Why is garlic and onion not used in Hindu religious activities- लहसुन और प्याज का इस्तमाल हिन्दू धार्मिक कार्यो में क्यों नही किया जाता ? - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Friday, 1 May 2020

Why is garlic and onion not used in Hindu religious activities- लहसुन और प्याज का इस्तमाल हिन्दू धार्मिक कार्यो में क्यों नही किया जाता ?


प्याज और लहसुन ना खाए जाने के पीछे सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा यह है कि समुद्रमंथन से निकले अमृत को, मोहिनी रूप धरे विष्णु भगवान जब देवताओं में बांट रहे थे तभी दो राक्षस राहू और केतू भी वहीं आकर बैठ गए। भगवान ने उन्हें भी देवता समझकर अमृत की बूंदे दे दीं। लेकिन तभी उन्हें सूर्य व चंद्रमा ने बताया कि यह दोनों राक्षस हैं। भगवान विष्णु ने तुरंत उन दोनों के सिर धड़ से अलग कर दिए। इस समय तक अमृत उनके गले से नीचे नहीं उतर पाया था और चूंकि उनके शरीरों में अमृत नहीं पहुंचा था, वो उसी समय ज़मीन पर गिरकर नष्ट हो गए। लेकिन राहू और केतु के मुख में अमृत पहुंच चुका था इसलिए दोनों राक्षसो के मुख अमर हो गए (यहीं कारण है कि आज भी राहू और केतू के सिर्फ सिरों को ज़िन्दा माना जाता है)। पर भगवान विष्णु द्वारा राहू और केतू के सिर काटे जाने पर उनके कटे सिरों से अमृत की कुछ बूंदे ज़मीन पर गिर गईं जिनसे प्याज और लहसुन उपजे। चूंकि यह दोनों सब्ज़िया अमृत की बूंदों से उपजी हैं इसलिए यह रोगों और रोगाणुओं को नष्ट करने में अमृत समान होती हैं पर क्योंकि यह राक्षसों के मुख से होकर गिरी हैं इसलिए इनमें तेज़ गंध है और ये अपवित्र हैं जिन्हें कभी भी भगवान के भोग में इस्तमाल नहीं किया जाता। कहा जाता है कि जो भी प्याज और लहसुन खाता है उनका शरीर राक्षसों के शरीर की भांति मज़बूत हो जाता है लेकिन साथ ही उनकी बुद्धि और सोच-विचार राक्षसों की तरह दूषित भी हो जाते हैं।
 इन दोनों सब्जि़यों को मांस के समान माना जाता है इसके पीछे भी एक कथा है। प्राचीन समय में ऋषि मुनि पूरे ब्रह्मांड के हित के लिए अश्वमेध और गोमेध यज्ञ करते थे जिनमें घोड़े अथवा गायों को टुकड़ों में काट कर यज्ञ में उनकी आहूति दी जाती थी। यज्ञ पूर्ण होने के बाद यह पशु हष्ट पुष्ट शरीर के साथ फिर से जीवित हो जाते थे। एक बार जब ऐसे ही यज्ञ की तैयारी हो रही थी तो एक ऋषिपत्नी जो की गर्भवती थी, को मांस खाने की तीव्र इच्छा हुई। कुछ और उपलब्ध ना होने की स्थिति में ऋषिपत्नी ने यज्ञाहूति के लिए रखे गए गाय के टुकड़ो में से एक टुकड़ा बाद में खाने के लिए छिपा लिया। जब ऋषि ने गाय के टुकड़ो की आहूति देकर यज्ञ पूर्ण कर लिया तो अग्नि में से पुनः गाय प्रकट हो गई। पर ऋषि ने देखा की गाय के शरीर के बाएं भाग से एक छोटा सा हिस्सा गायब था। ऋषि ने तुरंत अपनी शक्ति से जान लिया कि उनकी पत्नी ने वह हिस्सा लिया है। अब तक उनकी पत्नी भी सब जान चुकी थी। ऋषि के क्रोध से बचने के लिए उनकी पत्नी ने वह मांस का हिस्सा उठा कर फेंक दिया। लेकिन यज्ञ और मंत्रो के प्रभाव के कारण टुकड़े में जान आ चुकी थी। इसी मांस के टुकड़े की हड्डियों से लहसुन उपजा और मांस से प्याज। इसलिए वैष्णव अनुयायी प्याज और लहसुन को सामिष भोजन मानते हैं और ग्रहण नहीं करते। 
तुर्की में भी इन सब्जियों को प्रयोग ना करने के पीछे एक दंतकथा प्रचलित है। कहा जाता है कि जब भगवान ने शैतान को स्वर्ग से बाहर फेंका तो जहां उसका बांया पैर पड़ा वहां से लहसुन और जहां दायां पैर पड़ा वहां से प्याज उगी। 

जैन धर्म को मानने वाले लोग भी प्याज और लहसुन नहीं खाते लेकिन इसके पीछे वजह यह है कि यह दोनों जड़ें हैं और जैन धर्म में माना जाता है कि अगर आप किसी पौधे के फल, फूल, पत्ती या अन्य भाग को खाओ तो उससे पौधा मरता नहीं है लेकिन चूंकि प्याज और लहसुन जड़े हैं इसलिए इन्हें खाने से पौधे की मृत्यू हो जाती है। 
इसके उत्तेजना और जुनून बढ़ाने वाले गुणों के कारण चीन और जापान में रहने वाले बौद्ध धर्म के लोगों ने कभी इसे अपने धार्मिक रिवाज़ो का हिस्सा नहीं बनाया। जापान के प्राचीन खाने में कभी भी लहसुन का प्रयोग नहीं किया जाता था।

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