एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?-Why not eat rice on Ekadashi? - ॐ जय माता दी ॐ

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“ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

Thursday, 14 May 2020

एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?-Why not eat rice on Ekadashi?



किंवदंती के अनुसार, महर्षि मेधा ने मातृ शक्ति के प्रकोप से बचने के लिए अपने शरीर का त्याग कर दिया और उनका हिस्सा पृथ्वी में समा गया। महर्षि मेधा की उत्पत्ति चावल और जौ के रूप में हुई है, इसलिए चावल और जौ को जीव माना जाता है।


एकादशी तिथि वह दिन था जब महर्षि मेधा का भाग पृथ्वी में विलीन हो गया। इसलिए एकादशी पर चावल खाना वर्जित माना गया है। ऐसा माना जाता है कि एकादशी के दिन चावल खाना महर्षि मेधा के मांस और रक्त का सेवन करने के समान है।


वैज्ञानिक कारण

वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार चावल में पानी की मात्रा अधिक होती है। पानी पर चंद्रमा का प्रभाव अधिक होता है। चावल खाने से शरीर में पानी की मात्रा बढ़ती है, इससे मन विचलित और चंचल होता है। चंचल मन उपवास के नियमों के पालन में बाधा डालता है। एकादशी व्रत में मन का उपवास और सात्विक भाव का पालन बहुत जरूरी है, इसलिए एकादशी के दिन चावल से बनी चीजें खाना मना है।




According to the legend, Maharishi Medha sacrificed his body to avoid the wrath of mother power and his part was absorbed into the earth. Maharishi Medha originated in the form of rice and barley, hence rice and barley are considered creatures.

Ekadashi date was the day when Maharishi Medha's part merged into the earth. Therefore, eating rice on Ekadashi is considered taboo. It is believed that eating rice on Ekadashi is like consuming the flesh and blood of Maharishi Medha.

Scientific reason
According to scientific fact, the amount of water in rice is high. Moon's effect on water is more. Eating rice increases the amount of water in the body, this makes the mind distracted and fickle. The fickle mind interrupts the observance of fasting rules. Fasting of the mind and observance of the sattvik bhava is very important in Ekadashi fast, therefore eating things made of rice is forbidden on the day of Ekadashi.

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