्वारा वैकुण्ठ में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय तथा विजय को श्राप देना।
इन ब्रह्मा जी के पुत्र सनकादि मुनि ने वैकुंठ के द्वारपाल, पार्षद जय तथा विजय को श्राप दिया था, जिसके कारण उन दोनों को मृत्य लोक में राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ा था। एक दिन सनकादि कुमार भगवान विष्णु के दर्शनों हेतु वैकुंठ गए, वहां के मनोरम सौन्दर्य ने उन्हें प्रसन्न कर दिया। कुमारों ने छठवें द्वारमण्डप को पार कर, जैसे ही सातवें द्वारमण्डप की और बड़े, जय तथा विजय नाम के दो द्वारपालों ने धृष्टतापूर्वक उन्हें रोक दिया। इस पर उन कुमारों को क्रोध आ गया, चारों कुमार तत्व ज्ञानी थे इसके विपरीत भी उन्हें क्रोध आना केवल भगवान की इच्छा अनुसार ही हुआ। कुमारों ने जय तथा विजय से कहा; “वैकुण्ठ के द्वारपाल होकर भी तुम्हारा विषम स्वभाव नहीं गया हैं, तुम तो सर्पों के सामान हो, तुम यहाँ निवास करने योग्य नहीं हो, तुम्हारा पतन हो जायें। वहां पर भगवान विष्णु भी आ गए तथा उन्होंने सनकादि मुनियों को प्रणाम किया। भगवान विष्णु ने कुमारों से कहा; ब्राह्मण सर्वदा ही हमारे आराध्य हैं और रहेंगे, अपने द्वारपालों के अपराधों हेतु में आप से क्षमा प्रार्थी हूँ। भगवान विष्णु ने आपने द्वारपाल जय तथा विजय से कहा; तुम्हें यह श्राप मेरे इच्छा के अनुसार प्राप्त हुआ हैं, यहीं तुम्हारी परीक्षा हैं। तीन जन्मों तक तुम्हारा जन्म राक्षस योनि में जन्म प्राप्त होगा तथा मैं तुम्हारा प्रत्येक जन्म में उद्धार करूँगा, उस योनि से मुक्ति प्रदान करूँगा। श्राप के कारण तुम दोनों प्रथम जन्म में हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकश्यपु बनोगे, द्वितीय में रावण तथा कुम्भकर्ण तथा तृतीय जन्म में शिशुपाल तथा दन्तवक्र बनोगे।

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